आज कोयली को नयी आँख मिलने वाली है ।
आप भ्रम में न जाइए, कोयली कोई पक्षी नहीं है । यह उस लड़की का नाम है जिसके जन्म होने पर उसका काला रंग देखकर घरवालों ने कोयली नामकरण कर दिया था । संयोग देखिए की उसका रंग ही काला नहीं था, आँखों के सामने भी काली छाया रहती थी । उसे क्या उसके घरवालों को भी यह जानकारी तब हुई जब वह तीन महीने की हुई । कहा जाता है न सोने पर सुहागा या कोढ में खाज
कोयली का जीवन भी उसके नाम जैसा ही काला बन जाता लेकिन उसकी माँ ने बेटी को यह अहसास दिलाकर कि बेटी अच्छा है कि तुम इस कुरूप संसार को देख नहीं पा रही हो वरना ।
मां उसके साथ हमेशा साए की तरह रहती । देखते देखते कोयली ताड की तरह बढ़ने लगी थी ।
पढ़ाई में निपुण कोयली को माँ की देख रेख में आर्दश नागरिक बनने का मौका मिला । उसकी सहेली कमला को सौंदर्य की वजह से मान मिलता तो कोयली को अपनी कार्यदक्षता की वजह से
मां बताती जमाने में योग्य व्यक्ति को ही याद किया जाता है । पर सौंदर्य तो दो दिनों का होता है, उम्र ढलते ही सब गायब ।
बेटी, तुम योग्य बनोगी तो समाज याद करेगा । कोयली ने मां की बातें गाँठ बाँध ली थी ।
कोयली के विवाह के लिए लड़कों की तलाश शुरू हो गई थी क्योंकि अब वह भी जवान हो रही थी ।
उस दिन जब लड़के वालों ने उसके रंग और अंधेपन का मजाक उड़ाया तो कोयली ने बिफरते हुए माँ से कहा था–“ मां आपने उनलोगों को मेरे बारे में नहीं बताया था । ”
मां बेबसी भरी आवाज में कहने लगी “बेटी तुम्हारे गुणों को बताया था । हमें क्या पता कि गुण के आगे अवगुण भारी पर जाऐं गे ।”
”नहीं, मां मैं विवाह नहीं करूंगी । मैं अपना और आपका अपमान नहीं सह सकती । आपने हमें सक्षम बनाया है, मैं अपना जीवन जी लूँगी ।”कोयली कहने लगी ।
उस दिन डॉ संदीप रुईत ने जब कोयली को आँख बदलने का सलाह दी तो वह तैयार हो गई । उसकी आँखों में भी शायद रंगीन शब्द का मतलब देखने की इच्छा बलवती हो गई लेकिन जैसे ही उसे ऑपरेशन थिएटर में ले जाने के लिए नर्स आई तो उसने जाने से बिल्कुल मना कर दिया । माँ के कहने पर भी नहीं मानी तो डॉ रुईत समझाने आए । तब अचानक कोयली यह कहते हुए कमरे से बाहर निकल गई “मुझे रंग से नहीं नियत से बनी काली दुनिया को देखने की कोई ख्वाईश नहीं है । मैं अपनी काली दुनिया के रंगीन माहौल में ही ठीक हूं ”
वीणा सिन्हा
