मनिषा खटाटे

घर के आँगन में पारिजात के पेड़ पर लटका हुआ घोसला बच्चों की किलकिलाहट से और हवा की तेज रफ्तार से डोल रहा था । मस्तियाँ चाहे पंछयिों के बच्चों की हो या मनुष्यों के बच्चों की । आखिर वह संस्कार से जड़ मन को भी आल्हादीत करने का सामथ्र्य रखती है ।
मगर हर समय ऐसा नहीं होता है । मनुष्य होने की यह सजा भी है शायद, की उत्साहित करनेवाली ध्वनियाँ भी दुःख का कारण बन सकती है । हम मनुष्य प्राणी किस मिट्टी से बने हंै, कि दूसरों का सुख भी हमारे दुःख का कारण बनता है और उससे उलटा भी होता है । दूसरों के दुःख भी हमें सुख की सुगंध देते हंै । इस पहेली का कोई उत्तर नहीं है । जीवन का झोका भी पहेली से कम नहीं हैै । हवा की भांति शरीर को कब छूके निकल जाता है पता ही नहीं चलता । फिर दूसरा आता है परंतु वह जब आँधी, तूफान का रूप लेता है तो डरवाना महसूस होता है । प्रकृति के रूप भी कितने अजीब होते हंै । हम भी उनसे परे नहीं हैं । पतझड के मौसम में हवा के ऊपर सवार होकर पत्ते भी किसी नये देश में यात्रा के लिये जाते हैं । कितना उदासीन कर जाता है मन को । अद्भुत अनचाहा है सबकुछ । परंतु क्या करे, प्रकृति नियति तथा जीवन में घटनेवाली घटनाएँ हमें न चाहकर भी स्वीकार करनी होती है, क्योंकि प्रकृति में हर एक वस्तु उसका नियतकर्म लेके आती है और हम एक पहेली बनकर रह जाते हैं ।
उस दिन मैं हमेशा की तरह जल्दी उठ गया था, काम पर जल्दी जाना था । मैंने पत्नी नमिता की तरफ देखा तो वह सो रही थी । शायद उसके चेहरे पर यह भाव भी प्रतीत हो रहा था कि मैंने ही इस परिवार को एकलौता बारिश दिया है ।
यह भावना किसी भी स्त्री के मन को कितना सुख देती होगी । अहंकार और स्वाभिमान के अंतर को कम करके स्त्रीत्व के भाव को मातृत्व प्रदान करती है । हमारा ६ महीने का बच्चा भी माँ से चिपककर निद्रा का सुख ले रहा था । मैंने माँ–बेटे के इस आनंद को तोड़ना मुनासिब नहीं समझा । उनकी तरफ देखकर मैं भी उत्साह से तैयारी में जुट गया । कपडे पहनने के बाद सुबह की पहली चाय भी मैंने ही बनायी । वे दोनों अभी भी सो रहे थे । आवाज देकर उठाने का साहस मैं नहीं जुटा पाया ।
मैंने देखा की घड़ी सात बजने की तरफ इशारा कर रही थी । ‘‘चलो, अब मुझे निकलना चाहिए” । ऐसा मन ही मन सोचकर दरवाजा बंद करके मैं ऑफिस के लिये चल पड़ा । बच्चा होने के बाद इस तरह चुपके से ऑफिस के लिये निकलना अब आदत सी हो गयी थी । ऑफिस के करीब पहुँचने के बाद मुझे मेरा बच्चा शशि की याद आयी । उसको देखकर चाँद की अनुभूति होती थी, तो हम पति–पत्नी ने उसका नाम शशि रख दिया । अचानक मुझे यह भी याद आया कि दाढ़ी बनाने के बाद मैंने जो ब्लेड निकाल के रखा था वह वैसे ही फर्श पर पड़ा है । अरे, कितनी बड़ी भूल हो गयी मुझसे । बच्चा जल्दी उठा तो वह कुतुहलवश उसको मुँह में डाल सकता है । यह सोचकर तो मेरे रोंगटे खडेÞ हो गये, मन थर्राने लगा । दिल धड़कने की आवाज भी सुनाई दे रही थी, पैर तो मानो जड़ हो गये थे, ऐसी कल्पना उत्पन्न होने के बाद, मैंने ऑफिस में जाकर बोलने की भी हिम्मत नहीं दिखाई ऑफिस की चढ़ती सीढि़यों से ही मैंने घर वापस जाने का निर्णय लिया । ऑफिस और घर के बीच जो रास्ता है वह भी भूल न जाये इसलिए मैं बार–बार रास्ते के चाराें तरफ देख रहा था । मेरी एक भूल या गलती मुझे कहा तक ले जाएगी यह सोचकर मेरा शरीर और आत्मा सिकुड़ रही थी ।
मैंने घर का आँगन सुना–सुना पाया तो मन ही मन आनंदित हो गया, फिर मैंने दरवाजा खोला तो मैंने यह दृश्य देखा कि शशि उठकर फर्श पर ही खेल रहा था । मेरी पत्नी नमिता किचन में अपना काम कर रही थी और आत्मा को सिकुडाÞने वाला ब्लेड बच्चे की दूसरी तरफ अनजाना–सा पड़ा था । मैं घर के अंदर जाते ही उस ब्लेड पर झपट गया और उसको वहाँ से कोसो दूर फेंक दिया । मैं तनाव से बाहर आया कि संकट को मैंने टाल दिया । और पत्नी के सामने खुद को कसुरवार नहीं पाया । मेरे दिल की धड़कने सामान्य हो रही थी । मेरे खुशी का अब कोई ठिकाना नहीं था ।
मैं खुद को किस्मत वाल महसूस कर रहा था, मैं भगवान को बार–बार धन्यवाद दे रहा था कि भगवान ने मुझे बहुत बड़ी गलती होने से बचाया है । इस खुशी को जाहिर करने के लिए मैंने शशि को अपने हाथों में उठाया । बाप की हाथों में वह और भी आश्वस्त हो गया । वह भी मेरे तरफ देख कर हँसने लगा, आवाजे करने लगा । वह और खुश हो जाये इसलिए मैंने शशि को हवा में थोड़ा और उछाला तो वह खुश हो गया । वह और आनंदित हो जाये इसलिए मैंने शशि को तेजी से हवा में उछाला तो एक चीख से मैं पत्थर–सा बन गया । जैसे ही मैंने शशि को उछाला तो छत का वह पंखा जो तेजी से चल रहा था, उस पंखे के ब्लेड को टकराकर शशि का सिर कब अलग हो गया पता ही नहीं चला । मेरे हाथों में बच्चे का मृत शरीर था और मैं पत्थर की मूर्ति बना स्तब्ध खड़ा था, बच्चे की चीख ने उसकी माँ को पागल बना दिया । मेरे अवचेतन मन के कोरे कागज पर यह लिखा जा रहा था कि नियति कितनी प्रामाणिक है कि देने का कर्तव्य भी करती है और समय आने पर उसको छिनने का हक भी कठिनता से करती है । जन्म और मृत्यु के बीच हम एक अनसुनी, अनचाही पहेली बनकर रह गये !

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