पहले जहाँ मोटापा नेपाली समाज में सुखी होने का परिचायक माना जाता था, आज वहीं मोटापा असामयिक मृत्यु का कारण बनता जा रहा है । विभिन्न कारणों से अस्पताल जाने वाली ४० प्रतिशत जनसंख्या किसी न किसी प्रकार के मोटापा का शिकार रहती है ।
शरीर में अनचाहा वसा और मांस जमा होकर वजन बढ़ने को मोटापा माना जाता है । अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों में महिला और पुरुष की शरीर की ऊँचाई अनुसार वजन का मापन किया जाता था । लेकिन अब मोटापा का मापक बदल गया है । किसी व्यक्ति की ऊँचाई अनुसार वजन संतुलित होने के बावजूद यदि पेट बड़ा है तो वे मोटापा से होने वाले असंक्रमित रोगों के जोखिम में रहते हंै । आजकल एशियाई देशों में महिला के पेट की गोलाई ८० सेंटीमीटर ज्यादा और पुरुषों का ९० सेंटीमीटर से ज्यादा होना मोटा माना जाता है ।
सन् २०१९ में नेपाल स्वास्थ्य अनुसंधान परिषद द्वारा संक्रमण न होने वाले रोगों की जनसंख्या गत व्याप्ति नामक एक अध्ययन प्रतिवेदन अनुसार नेपाल में २३.५ प्रतिशत जनसंख्या अधिक वजन अर्थात् ओवरवेट है । यह आँकलन बॉडी मास इन्डेक्स(बीएमआई) के आधार पर किया गया है । किसी भी व्यक्ति का ३० से ज्यादा बीएमआई रहने पर मोटापा माना जाता है । परिषद् के प्रतिवेदन के अनुसार ४० से ५९ वर्ष उम्र समूह में २६.८ प्रतिशत ,महिला में २४.१ प्रतिशत, कुछ समृद्ध जनजातियों में २९.९ प्रतिशत, किराँत में २७.३ प्रतिशत तथा ईसाई धर्मावलम्बियों में १४.३ प्रतिशत अधिक वजन देखा गया । इसी तरह शहरी क्षेत्र के ३० प्रतिशत व्यक्ति मोटापा की समस्या से ग्रसित हैं । नेपाल में ५१ प्रतिशत महिला और २४ प्रतिशत पुरुष में मोटापा है । ।
नेपाल स्वास्थ्य परिषद् के २०१३ में किए गए सर्वेक्षण अनुसार १७.७ प्रतिशत नेपाली मोटापा के शिकार थें । जबकि १०.४ प्रतिशत नेपाली दुबलेपन के शिकार थे । साधारण वजन वाले नेपालियों की कुल संख्या ६९.९ प्रतिशत थी । साथ ही अस्वाभाविक रूप से मोटा होने वालों की संख्या ४ प्रतिशत थी । अमेरिका में ४२ प्रतिशत ,स्पेन में २४ प्रतिशत ,इटली में २० प्रतिशत और चीन में ६ प्रतिशत जनता मोटापा की शिकार है । न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार जनजाति की दृष्टि से अमेरिका में ४९.६ प्रतिशत अश्वेत ,४६ प्रतिशत हिस्पानिक ४२ प्रतिशत श्वेत और १७ प्रतिशत एशियन अमेरिकन मोटापा की समस्या से पीडि़त हैं । पहले जहाँ इसे उच्च आय वाले देशों और धनी परिवारों की बीमारी मानी जाती थी वहीं पिछले कुछ दशकों से मध्यम और निम्न आय वर्गवाले देशों में भी इसकी रफ्तार तेजी से बढ़ी है ।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार १९७५ से मोटापा तीन गुण बढ़ा है । सन् २०१६ में १८ वर्ष से ऊपर के १ अरब ९० करोड़ व्यक्ति अर्थात् ३९ प्रतिशत जनसंख्या अधिक वजन की थी । संगठन का कहना है कि विश्व में अधिक जनसंख्या वाले देशों में कम वजन तथा कुपोषण की बजाय मोटापा के कारण ज्यादा व्यक्तियों की मृत्यु होती है ।
नेपाल में ३–४ रोग मोटापे से जुडेÞ होते हंै जिसको चिकित्सकीय भाषा में ‘मेटाबोलिक सिन्ड्रम’ कहा जाता है । इससे होने वाले मोटापे से हाई ब्लड प्रेशर ,पेट में चर्बी बढ़ना ,उच्च कोलस्ट्रोल आदि की समस्या एक ही साथ देखी जाती है ।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार मोटापा से मधुमेह ,हृदय रोग, कैंसर रोग ,मृगौला फेल होना ,उच्च रक्तचाप ,कोलेस्ट्रोल ,पत्थरी का रोग ,महीनवारी गड़बड़ी और बच्चा पैदा करने में समस्या आदि रोग होने की संभावना काफी बढ़ जाती है । पूरे देश में १०.५ पुरुष और ७.९ प्रतिशत महिला में मधुमेह है । शहर का प्रत्येक पाँच घर में से एक घर में मधुमेह रोगी हैं ।
स्पस्ट है अधिकांश असंक्रमित रोगों का प्रमुख कारण मोटापा ही होता है । वैसे तो पूरे विश्व में असंक्रमित रोग प्रमुख स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है । जहाँ तक नेपाल की बात है तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के रिपोर्ट अनुसार नेपाल में असंक्रमित रोगों से होनेवाला मृत्युदर ६५ प्रतिशत है जो भयावह है । सन् ०१६ के एक तथ्यांक के अनुसार नेपाल में प्रतिवर्ष एक लाख २१ हजार मनुष्य असंक्रमित रोगों से मरते हैं ।

मोटापा होने का कारण क्या है ?
इस संबंध में स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि संतुलित भोजन न करना ,भूख से ज्यादा खाना , वसायुक्त खाना ,शारीरिक गतिविधि न करना या कम करना , व्यायाम न करना ,अधिक चीनी और नमक का सेवन करना मोटापा बढ़ने का कारण है । नेपाली समाज में वयस्कों की तुलना में बच्चों में मोटापा बड़ी तेजी से बढ़ रहा है । जंकफूड,अत्यधिक मीठा और नमकीन खाद्य पदाथों का सेवन ज्यादा होने के कारण मोटापे की समस्या खतरनाक रूप लेती जा रही है । मोटापा का एक प्रमुख कारण तनाव को भी माना जाता है । कुछ समय से नेपाली समाज में विभिन्न कारणों से तनाव बढ़ रहा है । नकारात्मक सोच ,चिन्ता और अभी कोरोना महामारी से उत्पन्न विभिन्न समस्याओं की वजह से न केवल नेपाली समाज बल्कि पूरा विश्व तनावग्रस्त बना हुआ है ऐसे में महिला–पुरुषों में मोटापा बढ़ना स्वभाविक है । वैसे देखा जाता है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं में चिन्ता ,तनाव और नकारात्मक सोच ज्यादा देखी जा रही है । यही कारण है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं में मोटापा ज्यादा बढ़ रहा है ।
कतिपय में तो वंशानुगत कारण से भी मोटापा बढ़ता है । कुछ महिलाओं में महीनवारी बंद होने के बाद मोटापा की समस्या देखने को मिलती है । एक अध्ययन अनुसार विवाह के बाद प्रायः महिलाओं का तौल १० केजी तक बढ़ता है । मोटापा बढ़ने का एक कारण हार्मोन भी हो सकता है । विश्व स्वास्थ्य संगठन का सुझाव है कि मोटापा से निजात पाने के लिए दैनिक वयस्कों को कम से कम तीस मिनट और बच्चों को एक घंटा शारीरिक गतिविधि÷व्यायाम करना चाहिए ।

मोटापा कम कर कोरोना के जोखिम से बचें ।
चिकित्सक कोरोना वायरस संक्रमण के खतरनाक होने के कारणों में मोटापे का उच्च दर भी एक कारक मान रहे हैं,जोकि टाइप टू डाइबिटीज और ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों को निमंत्रित करता है । मोटापा के कारण कोविड में सुधार होने की संभावना भी कम होती है ।
ब्रिटेन के नर्फक एण्ड नरविच यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में डायबिटीज एण्ड इन्डोक्राइनोलॉजी कंसल्टेंट डॉ संकल्प न्यौपाने का कहना है कि मोटापे से डायबिटीज,हृदय रोग,श्वास–प्रश्वास समस्या ,हड्डी में दर्द, कैंसर, ब्लड प्रेशर आदि रोगों के होने की संभावना ज्यादा होती है । जोकि जीवन शैली में परिवर्तन ,व्यायाम में कमी ,खेलने के स्थान की कमी,फॉस्ट फूड खाने की आदत ,मशीन पर निर्भरता तथा घूमने–फिरने में कमी करना आदि कारणों से मोटापा बढ़ रहा है । पश्चिमी देशों की तुलना में नेपाल और दक्षिण एसिया के मनुष्यों में मोटापा का खतरा ज्यादा रहता है ।
त्रिभुवन विश्वविद्यालय शिक्षण अस्पताल के फिजिशियन तथा कोविड व्यवस्थापन समिति के संयोजक डॉ.संत कुमार दास के अनुसार मोटापन कोरोना से संक्रमित होने का कारक नहीं है बल्कि संक्रमण होने की स्थिति में मोटापा खराब परिणाम के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है । ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस का कहना है कि मुझे कोरोना वायरस के संक्रमण से संक्रमित होने के बाद आइसीयू में जाने के पीछे मेरा मोटापा ही था । यही कारण है कि अब ब्रिटेन की सरकार प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत रुचि और पहल से आने वाले शरद ऋतु में कोरोना संक्रमण के दूसरे चरण शुरू होने का आंकलन कर देश भर में मोटापा घटाने के लिए ‘मोटापा के विरुद्ध की लड़ाई ’नामक अभियान संचालन की तैयारी कर रही है ।
अमेरिकी पत्रिका न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार दक्षिण केलिफोर्निया में किए गए एक अध्ययन में मोटे युवा और मध्यम आयु के पुरुष की मृत्यु के लिए मोटापा एक स्वतंत्र कारक होता है । उक्त अध्ययन अनुसार अत्यधिक मोटे रोगी को वेंटीलेटर पर रखने की संभावना ६० प्रतिशत रहती है उसी तरह ऐसे रोगी की मौत की संभावना भी उतनी ही ज्यादा रहती है । अमेरिका में ४२ प्रतिशत ,स्पेन में २४ प्रतिशत ,इटली में २० प्रतिशत और चीन में ६ प्रतिशत जनता मोटापा की शिकार है । न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार जनजाति की दृष्टि से अमेरिका में ४९.६ प्रतिशत अश्वेत ,४६ प्रतिशत हिस्पानिक ४२ प्रतिशत श्वेत और १७ प्रतिशत एशियन अमेरिकन मोटापा की समस्या से पीडि़त हैं । पहले जहाँ इसे उच्च आय वाले देशों और धनी परिवारों की बीमारी मानी जाती थी वहीं पिछले कुछ दशकों से मध्यम और निम्न आय वर्गवाले देशों में भी इसकी रफ्तार तेजी से बढ़ी है ।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार १९७५ से मोटापा तीन गुण बढ़ा है । सन् २०१६ में १८ वर्ष से ऊपर के १ अरब ९० करोड़ व्यक्ति अर्थात् ३९ प्रतिशत जनसंख्या अधिक वजन की थी । संगठन का कहना है कि विश्व में अधिक जनसंख्या वाले देशों में कम वजन तथा कुपोषण की बजाय मोटापा के कारण ज्यादा व्यक्तियों की मृत्यु होती है ।

