वन जीवन है,वन भी जीवनयापन का माध्यम है । वन से मनुष्य मात्र ही नहीं समग्र प्राणी और वनस्पति के बीच भी अन्योन्याश्रित संबंध है । एक दूसरे के बिना दोनों का अस्तित्व नहीं रहेगा । मानव जाति सृष्टि से जीविकोपार्जन तक वन और वनस्पति पर निर्भर है । प्राण वायु के साथ–साथ दैनिक जीविकोपार्जन के लिए मनुष्य को वन पर निर्भर रहना पड़ता है । प्रदूषण नियंत्रण के लिए वन चाहिए । पानी के स्रोत संरक्षण में वन की आवश्यकता होती है । दैनिक जीवन में आवश्यकता पड़ने वाले लकड़ी,जलावन,घास–पात से लेकर जड़ी–बूटी के उत्पादन में वन का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है । खेतीबारी, पशुपालन,वन पैदावर में आधारित उद्योग संचालन,जलविद्युत, पर्यटन ,निर्माण आदि विविध कार्यों में वन–जंगल की अहम् भूमिका रहती है । इसका संबंध रोजगार,आय अर्जन और जीविका के साथ साथ समग्र अर्थतंत्र से जुड़ा हुआ है ।
देश का ४५ प्रतिशत भू–भाग को वन क्षेत्र ढके हुए है । जबकि लगभग ६० लाख हेक्टर राष्ट्रीय वन क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जिसमें चुरे वन देश के करीब १३ प्रतिशत भूभाग में फैला हुआ है । इलाम से लेकर डडेल्धुरा के ३६ जिलों में कुल ८०० किलो मीटर क्षेत्र में चुरे का फैलाव है । वन, वन्य–जन्तु, जल,पत्थर आदि पदार्थों से यह क्षेत्र भरा पड़ा है । इन क्षेत्रों का व्यावसायिक व्यवस्थापन न कर सकने के कारण उससे प्राप्त होने वाले फायदे से वंचित होना पड़ रहा है ।
दूसरी ओर पूर्वाधार विकास के नाम पर और शहरीकरण के कारण वनों का व्यापक रूप से विनाश किया जा रहा है । विशेषकर चुरे का दोहन सरकारी तौर पर और अवैध ढंग से भी वनों को काटने, पत्थर और बालू का उत्खनन कर आयात करने जैसा कार्य धड़ल्ले से जारी है ।
वनों में स्वार्थ स्वरूप आगजनी की घटनाएँ काफी बढ़ गई हैं । पिछले कुछ वर्षों से हजारों हेक्टर वन जल कर राख हो गए । परिणाम स्वरूप पेड़–पौधों तथा जड़ीबूटी का विनाश तो हुआ ही उनपर या उनके आसपास रहने वाले वन जन्तुओं का भी विनाश होता जा रहा है जिसकी वजह से पर्यावरण में असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो रही है । प्राकृतिक स्रोत के उपयोग के साथ ही उसका संरक्षण भी संघीयता के अंतर्गत कार्यान्वय करना जरूरी है ।


सन् २०२० न केवल मानव विनाश की दृष्टि से बल्कि वनों के विनाश की दृष्टि से भी अत्यधिक विनाशकारी रहा । मेरीलैंड विश्वविद्यालय और ग्लोबल फॉरेस्ट वाच की एक समीक्षा अध्ययन में कहा गया है कि ४२ हजार वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र का विनाश हो गया है । यह विनाश पिछले २० वर्षों से ज्यादा समय से जारी है । वन विनाश विशेषकर अमेजन क्षेत्र,कांगो और दक्षिण पूर्वी एशिया में सबसे ज्यादा हो रहा है । ब्राजिल में ही १७ लाख हेक्टर वन क्षेत्र का विनाश हुआ है । अमेजन क्षे.त्र मे. आगलगी के कारण वनों का अत्यधिक विनाश हुआ है । ये वन क्षेत्र कार्बन की मात्रा को नियंत्रण करने और विश्व के जलवायु का नियमन करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका खेलते आ रहे हंै । वन विनाश का कारणों को देखें तो कृषि व्यवस्थापन के लिए कृषकों द्वारा खेतों में आग लगाने का कार्य किया जाता है जिसकी वजह से बड़ी संख्या में वन संपदा जलकर नष्ट होती जा रही है । इसके अलावा वनों की अंधाधुन कटाई करने से भी वनों का तीव्रता से विनाश हो रहा है । महामारी तथा आर्थिक संकट की मार से बचने के लिए भी विश्व के अनेक देश वनों का व्यापारिक प्रयोग करने में लगे हुए हैं ।
अमीर राष्ट्रों में भी वन विनाश धड़ल्ले से जारी है । जर्मनी में
सन् २०१८ की तुलना में २०२० में वन विनाश तीन गुणा ज्यादा हुआ है । इसी तरह ऑस्ट्रेलिया में प्रतिकूल मौसम और आगलगी के कारण पिछले दो वर्षों में नौ गुणा वन क्षेत्र का विनाश हुआ है । जलवायु परिवर्तन के कारण भी वनों का विनाश हुआ है और हो भी रहा है । जबकि इंडोनेशिया और मलेसिया ने वन विनाश को रोकने के लिए कारगर कदम उठाए हैं । बाकी देशों को भी उनसे सीख लेते हुए वन विनाश रोकने के लिए कमर कसने होंगे ।

 

 

 

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