चाणक्य नीति/ओशो विचार

दान

अग्निहोत्र–यज्ञ यज्ञादि के बिना वेदों का अध्ययन निरर्थक है, अर्थात् वेदों के पढ़ने का लाभ यही है कि यज्ञादि के द्वारा देव–पूजन किया जाये । दान के बिना यज्ञादि शुभ कर्म संपन्न नहीं होते । स्पष्ट है कि यजमान को पुरोहित को दान–दक्षिणा देनी होती है, जिसके बिना यज्ञ पूर्ण ही नहीं माना जाता है, परन्तु यदि दान बिना श्रद्धा भाव के दिखावे के लिए, संसार में यश कमाने के लिए, वाह–वाही लूटने के लिए अथवा किसी और विवशता में फंसे होने से किया जाता है, तो उससे अभीष्ट लाभ एवं सिद्धि कभी नहीं होती ।

ध्यान
ध्यान आँख खोल देता है । इसलिए यह तुम चिंता मत करना कि हम चुपचाप बैठे हो, न मालूम किसी गलत आदमी के पास बैठे हो । गलत और सही निष्प्रयोजन है, तुम्हारा चुप बैठना सही है । इसे समझ लो ! अगर तुम सही आदमी के पास भी विचार कर रहे हो, तो चूक जाओगे, विचार चुकाता है । अगर तुम गलत आदमीके पास भी चुप बैठे हो, पहुँच जाओगे, क्योंकि निर्विचार आँख खोल देता है । तुम
देख पाओगे कि यह आदमी गलत है ।

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