– डा.गौरीशंकर लाल दास
अधिराजकुमारी शारदा शाह और कुमार खड्ग विक्रम शाह के साथ दूसरी यात्रा भी लंबी ही थी । इस यात्रा में हम तीन ही थे । साथ में उनका प्रिय पात्र रसोइया भी था । इस यात्रा में भी किंग्स कैभेलरी के अरबी घोडेÞ सवारी के लिए आए थे । इस यात्रा में बेत्रावती होते धारापानी लहरे पौवा, राम्चे, धुँचे (रसुवा का सदरमुकाम) और रसुवागढ़ी पहँुचे । वहाँ नेपाल–तिब्बत युद्ध के समय का एक तोप भी रखा हुआ है । वहाँ से वापस स्याप्रुबेसी आकर फिर पूर्व की ओर शेर्पागाँव कृपनेश (जहाँ उस वक्त खंपा लोग रहते थे) होते हुए लाङटाङ खोला होते चॉगजिङ पहुँचे । यहाँ से लाङटाङ हिमाल का आधार शिविर नजदीक ही जान पड़ा । वहाँ पनीर बनाने का एक उद्योग भी था ।
वहाँ एक रात ठहर कर फिर वापस आए । शेर्पा गाँव के बाद अरबी घोड़ों को छोड़ दिया गया था और जुम्ली घोड़ों को लाया गया । हिमाली क्षेत्र में अरबी घोडेÞ काम के नहीं, उन क्षेत्रों के लिए तेज–तर्रार जुम्ली घोडेÞ ही उपयुक्त हैं । मैं भी अनिच्छा से एक जुम्ली घोड़े पर आरूढ़ हुआ तो वह घोड़ा वायु वेग से चल पड़ा और मैं गिरने को ही था कि एक वृक्ष की डाल पकड़ कर लटक गया । इस तरह धराशायी होने से बचा । स्याप्रुवेसी वापस आकर धुँचे आया । धुँचे से पूर्व उत्तर गोसाई कुंड का रास्ता पकड़ा । चन्दनवारी आने पर पर्यावरण का विनाश साफ दृष्टिगोचर हुआ ।

वहाँ बहुतेरे चीड़ के वृक्ष आग लगने से सूख गए थे । लौरी विनायक (जो गोसाई कुंड से नजदीक ही है) पहुँचने से पहले हिमपात शुरू हुआ और रास्ता ढक जाने की वजह से रास्ता पहचानना दुश्वार हो गया । शुक्र है कि वहाँ एक गोठ मिला । हमलोगों ने रात वहीं गुजारी । दूसरे दिन गोसाई कुंड पहुँचने से पहले एक पानी का सोता था जहाँ बर्फ जमी हुई थी । अधिराजकुमारी शारदा के वहाँ पाँव रखते ही फिसल गईं । मेरी तो धड़कन ही रुक गई । ईश्वर की अनुकंपा से उनके नजदीक ही एक भार वाहक था जिसने उन्हें पकड़ लिया । इस प्रकार एक भयानक हादसा होने से बचा !
गोसाई कुंड की ऊँचाई ४३८० मीटर (१४,३६६) फीट है । इस वजह से कुंड का पानी बहुत ठंड़ा था । अतः हमलोगों ने जल सिंचन ही किया और वहाँ से पूर्वाभिमुख रास्ता पकड़ सूर्य कुंड पार करते घोप्टे, ठारे होते हुए हेलम्बु पहुँच गए । हेलम्बु में हमलोगों ने फिर अश्वारोहण किया ! हेलम्बु में एक व्यक्ति के ‘कोर्निश’ नहीं करने पर शारदा शाह ने आक्रोश व्यक्त किया ! राजपरिवार की हेंकड़ी !
हेलम्बु से वापस पाटी भञ्ज्यांग होते हुए काठमांडू वापस आने पर इस लम्बी यात्रा का अन्त हुआ !!
गोसाई कुंड के रास्ते में न कोई मन्दिर था, ना शेड, न होटल । सुनने में आया है, अब तो अच्छे–अच्छे होटल भी खुल गए हैं !
