-माया ठकुरी
आधी रात का व्यक्त था । अचानक दरवाजेपर हरिहर ने जर–जर से लात मारते हुए चिल्लाकर कहा, चुड़ैल औरत… सांझ ढलते हि विस्तर में घुस जाती है । शर्म नाम की कोई चीज नहीं दरवाज खोलती हो या तोड़ दंइसे….
दिन भर बीमार बच्चे की सेवा टहल और घर के काम की वजह से थक कर अभी अभी आंख लागी थी अंबिका को । देखा मैं कब से दरवाज पर खड़ा होकर चिल्लाए जा रहा हूं पर इस औरत को नहीं खोलती है या नही ? पहले से अधिक जर से चिल्लाया था हरिहर ।
पति की कर्कश आवाज के कारण जाग गई अम्बिका । उसने धीरे से दरवाज खोल दिया ।
पति जब शाम को घर वापस आए तो उसे खाना परोस कर देने कि सोच नहीं है तुम में ? समझती क्या है अपने आप को ? ऐसे ही रंग दिखाती रहेगी तो ठीक नहीं होगा कह देता हूं । मंै मर्द हंू मर्द । मैं दस औरत रखूँ तो भी कोई कुछ कहने वाला नहीं । तू औरत जात है एक बार जुठी हो गई तो भीगे कागज की तरह हो जाती है, कुछ काम की नहीं रहती, संझी ? शराब की नशे में धुत्त हो कर शरीर को आगे पीछे हिलाते हुए कहा था हरिहर ने ।
खाना गरम करूँ ? हमेशा की तरह हरि की नारजगी की ओर ध्यान न देते हुए कहा था अंबिका ने ।
क्याें ? भूख सिपर् तुझे लगती है क्या ? मुझे नहीं ? हर दिन तुम यही पूछती रहती हो । ज्यादा बात करने कि आवश्यकता नहीं और खिच् खिच् करेगी तोह मुंह पर लात मारकर सारी की सारी जबड़ा तोड़ दूगा । पैर की जूती पैर ही मैं सुहाती है, सर पर नहीं, संझी ?
मोढ़े पर बैठकर मोजे उतारते हुए कहा था हरिहर ने । मैंने साेंचा आप आज भी उधर ही खाकर आए है । दबी हुई आवाज में कही थी अंबिका ने । अच्छा तो तुझे उस से जलन हो रही है…तू अपने आपको उस्से तुलना नहीं करोगी तो अछा है । वह एक शानदार औरत है । तुझ जैसी फूहड़ और बदसूरत नहीं । तेरे शरीर से हमेशा तेल, हल्दी और लहसुन की बास आती है । मुझे तुझे देखकर, घिन… बड़बड़ाते हुए कपड़ा बदला था हरिहर ने ।
अंबिकाने खाना गरम करके मेजÞ पर रख दी । क्याें, आज भी खाने में वही दाल रोटी और सब्ज बनाई ? तुझे पता नहीं इस तरह का खाना मेरे हलक से नहीं उतरती । खाना परोसे थाली की ओर देखते हुए कहा हरिहर ने ।
पास में पैसे नहीं थे । जो था उससे बच्चे के दिए दवा खरीदी ली ।
बातें बनाना खूब जानती है तू मुझे पता है तुझे घमंड है अपने आप परा पाडोसियाें के कपडे सिलकर जो पैसे तू कमाती है उसे कहीं जमा करके रखा होगा, लेकिन मेरे सामने हर समय पैसे न होने की दुखडा रोना है छिनाल । ले, तू खा ले यह खाना । मैं नहीं खाऊंगा कहते हुए क्रोध से खाने की थाली जमीन पर पटककर जूठे हाथाें कमरे से बाहर निकल गया था हरिहर ।
अंबिका अपने हृदय में उठी पीड़ा कि ज्वारभाटा को सम्हालते हुए जमीन पर बिख्री हुई अन्न को बटोने लगी ।
जा ! तू जा के यह गंदा कपड़ा बदलकर आ बिस्तर पर जल्दी आ । कुछ ही देर बाद कमरें के अंदर आ कर कहा था हरिहरने ।
जब अंबिका की शादी हरिहर से हुई थी वह सिपर् सत्रह सालकी थी ।
शादी से पहले अंबिका ने भी अपनी शादी को लेकर बहोत सारे रंगीन सपने संजोए थे । पर हरिहर की पत्नी होने के बाद अम्बिका के सपनाें का महल एकाएक ढह गया था हर पल पति द्वारा प्रताडि़त होती रही ।
हरिहर की नजराें में नारी की देह सिपर् और सिपर्m पुरुष के मनोरंजन का साधन था । पुरुष उसे खिलौना समझ कर मन चाहे रूप से उसके शरीर से खेल सता था । हरिहर को अंबिका की इच्छा अनिच्घा से काई सरोकार नहीं था । रात सिपर्m मेरी है । पत्नी होने के नाते तुझे मेरी हर बात माननी होगी । अंबिका की देह को पशु समान व्यवहार करके अपने पुरुष होने को अहं तुष्टि करता था वो ।
एक रात की बात है उस रात भी हरिहर सदा की तरह शराब पीकर देर रात घर पहुंचा । उस रात भी पत्नी के ऊपर क्रोधित होकर उसने अनाप शनाप बका । जब अंबिका ने उन आरोपाें का अपनी बाताें से खंडन करने का प्रयत्न किया तब उत्तेजना ओर क्रोध में आ कर हरिहर ने अंबिका के बाल पकड़कर खीचते हुए उसके कोमल शरीर पर लात बरसाना शुरू किया ।
देख ! आज मैं तुझे किस तरह सबक सिखाता हूं । पत्नी को निर्घात रूप से चोट पहुंचाने हुए कहा उसने ।
कुछ देर तक अंबिका को पीटने के बाद उसे वहीं सिसकते हुए हुई छोड़कर बाहर निकल गया था । हरिहर ।
हरिहर के कमरे के बाहर निकलने के बाद जैसे तैसे अपने शरीर को संभालते हुए अंबिका उठी और जाकर बच्चे के पास लेट गई ।
अच्छा ! तो तु यहां आराम फरमा रही है ? चल उठ, कपड़े बदलकर आ बिस्तर पर । कमरे के भीतर आकर हरिहर ने चिल्लाकर कहा अंबिका से ।
मै आज यहीं बच्चे के पास सोऊंगी । दबी हुई आवाज में कहा था अंबिका ने । बड़ी हिम्मत आ गई तुझ में, है ? लगता है तुझे मार कि कभी पड़ी है । कहते हुए हरिहर ने उसे जर से दबोच कर निर्दयता पूर्वक घसीटना शुरू किया । कमरे में आवाज सुन कर बच्चा नींद से जगकर चिल्ला कर रोने लगा । दुःख और पीड़ा से तरपड़े कर अंबिका ने अचानक हरिहर की जाँध पर अपने दांत गड़ा दिए ।
अहो ! दर्द से तिलमिलाकर हरिहर के मुंह से सिसकारी निकली । और उसने अंबिका के बाल छोड़ दिए ।
अम्बिका ने रोते हुए बच्चे को उठाकर उसका पीठ थपथपाने लगि ।
पत्नी को सामने अपनी पराजय होते हुए ठानकर हरिहर मुठ्ठी तानकर उस पर आक्रमण करने को तत्पर हुआ । लेकिन हरिहर को न जाने क्या हुआ उसका सारा शरीर एकाएक शिथिल पड़ गया और वो थरथराते हुए जमीन पर ढ़ल गया । अंबिका ने उसको उठाने कि कोशिश कि पर किसी तरह भी वो उसे उठा न सकी ।
उसके बाद कुछ पड़ोसियाें की मदद से हरिहर को अस्पताल ले जाया गया ।
डॉक्टरी परीक्षण के बाद पता चाल कि हरिहर को लकबा मार गया था वह देख, सुन सकता था पर उसके सर से नीचे का मांग सुन्न पड़ गया था ।
दो महीने तक हरिहर अस्पताल में रहा
अंबिका ने सक भर उसका इलाज करवाया । लेकिन उसमें कोई भी सुधार नहीं आया । जब तक हरिहर अस्पताल में था, अंबिका ने उसकी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी । उसे पति की सेवा में दिन रात लगी हुई देखकर उसके रिश्तेदार और पड़ोसी उसे सावित्री की संज्ञा देते हुए तारीफ करते नहीं थकते ।
पूरे दो महिने अस्पताल में रहने के बाद जब हरिहर को अपने कमरे में लाया गया, यह उसी रात की बात है, अंबिका ने दाल, चावल और सब्जी सब एक ही बर्तन में रखकर खिचड़ी बनाई और बच्चे को खिलाया । फिर खुद भी खाया । हरिहर को भी थोड़ा सा खिलाया । उसके बाद उसने रात को सरसों के तेल में हात डुबोकर हरिहर के चेहरे और बालाें में उड़ेल कर चिपचिपा कर दिया ।
आपको मेथी और लहसुन की गंध बिलकुल पसंद नहीं है ना ? लेकिन मुझे बहुत पसंद है । विस्फारित नजराें से अंबिका के चेहरे को देख रहे हरिहर के चेहरे की ओर देखते हुए व्यंग्य पूर्वक बोली अंबिका सच ! मैंन तोह भुल दाग नहीं हैं । मैं हल्दी और तेल लगा कर आती हूं । अंबिका ये कहकर वहां से उठ कर चूल्हे के पास गई और अपने कपड़े पर लगाया ।
आपको मेरे मुंह पर और शरीर से लहसुन की बास आती थी है न ? जो आप को बिल्कुल पसंद नहीं है लेकिन क्या करूं ? मुझे तो लहसुन कच्चा ही खाना पसंद है, खाऊ ? अंबिका ने एक टुकड़ा लहसुन अपने मुंह पर रख कर आवाज निकालते हुए चबाना शुरू किया । सुंघकर देखिए तो । कितनी मीठी सुगन्ध है । हरिहर के मुंह के करीब अपना मुंह ले जा कर सांस छोड़ते हुए कहां अंबिका ने ।
अंबिका की असामान्य क्रियाकलपाें के कारण हरिहर की नजरो में विस्मय का भाव उभर आया ।
हमारी शादी के बाद आज पहली बार मंै अपनी मरजी से अपना गाल आपके गालाें में सटाकर सोना चाहती हूं सो जाऊ ? हरिहर की अश्रुपूर्ण आंखाें की और देखते हुए कहां अंबिका ने फिर उसके बाद उसने हौव्ले हौव्ले अपने चेहरे से हरिहर के चेहरे का स्पर्श करते हुए दृढ़ आवाज में कहां अंबिका ने “रात तो मेरी भी है ।”
