शरीरिक रूप से सक्रिय रहना जरूरी है वरना मोटापा के शिकार बन सकते हैं । मोटापा कैंसर के लिए एक जरूरी रिस्क फैक्टर है, दुनिया भर में लगभग १०–१५% कैंसर मामलों के लिए मोटापा जिम्मेदार है । इसका मुख्य कारण मेटाबोलिक और हार्मोनल चेंज हो सकता है । हालांकि लाइफस्टाइल में कुछ बदलावों जैसे– बैलेंड डाइट, फिजिकल एक्टिविटी, मेटाबोलिज्म में सुधार, अच्छी नींद और स्ट्रेस मैनेजमें से मोटापे और उससे जुड़े हेल्थ प्राब्लम्स को कम किया जा सकता है ।
स्टडी में यह पाया गया है कि मोटापा कई तरह के कैंसर से जुड़ा हुआ है, मोटापा के कारण नियंत्रण नहीं करने पर १३ प्रकार के कैंसर का निमंत्रण दे सकते हैं । जिसमें ह्दय, फेफड़ा, पैक्रियाज, किडनी, खाने की नली, स्तन, कोलोन रेक्टम, पेट, पित्त की नली ,गर्भाशय गर्भाशय के मुख का और पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर शामिल है ।
मोटापे और कैंसर के बीच संबंध
मोटापे और कैंसर के बीच मुख्य संबंध शरीर में होने वाले मेटाबोलिक और हार्मोनल चेंज से आता है । एक प्रमुख कारण इंसुलिन प्रतिरोध है, जो इंसुलिन जैसे वृद्धि कारकों (क्ष्न्ँ) के प्रोडक्शन को बढ़ाता है. क्ष्न्ँ के हाई लेवल सेल ग्रोथ को बढ़ावा देते हैं और सेल के मरने (एपोप्रोसी) को कम करते हैं, जिससे कैंसर के विकास का खतरा बढ़ जाता है । इसके अलावा, ज्यादा वसा टिश्यू से होने वाली पुरानी सूजन (इन्फ्लेमेशन) डीएनए को नुकसान पहुंचाती है, जिससे कैंसर का खतरा और बढ़ जाता है । मोटापे के कारण आंत के माइक्रोबायोटा में बदलाव भी सूजन को बढ़ाता है, जो कैंसर के विकास के लिए सही वातावरण बना सकता है ।
मोटापे से संबंधित कैंसर की रोकथाम
अच्छी बात यह है कि मोटापे से संबंधित कैंसर को हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाकर रोका जा सकता है । एक बैलेंस वेट बनाए रखने के लिए बैलेंस डाइट जरूरी है । ऐसी डाइट जो फल, सब्जियां और साबुत अनाज से भरपूर हो, शरीर को जरूरी पोषक तत्व और एंटीऑक्सिडेंट प्रदान करता रहे । साथ ही सूजन और ऑक्सीडेटिव तनाव को कम करने में भी मदद करता रहे ।
रोजाना फिजिकल एक्टिविटी भी कैंसर की रोकथाम में एक जरूरी भूमिका निभाती है । रोजाना कम से कम ३० मिनट व्यायाम करने से मेटाबोलिज्म में सुधार होता है और फैट कम होती है, जिससे कैंसर का जोखिम काफी हद तक घटता है ।
पर्याप्त नींद और स्ट्रेस मैनेजमेंट भी मोटापे और उससे जुड़े हेल्थ प्राब्लम्स को कम करने में महत्वपूर्ण हैं । खराब नींद और हाई स्ट्रेस हार्मोनल डिसबैलेंस का कारण बनते हैं, जो वजन बढ़ाने और सूजन को बढ़ाते हैं, जिससे कैंसर का खतरा बढ़ता है.
हेल्दी लाइफस्टाइल
हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाकर व्यक्ति मोटापे से संबंधित कैंसर के खतरे को कम कर सकते हैं । इसमें हेल्दी डाइट, रोजाना एक्सरसाइज, पूरी नींद और स्ट्रेस मैनेजमेंट शामिल है । इससे व्यक्ति मोटापे को कम करते हैं और मोटापे से संबंधित कैंसर के जोखिम को भी कम कर सकते हैं ।
बिना धूम्रपान किए भी फेफडेÞ के कैंसर रोगियों की संख्या में बढ़ोत्तरी
विश्व कैंसर दिवस है और इस मौके पर एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है । लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि फेफड़े का कैंसर सिर्फ धूम्रपान करने वालों को ही होता है । लेकिन एक नई रिसर्च ने इस धारणा को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है । लैंसेट के एक अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि लैंसेट रेस्पिरेटरी मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, बिना धूम्रपान किए भी फेफड़े के कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और इसका एक बड़ा कारण वायु प्रदूषण हो सकता है । इस शोध को इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर और वल्र्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के वैज्ञानिकों ने किया है । इसमें ग्लोबल कैंसर ऑब्जर्वेटरी २०२२ के डेटा का विश्लेषण किया गया, जिसमें पाया गया कि एडेनोकार्सिनोमा नामक लंग कैंसर नॉन–स्मोकर्स में सबसे अधिक पाया जा रहा है ।
रिसर्च में यह भी सामने आया कि २०२२ में दुनियाभर में लंग कैंसर के कुल मामलों में ५३–७०% मामले उन लोगों में पाए गए, जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया ।
एडेनोकार्सिनोमा क्या है
एडेनोकार्सिनोमा एक प्रकार का लंग कैंसर है, जो उन ग्लैंड्स में विकसित होता है जो शरीर में बलगम और पाचन से जुड़े तरल पदार्थ बनाती हैं । यह कैंसर खासकर महिलाओं और एशियाई देशों में तेजी से बढ़ रहा है । स्टडी में यह भी बताया गया है कि लंग कैंसर के इस प्रकार का संबंध धूम्रपान से बहुत कम है, लेकिन वायु प्रदूषण और वातावरण में मौजूद सूक्ष्म कण (एः २.५) इसका बड़ा कारण हो सकते हैं ।
वायु प्रदूषण बन रहा है कैंसर का कारण !
शोधकर्ताओं के अनुसार, दुनियाभर में फेफडेÞ का कैंसर के बढ़ते मामलों में वायु प्रदूषण का अहम योगदान है । खासतौर पर एः २.५ जैसे प्रदूषक कण फेफड़ों में गहराई तक जाकर सेल्स को नुकसान पहुंचाते हैं और कैंसर का खतरा बढ़ाते हैं । २०२२ में लंग कैंसर से पीडि़त महिलाओं में से ८०,३७८ मामलों का सीधा संबंध वायु प्रदूषण से पाया गया ।
महिलाओं और एशियाई देशों में अधिक खतरा !
स्टडी में यह भी बताया गया कि फेफड़े के कैंसर से होने वाली कुल मौतों में नॉन–स्मोकर्स का पांचवा स्थान है । यह समस्या खासतौर पर महिलाओं और एशियाई देशों में तेजी से बढ़ रही है । क्ष्ब्च्ऋ के प्रमुख वैज्ञानिक फ्रेडी ब्रे ने कहा कि आज के समय में फेफड़े के कैंसर के बढ़ते मामलों के पीछे धूम्रपान की बदलती आदतें और वायु प्रदूषण दो मुख्य फैक्टर हैं । इससे बचने के लिए सरकारों को तंबाकू कंट्रोल और वायु प्रदूषण कंट्रोल पॉलिसी लागू करनी होंगी ।