कोरोना ने पुर्नजीवित किया हमारे प्राचीन संस्काराें को !

कोरोना महामारी जहाँ लोेगों के जीवन पर नकारात्मक असर डाल रहा है वहीं इसके कुछ सकारात्मक प्रभाव भी  पड़ रहे हंै । हमारी सभ्यता और संस्कृति काफी समृद्घ और सुसंस्कृत रही है लेकिन समय के साथ साथ आधुकिता के अंधे दौर में भागते हुए हम अपने अतीत के धरोहरों को भी भूलते चले गए । लेकिन कोरोना ने उनकी अहमियत को अहसास ताजा ही नहीं ब्लकि उसे आज की अनिर्वाय  आवश्कता बना दिया है ।

सत्तल अर्थात् सेल्फ आइसोलेशन

प्राचीन नेपाल घाटी में तीन राज्य और तिब्बत के बीच व्यापार होता था ।उनदिनों घाटी में रहने वाले नेवार समुदाय के व्यापारी

तिब्बत तक पैदल जाते आते थे । तिब्बत से लौटकर आनेवाले

व्यापारी जब काठमांडू पहुँचते थे तो उनलोगाें को सत्तल में सेल्फ आइसोलेशन में रखा जाता था । विभिन्न देवस्थलों के नजदीक बनाए गए पाटी को सत्तल कहा जाता है । ऐसे सत्तल आज भी काठमांडू के पुराने देवस्थलों में देखा जा सकता है ।

प्राचीन अभिलेखों में उल्लेखित है कि तिब्बत आने जानेवाले व्यापारीे हैजा आदि बीमारी के शिकार बन जाते थे । उनसे ये बीमारी उनके परिवार के सदस्यों तथा समाज में न फैले इसलिए ऐहतियात के तौर पर दो सप्ताह तक उन्हें सत्तल में अनिर्वाय रूप से रहना पड़ता था । समय पूरा होने के बाद स्वस्थ रहने की स्थिति में ही उन्हें

स्नान और सफाई क बाद  घर जाने की इजाजत मिलती थी ।

आज कोरोना संक्रमण काल में दूसरे देश या एक जिला से दूसरे जिला में प्रवेश करने पर १४ दिनों का सेल्फ आइसोलेशन में अनिर्वाय रखने की सरकार िव्यवस्था उसी परम्परा का झलक दिखलाता है ।

नगर प्रवेश करने से पूर्व शारीरिक स्वच्छता

प्राचीन काल में नगरप्रवेश द्वार बनाए जाते थे और द्वार के बाहर ही कुआँ तथा ढुंगेधारा की व्यवस्था रहती थी । नगर प्रवेश करनेवाले को उन पानी के स्रोतों से अपना हाथ पैर और चेहरे को धोकर ही नगर प्रवेश की इजाजत मिलती थी । आजकल कोरोना से बचाव के उपायों में हाथ मुँह धोने पर विशेष जोर दिया जा रहा है ।

गले मिलने के बजाय हाथ जोड़कर नमस्कार करना

जब से कोरोना का कहर छाया है , मुलाकात होने या विदाई के समय हाथ मिलाने या गले मिलने की परम्परा को त्याग कर नमस्कार करने का प्रचलन विश्व भर में देखा जा रहा हेै ।

यूरोप हो या अमेरिका या चीन सभी देशों में नमस्कार की संस्कृति

सरेआम देखने को मिल रही है । हमारी संस्कृति में नमस्कार का प्रचलन सदियों से चला आ रहा है । हाथ जोडकर नमस्कार करना हमारे संस्कारों में गहरे रूप  से जड जमाए हुए है । आज पूरा विश्व इसका अनुशरण कर रहा है ।

सामाजिक दूरी

कोरोना से बचाव के लिए सामाजिक दूरी की अपरिर्हायता को देखकर ही डब्लू एच ओ ने भी इस पर जोर दिया है । डब्लू एचओ ने सामाजिक दूरी बनाए रखने के लिए विश्वभर सभी देशों से लॉकडाउन की सिफारिश करता आ रहा है । कुछ महीनों तक विश्व के विभिन्न देशों में लॉकडाउन भी किया गया । एक रिपोर्ट के अनुसार लॉकडाउन की वजह से विश्व भर में ३० लाख लोगों को कोरोना से होने वाले मौतों से बचाया जा सका । आज भी इस महामारी के संक्रमण से बचाव के लिए लोगो ंको घरों में रहने की सख्त हिदायत दी जाती है । पुराने जमाने मे. भी ज्वर या सर्दी खाँसी होने पर समाज और परिवार के सदस्यों से दूरी बनाकर रखने की परिपाटी रही है ।

स्पष्ट है कोरोना ने हमारे विलूप्त हो रहे प्राचीन संस्कारो. और मान्यताओं को एक बार फिर से न केवल जीवित किया है ब्लकि उसकी सीमाओं का विस्तार करते हुए उसे पुनः स्थापित किया है ।

म्हिला हिंसा

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