अपनी ही सरकार से लड़ने की ताकत रखने वाला समुदाय इसे हमेशा के लिए पराजयवादी मानसिकता में नहीं रहने देगा ।
आने वाले दिनों में मधेस की राजनीति और अधिक जटिल दौर से गुजरने की संभावना है। इसका मुख्य कारण यह है कि जो ताकतें खुद को मधेश आंदोलन का उत्तराधिकारी मानती हैं, वे पुनर्गठित प्रतिनिधि सभा में विभाजित हैं और सौदेबाजी की शक्ति दिन–ब–दिन कमजोर होती जा रही है ।
स्थापित तथ्य यह है कि नेपाली राज्य का चरित्र मूल रूप से संघ–विरोधी है । इसका मूल चरित्र एकात्मक है और अल्पसंख्यक लेकिन प्रभावशाली जाति के प्रभाव में है । ऐसे में एक आंदोलन से विरासत में मिली राजनीतिक ताकतों को एकजुट होकर राज्य पर दबाव बनाना चाहिए और संवाद करना चाहिए, लेकिन ये सभी एक–दूसरे को प्रतिबंधित करने के खेल में लगे हुए हैं, मौका मिले तो एक–दूसरे को खत्म करने से भी नहीं हिचकिचाते । यह विश्वास करना कठिन है कि वे किसी समय सड़क पर एक साथ गोली खाने के लिए खड़े थे , उन संघ विरोधी दलों को चुनावी प्रतिस्पद्र्धा में मधेशी दल मिलकर मजा चखाते हुए संघवाद की मजबूत नींव रखने के लिए प्रांत २ में गठबंधन सरकार भी बनाए थे ।
ऐसी दो शक्तियाँ हैं– महंत ठाकुर–राजेंद्र महतो और उपेन्द्र यादव । इनके बीच की सहमति एक दूसरे को देखने और दिखाने के खेल में सीमित हो गया था । उनकी प्रचलित, विशेष रूप से एकल सत्ता–केंद्रित प्राथमिकताओं और एक–दूसरे के प्रति अविश्वास के कारण, मधेस की राजनीति पटरी से उतरने लगी है । मधेश संविधान द्वारा अकल्पनीय और अकल्पतीत स्थिति में आ गया है ।
संविधान को लागू करने में विफलता और इसकी स्वीकार्यता में वृद्धि के कारणों की निष्पक्ष रूप से पहचान और विश्लेषण नहीं किया गया है । सभी संबंधितों की मानसिक समझ और रुख हावी होने के कारण ऐसा हो रहा है । गृह कलह और मूत्ति भंजन उद्देश्य में लगे मधेशी शक्तियों के ताकत देखने से मधेशी मुद्दा का न्यायपूर्ण संबोधन होगा, अभी भी विश्वास नहीं हो रहा है । जनता के बीच मधेश आंदोलन के महत्व और औचित्य को स्थापित करना कठिन होता जा रहा है । जसपावाले अब झुण्ड और गुट में विभाजित होते जा रहे हैं और प्रत्येक गुट वास्तविक शक्ति का दावा कर रहा है । ऐसे में प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउवा के साथ संयुक्त बातचीत और सहयोग के माध्यम से ही संघीय संसद् को मधेश के अनुकूल बनाने का कार्य कैसे होगा , विचारणीय है । यह सहकार्य और संवाद से ही संभव होगा । यदि ऐसा होता है तो यह निर्णय सामयिक और दीर्घकालिक महत्व का होगा ।
मधेश की संविधान के प्रति अपनेपन और स्वामित्व की भावना को स्थापित करने के लिए प्रधान मंत्री देउवा के साथ बातचीत का कोई विकल्प नहीं है । वर्तमान में देउवा के प्रभाव को न तो कम करके आंका जा सकता है और न ही उसकी उपेक्षा की जा सकती है । देउवा को प्रधानमंत्री बनने का मौका इसलिए नहीं मिला कि कोई और महत्वाकांक्षी नहीं था । इसलिए कल तक विपक्ष में रहे उनको वे सभी संवैधानिक काम करना होगा जो अतीत की सत्ताधारी पार्टी नहीं कर सकती थी । देउवा ने सदन में कहा भी है, ’संविधान के दायरे में मैं जो कर सकता हूँं वह करूँगा ।
लंबे समय से राजनीतिक संघर्ष करने वाले देउवा विविधतापूर्ण नेपाली समाज में मधेश का प्रबंधन कैसे किया जाए,नहीं समझ रहे हैं, यह हो ही नहीं सकता । वह असमानता, भेदभाव और अन्याय के शिकार लोगों को न्याय और समानता पर आधारित एक नए भविष्य का संकल्प दिलाने के लिए मधेशी ताकतों के बीच ’दोस्त–शत्रु’ के अंतहीन खेल में शामिल नहीं होंगे । देउवा की सीमाएँ यथावत हैं, लेकिन उनके पास अनुकूलन करने के लिए बहुत कुछ है । केवल इस अवसर का लाभ उठाकर ही सरकार लोगों का स्वामित्व हासिल कर सकती है और संविधानवाद का एक विश्वसनीय नींव रखते हुए देश में संवैधानिक निरंतरता दे सकती है ।
प्रधानमंत्री देउवा को शून्य से शुरुआत करने की जरूरत नहीं है । केवल संवैधानिक लिक को जो कल संकुचित किया गया था उसे सुधारा और चौड़ा करते हुए आगे जाना होगा । देउवा के सामने एक अहम सवाल है– इतिहास से सीखना है या इतिहास को दोहराना है ? क्या खड्ग प्रसाद शर्मा को ओली के नक्शेकदम पर चलना चाहिए या अपना खुद का पगडंडी बनाना चाहिए ?
मधेशी–थारू सहित वंचित समूहों को अतीत की गलतियों से सीखने और संविधान के कार्यान्वयन को फिर से शुरू करने के लिए आश्वस्त करना बुद्धिमानी है, जिसके लिए कोई दूसरा विकल्प नहीं हो सकता । अभी देउवा विजेता लगते हैं । लेकिन यह उनके विगत के सभी कार्यों का अनुमोदन नहीं है ।
वैसे तो प्रत्येक विजेता अपने सत्ता संघर्ष को धर्मयुद्ध कहने की कोशिश करता है और युद्ध जीतने के बाद, एक समान धारणा बनती है । ऐसा कहा जाता है कि अंतिम जीत सत्य की होती है, जो अंततः विजयी होता है उसका दूसरा पक्ष यह कहा जा सकता है कि अंततः जो विजयी होता है उसका पक्ष सत्य होता है । देउवा भले ही जीत की आड़ में अपने अतीत को ढँक लें, लेकिन थारू–मधेशी में प्रचलित हार के मनोविज्ञान को नजरअंदाज करते हुए नेपाल की स्थिरता, गतिशीलता और जीवन अब कायम नहीं रख सकते हैं । देउवा मधेश की समस्या का समाधान नहीं किए तो प्रतिनिधि सभा में उनका दिया गया वचन मधेश में नाटकों के बीच देखाए जानेवाले मंनोरंजक प्रहसन जैसा हो जाएगा ।
जब महंत ठाकुर गुट ने संसद् में देउवा का समर्थन किया, तो कुछ हैरान रह गए, जैसे उपेंद्र यादव ने प्रचंड को पहले सीए चुनाव के बाद प्रधान मंत्री बनने में मदद की थी ।
एमाले के साथ महंत का सहयोग ओली से पहले माधव नेपाल के साथ शुरू हुआ, जब माधव प्रधान मंत्री बने । उपेंद्र ने झलनाथ खनाल को प्रधानमंत्री के रूप में समर्थन देकर एमाले के साथ संबंध बनाए थे । जब तीसरे मधेश आंदोलन की बात आई, तो कई लोग एमाले को मधेश के दृष्टिकोण से रूढि़वादी मानते थे । वैसे तो प्रथम संविधान सभा से ही कतिपय सवाल में आश्र्चयजनक रूप से मधेश के विरुद्ध तीनों बड़े दल माओवादी, कांग्रेस और एमाले एक ही स्थान पर उभरते रहे हैं ।
ओली तो अपने उदय के बाद मधेश में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए अनेक कौताहल किए । तत्कालीन राजपा–सजपा सांसदों के साथ व्यक्तिगत रूप से घुलने मिलने, मधेश आंदोलन में सक्रिय रहें और कालान्तर में ओझल में रह रह अग्रणीयों को एमाले में प्रवेश तो कभी उपेन्द्र के साथ करीबी तो कभी महंथ के साथ हाथ मिलाने का काम करते रहें । लेकिन उनका मूल एजेंडा उनके कंंधें पर चढ़कर मधेश में विस्तार के लिए अपने अश्वमेध रथ को प्रवेश कराना ही था । मधेश के कुछ सवालों के प्रति नरम होना तो ओली का अभीष्ट उपक्रम मात्र था । कांग्रेस की ओर से कभी उम्मीदवार रहें सुशील कोइराला महंथ पक्ष का साथ दिए थे । इस बार महंथ देउवा को बिना शर्त समर्थन नहीं दिए है.,वे अपना अपेक्षा रखे ही हैं ।
जिस तरह महंथ मधेश के एजेंडे की खोज में प्रतिनिधि सभा के विघटन के मूक गवाह बने, उसी तरह उपेंद्र भी ओली सरकार में रहने के लिए आत्ममुग्धता की स्थिति में हाथ बाँधकर सरकार में बैठे और समावेशी प्रक्रिया सिकुड़ गई । यह उन दोनों के लिए एक भयानक स्खलन था ।
देउवा सरकार में कौन शामिल होगा ? अब मधेश ने इसकी माँग नहीं की है । संसद् को भंग करने के आंदोलन में भाग लिए थे । इस वजह से उपेंद्र के हाल के दिनों की सभी गलतियाँ सही नहीं मानी जाएगी । उपेंद्र ने राज्य–२ सरकार के भीतर के द्वंद्व के समाधान में क्या क्या बहाना बनाया, किसे दिया गया मौका ? क्षेत्रीय व्यवहार में मंत्री की दक्षता, सुशासन, लोकप्रियता, उग्रवाद के लिए निम्नलिखित में से कौन सा मानदंड चुना गया था ? उपेंद्र का व्यक्तिगत प्रेम–नापसंद एक घूमने वाली प्रांतीय प्रथा नहीं है । राजनीति में दुष्प्रचार बहुत होता है, कुछ ही चीजें वास्तविक होती हैं, जिन्हें व्यवहार में लाया जाता है । प्रचार राजनीति का अभिन्न अंग बन गया है । लेकिन ऐसा यह मधेश की सबसे कड़वी सच्चाई है ।
केवल आंदोलनकारी सरकार होने से संघवाद को मजबूत नहीं किया जा सकता है, और न ही अध्यादेश प्रतिनिधि सभा के विघटन को स्वीकार करके मधेश मुद्दे को हल कर सकता है । मधेशी–थारू सहित चिंताओं को केवल प्रतिनिधि सभा के माध्यम से ही व्यवस्थापन किया जा सकता है । इस समय पूरे थारू–मधेशी–दलित समुदाय की मुक्ति के लिए आम संघर्ष बहुत कमजोर है, इसलिए विभिन्न भ्रम पैदा होना स्वाभाविक है । ओली ने राज्य के हित में जो किया है वह विद्रोहियों को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर करना है ।
वह कहाँ है ? जितने अधिक नेता, उतनी ही अनिर्णीत या गतिहीन माँगें और नई पीढ़ी की बदलती आकांक्षाएँ, उतना ही इस संविधान को एक गतिशील दस्तावेज बनाया जाएगा । माधव कुमार नेपाल से बेहतर मधेश को कौन समझता है, जिन्हें संसद् की बहाली के लिए एकमात्र वृहस्पति के रूप में पेश किया गया था ? यदि वे चाहते हंै और प्रचंड का साथ देते हैं, तो नेपाली राज्य और मुख्यधारा की राजनीतिक ताकतों के उदारीकरण की संभावना है । ऐसे में अगर ओली खुद को मधेश का दोस्त मानने की कोशिश भी करते हैं तो उन्हें कल संविधान संशोधन के समर्थक के तौर पर देखना होगा । पहले थारू–मधेशी का मामला सही था उस समय राज्य और समाज दोनों एक भंवर में नहीं थे । समाज में रचनात्मक ऊर्जा जोड़ने के लिए राजनीतिक शक्ति के साहस की जरूरत है । देउवा के चेहरे पर लगे दागों को धोने का समय आ गया है ।

मधेशी दलों में जितने अधिक नेता हैं, जितने अधिक गुट हैं, उतने ही अधिक फूट हैं । थारू–मधेशी नेतृत्व थक चुका है, उनकी नजर में सिर्फ सत्ता है । बाबूराम भट्टराई इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि जिस समुदाय के पास अपनी सरकार से लड़ने की ताकत है, वह उसे हमेशा के लिए पराजयवादी मानसिकता में नहीं रहने देगा । उनका पार्टी के भीतर घरेलू विवाद है उन्हें घरेलू विवाद में उलझाने की कोशिश करने के बजाय सरकार के साथ आमने–सामने की बातचीत का सूत्रधार होना चाहिए । इसकी शुरुआत सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों के निर्माण से होनी चाहिए । महंत–उपेंद्र को एक साथ न लाने पर भी यह सरकार के साथ आम बातचीत का रास्ता खोल सकती है । दोनों तरफ के हुक्मरान चाहे कुछ भी कहें, आम लोग कह रहे हैं, ’’अभी जुदा हुए तो शायद सपनों में मिलूँगा.’’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *