
नेपाली लोकतंत्र में खड्ग—ग्रहण
हमारे देश में लोकतांत्रिक संविधान ने राज्य के अंगों के बीच संतुलन और नियंत्रण की सीमा रेखा खींच रखी है । लोकतंत्र को संविधान ही स्वरूप देता है जो देश और जनता को राज्य द्वारा निर्धारण किए गए गन्तव्य या लक्ष्य में पहुँचाने का विश्वासी और हानि रहित माध्यम बनता है । लोकतंत्र अपने से परिचालित होने से भी ज्यादा जनता और उनके प्रतिनिधियों के अधिकतम हित के लिए संचालन करनेवाली पद्धति के रूप में स्थापित है । हमारे देश के संदर्भ में सभी का अपना–अपना अनुभव और शैली होने के कारण संविधान किस रूप में अभिव्यक्त होगा, यह राष्ट्रीय चिंता का विषय है । हमारे यहाँ संसद्, सरकार और अदालत की अपनी–अपनी परम्परा और प्रकृति है । लेकिन आज की चिंता लोकतंत्र के भविष्य के साथ जुड़ी हुई है ।
उन्नत नेपाली जनता किसी भी अधिनायकवाद को स्वीकार नहीं कर सकती । परम्परागत अधिनायकवाद को लंबे समय तक भोग चुकी जनता उसके साथ संबंध तोड़ चुकी है । इसीलिए किसी भी प्रकार के अधिनायकवाद को अभी की संवैधानिक यात्रा का विकल्प बनने की अवस्था नहीं है । लेकिन आज के कार्यकारी के स्वेच्छाचारी अभ्यास को नियमन करने, शांत करने और संतुलित यात्रा के लिए नैतिक दबाव देने का कार्य नहीं हो रहा । अभी के राज्य के अंगों द्वारा तैयार किए जा रहे नवकथ्य को चालु संविधान क्या–क्या सुविधा, समुन्नति और स्वतंत्रता दे सकता है, इसमें सबों की दिलचस्पी है ।
सर्वोच्च अदालत लोकतंत्र के उज्जवल भविष्य को मजबूत आधार दे सकता है क्या ? आम जनता प्रतीक्षारत है । हमारे संपूर्ण प्रयासों को सार्थकता देने और लोकतांत्रिक नेपाल के भविष्य सुरक्षित रखने के लिए दो रास्ते हैं । देश अभी चौराहे पर खड़ा है । संविधान स्वयं ही देश और लोकतंत्र के व्यक्तित्व का निर्माण करता है ।
संविधान कैसे बना ? उस समय कौन पात्र और प्रवृत्ति निर्णायक रहा ? इसने क्या सभी प्रकार के विभेदों का अंत करते हुए सामाजिक न्याय का दरवाजा खोल सका ? विभिन्न सीमाकृत समुदायों के तरफ से उठनेवाले स्वरों का समायोजन कितना हुआ ?
नेपाली जनता को नागरिक बनने और अपने भाग्य का फैसला अपने स्वयं करने के रास्तों को संविधान निर्माण प्रक्रिया पर किस प्रकार रोक लगाने का प्रयास किया ? संविधान में अपना हिस्सा खोजने वाले थारू–मधेशियों को राजनीतिक रंगमंच के नेपथ्य में धकेल दिया ? इस प्रश्न का जवाब खोजने का ईमानदार प्रयत्न न होने तक नेपाली समाज ऐतिहासिक संक्रमण से पीछा छुड़ा नहीं सकता ।
संविधान बनानेवाली शक्तियाँ किस नैतिक बल, कैसी रणनीति और कैसा सैद्धान्तिक–वैचारिक क्रियाकलाप के आधार पर भावी चुनौती का सामना किया जा सकता है, के तरफ ध्यान नहीं दिया ।
इसी तरह शताब्दियों से सामन्तवादी एकाधिकार के कारण लुप्त मानवीय पहचान (लैंगिक, जात÷जातीय, वर्गीय, धार्मिक) तथा क्षेत्रीय विविधता समेटने की आवश्यकता महसूस नहीं किया गया । नेपाली समाज में संविधान की उपस्थिति और भूमिका कैसी और कितनी है, की ओर हमारा ध्यान गया नहीं !
इस तरफ संवेदनशील होते तो थारू विद्रोह की ऊवर भूमि टीकापुर की राजनीतिक घटना के प्रति उदासीनता नहीं दिखाता । संविधान अपनी भूमिका तथा हैसियत के विकास के लिए अपने अंगों से जो शक्ति प्राप्त कर सकता था, वह कार्यकारी के हस्तक्षेप के कारण संभव नहीं हो सका ।
संविधान निर्माण होने की प्रक्रिया के तह में इसके भीतर ढेर–सारे उथल–पुथल तीव्रतर रूप में हो रहा था जिसमें संविधान सभा के अंक गणित ने छिटकिनी लगा दी । ऐसी छिटकिनी लगाने वाले में मुख्य अभियन्ता खड्ग प्रसाद शर्मा थे, जो तत्पश्चात् के शासन संचालन के प्रत्येक प्रहर में खड्ग लेकर लोकतंत्र के ऊपर आक्रमण करने लगे, दल और संसद् के भीतर के अंक गणित के बल पर ।
संविधान निर्माण अंकगणित के बल पर किया, यहीे कारण है कि परिवर्तनकारी नूतन मान्यता और संस्कृति को संस्थागत करने के लिए आधारभूत काम नहीं किया गया ।
संविधान निर्माण की प्रक्रिया में चला अंकगणितीय खेल ने उसके निमित्त पात्र खड्ग प्रसाद को अग्रासन में पहुँचाया । इस अर्थ में वे अंकगणितीय शक्ति के बल पर दबाने वाली प्रवृत्ति के नायक हैं । जातीय अहंकारयुक्त शक्ति दबाव और अंकगणितीय राजनीतिक की नींव में खड़ा होकर खड्ग प्रसाद ने लोकतांत्रिक निष्ठाओं को अपने में एकाकार कभी होने ही नहीं दिया । विपन्न और कमजोर नेपाल को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से समृद्ध राष्ट्र बनाने का कार्यभार के प्रति उनकी विरक्ति बनी रही । संविधान के मर्म पर हर प्रहार की उपेक्षा वे करते रहे, संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता में बहुमत की तलवार को ताने रहे । वैसे तो खड्ग प्रसाद जनता से चुने हुए शासक हैं लेकिन वे अंकगणितीय अहं के कारण निरंकुश बने और उनके नेतृत्व में कुछ मुठ्ठी भर सभ्रांतों ने सत्ता पर कब्जा किया । लेकिन अभी के राजनीतिक संकट के समय चालू संविधान की प्रस्तावना के भाव को संरक्षित करने के लिए एक जर्बदस्त वैचारिक मंथन शुरू करना अपरिहार्य है । सत्ता घर्षण के गुरुत्वाकर्षण से संवैधानिक संस्थाओं की अस्मिता को बचाना वर्तमान कार्यकारी का कार्यभार है ।
कोई भी शासक निरंकुश, असफल और पंगु होने लगता है तो उसे हटाने के लिए विधि का प्रयोग किया जाता है और इसके कार्यान्वयन की व्यवस्था भी करता है ।
नागरिक को शक्तिशाली बनानेवाला न्याय प्रणाली स्वतंत्र होता है । २०४७ के संविधान ने प्रधानमंत्री को किसी भी समय चुनने और हटाने का अधिकार संसद् को दिया था । उसी तरह प्रधानमंत्री को किसी भी समय संसद् विघटन करने के अधिकार की व्यवस्था की थी । इन दोनों अधिकार में प्राथमिकता किसको मिलेगा ? बहुदलीय व्यवस्था की पुनःस्थापना ऐसी समय हुई थी जबकि सर्वसत्तावाद का अंत हो रहा था ।
वर्तमान संविधान ने संसद् को प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री को संसद् में उठा पटक करनेवाली प्रवृत्ति को रोकने का उपाय किया है । अभी के घटनाक्रम में प्रधानमंत्री और कार्यपालिका के नियंत्रण और वर्चस्व संसद् के ऊपर अत्यधिक दिखा जिसके कारण संसद् सरकार को तात्विक रूप से नियंत्रण और मार्गदर्शन करने में असमर्थ और असक्षम हो गया । परिणाम स्वरूप संसद् का कभी स्थगन तो अभी विघटन ही हो गया ।
खड्ग प्रसाद कल के प्रधान काजी, प्रधान अमात्य या मुख्तियार नहीं हैं । संसद् प्रति जबावदेह निर्वाचित प्रधान सेवक हैं लेकिन वे अपनी भूमिका को भूल गए । प्रधानमंत्री में दिखने वाला वैयक्तिक कमजोरी, अनुशासनहीनता, नैतिक विचलन और विकृति के कारण वे संविधान के ऊपर ही खग्रास–खड्ग–ग्रहण बन गए हैं ।
अदालत निर्जीव नहीं है और न ही कार्यकारी की स्वेच्छाचारिता की प्रतिच्छाया । न्यायपालिक पर ही जनअपेक्षा टिकी है । न्यायपालिका को प्रधानमंत्री द्वारा उठाए गए कदम के औचित्य, वे जिस अर्थ में संवैधानिक व्याख्या करना चाहते हैं, संसद् विघटन के औचित्य और कार्यकारी के निहित स्वार्थ का परीक्षण करना होगा । अदालत को अपनी शक्ति और स्वतंत्रता को सीमित नहीं करना चाहिए तभी उसे संविधान के व्याख्याता के रूप में वैधता मिलेगा तब जाकर नेपाली लोकतंत्र खड्ग–ग्रहण से मुक्त हो सकेगा ।
