२०२० में जहाँ पूरा विश्व कोरोना की भयंकर महामारी के त्रास में मर और जी रहा था वहीं नेपाल में कोरोना से भी ज्यादा तनावपूर्ण और विवादपूर्ण रहा राजनीतिक गलियारा । देश में इतिहास की दो तिहाई की सबसे मजबूत कम्यूनिस्ट सरकार केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में सत्तासीन थी, उसके बावजूद देश प्रत्येक क्षेत्र में लँगड़ते हुए चल रहा था क्योंकि उनके दंभ और हठ की वजह से विपक्ष की ओर से नहीं पार्टी के भीतर से ही अडंÞगा लग रहा था । पार्टी के भीतर वर्चस्व तथा अधीनायकवादी नीति की वजह से नेकपा के अध्यक्ष ओली को पार्टी के ही दूसरे अध्यक्ष दाहाल के तीव्र विरोध का सामना करना पड़ रहा था । दाहाल को वरिष्ठ नेताओं माधवकुमार नेपाल तथा झलनाथ खनाल का भी पूर्ण समर्थन मिल रहा था । इस मूँछ की लड़ाई में अपने को कमजोर होने की जानकारी पाते ही ओली ने सबसे पहले संसद् के चालू अधिवेशन सत्र को ही खत्म कर दिया । उसके बाद भी पार्टी के भीतर स्थिति बेहतर न होते देख प्रधानमंत्री ओली ने अविश्वास के प्रस्ताव का सामना न करना पडेÞ यह सोचकर संसद् ही विघटित कर अपने को दो तिहाई की बहुमत वाली सरकार से काम चलाऊ सरकार परिवर्तित कर लिया । परिणाम नेकपा विभाजन के कगार पर पहुँच गई । दूसरे अध्यक्ष प्रचंड ने ओली को पद से हटाते हुए माधव कुमार नेपाल को उनके स्थान पर नया अध्यक्ष चुन लिया । इस तरह ओली गुट और प्रचंड–नेपाल गुट में नेकपा बँट गयी । उसके बाद तो दोनों ही गुटों के बीच कानूनी, वैधानिक तथा फूहड़ जंग छिड़ गयी । जो कि वर्ष २०२० के समाप्त होने के बाद भी जारी है । अब देखना यह है कि २०२१ इस जंग का परिणाम क्या लाता है !
२०२१ में विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस में जहाँ महाधिवेशन कराने को लेकर महाभारत मचा रहा वहीं यह दल संसद् अधिवेशन की समाप्ति हो या संसद् विघटन ढुलमूल रवैया अपनाएं रहा है और लोकतंत्र में एक सशक्त विपक्ष की भूमिका निर्वाह करने में असफल रहा । तीसरी विपक्षी जनता समाजवादी पार्टी जहाँ आकार में विस्तृत हुई राजापा के मिलन से, वहीं इस दल में आंतरिक खींचातानी पूरे समय कायम रही । अपने दलीय पद के बँटवारे में मग्न जसपा के नेताओं को देश की बाकी समस्याओं के प्रति ध्यान ही नहीं गया ।
लेकिन जब सांसद पद खत्म हुआ तो इनकी नींद टूटी और उसके बाद सड़कों पर नाराबाजी करते दिखे । जो भी हो कोरोना जहाँ विश्व को डराए सहमाए हुए है वहीं नेपाल में कोरोना से नहीं नेताओं के इरादों से जनता डरी–सहमी हुई है ।
पता नहीं २०२१ राजनीतिक दृष्टि से देश को कहाँ पहुँचाएगा !

कोरोना वर्ष
इसी तरह विश्व में कोरोना संक्रमण की वजह से ८ करोड़ ३१ लाख व्यक्तियों ने जान गँवायी । यद्यपि कोरोना संक्रमण के विरुद्ध वैक्सीन भी बना और ब्रिटेन, अमेरिका तथा चीन आदि देशों में वैक्सीन देना भी शुरू हो गया है । लेकिन २०२० में कोरोना ने पूरे विश्व को आर्थिक–सामाजिक रूप से कमर तोड़ कर रख दिया ।

अमेरिका में नया नेतृत्व
२०२० में अमेरिका में नये राष्ट्रपति के लिए निर्वाचन हुआ और डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जॉन वाइडेन वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को पराजित कर अमेरिका के नये राष्ट्रपति बने । उन्हीं के साथ पहली बार एक महिला कमला ह«यरिश उपराष्ट्रपति बनीं ।

भारत में चर्चित किसान आंदोलन
भारत में २०२० का अंत देशव्यापी किसान आंदोलन के साथ हुआ । नरेन्द्र मोदी सरकार के नये कृषि उत्पादन वाणिञ्य तथा व्यापार प्रोत्साहन और प्रवद्र्धन ऐन, २०२० को लेकर जो आंदोलन छिड़ा वह अभी तक जारी है ।
इसी तरह इन चर्चित घटनाओं से घिरा रहा वर्ष २०२० ।
