बारा–२ के चुनाव को समूचे मधेश की राजनीति के सत्ता संघर्ष का विषय बना दिया गया है । जसपा अध्यक्ष उपेंद्र यादव और जनमत पार्टी के अध्यक्ष सीके राउत में इस बात को लेकर संघर्ष चल रहा है कि मधेश की राजनीति में किसका प्रभुत्व रहेगा, मधेश का प्रमुख नेता कौन होगा । अध्यक्ष यादव और जनमत अध्यक्ष राउत के बीच मुकाबला दिलचस्प होता जा रहा है । यादव ०६३ के मधेश आंदोलन की विरासत को आगे बढ़ाने वाले नेता हैं । १६ साल से संसद का चक्कर लगा रहे यादव और छ महीने पहले ही संसदीय राजनीति में आए राउत का यह चुनावी मुकाबला मधेश की ताकत से जुड़ा है ।
यदि जनमत प्रत्याशी कुशवाहा हारते हैं, तो सीके राउत के लिए इसका बड़ा प्रभाव नहीं होगा क्योंकि बारा –२ जनमत की विरासत वाली जगह नहीं है, लेकिन अगर उपेंद्र यादव हार गए, तो उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में खुद को फिर से स्थापित करने में कठिनाई हो सकती है । इस लिहाज से बारा–२ का चुनाव राष्ट्रीय दिलचस्पी का तथा प्रतिष्ठा का मामला बन गया है ।
२०७९ के प्रतिनिधि सभा का चुनाव में जसपा पार्टी अध्यक्ष उपेन्द्र यादव के अप्रत्याशिक पराजय के बाद, जसपा की पूरी पार्टी लाइन निराश हो गई थी । हालांकि कुछ ही महीनों में अध्यक्ष उपेंद्र यादव इस डैमेज को कंट्रोल’ करने में कामयाब हो गए । जनमत पार्टी के अध्यक्ष डॉ.सिके राउत से सप्तरी–२ में प्रतिनिधि सभा के सदस्य के चुनाव हारने के बावजुद उपेंद्र यादव की सत्ता समीकरण के खेल में खुद को और अपनी पार्टी को सम्मनजनक स्थिति में लाने की वजह से सीके राउत बौखलाए हुए हंै ।
यह आम धारणा बन रही थी कि उपेंद्र यादव और उनके नेतृत्व वाली पार्टी चुनाव हारने के बाद खत्म हो जाएगी । लेकिन उपेंद्र ने उन सभी स्थितियों को अपने काबू से बाहर नहीं होने दिया यानी जल्द ही ‘डैमेज कंट्रोल’ कर लिया ।
चुनाव के बाद उपेंद्र यादव ने न केवल मधेश प्रदेश में जसपा के नेतृत्व में सरकार बनाई, बल्कि सत्ता सीट के बंटवारे में अपनी भूमिका बढ़ाते हुए उपराष्ट्रपति पद भी अपनी पार्टी के हिस्से में ले आए ।
पार्टी नेता रामसहाय यादव को उपराष्ट्रपति निर्वाचित करवाने में सफल रहे । जबकि वे खुद स्वीकार करते थे कि संसद में हमारी सीट संख्या कम होने की स्थिति में हम बार्गेनिंग की स्थिति में नहीं हंै, उसके बावजूद उन्होंने प्रयास नहीं छोड़ा और कहा जाता है कि कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती !
अब यादव खुद संसद में आने के लिए चुनावी मैदान में हैं । बारा–२ से चुनाव जीतकर आए रामसहाय यादव को उपराष्ट्रपति बनने के बाद वह क्षेत्र खाली हो गया था । वहीं से वे चुनाव जीतकर संसद आने के लिए उम्मीदवारी दिए हंै । उपेन्द्र यादव की छवि के बारे में बतौर जनमत अध्यक्ष डॉ सीके राउत भी देश के एक चर्चित चैनल पर अंतर्वार्ता में स्वीकार किया था कि ‘उपेन्द्र यादव एक संघर्षशील नेता हैं और मधेश के लिए काफी संघर्ष और त्याग किए हैं ।’
उनके जुझारूपन का यह उदाहरण सटीक है कि २०७४ के चुनाव के बाद तत्कालीन एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली को अपमानजनक व्यवहार से ऊबकर सरकार छोड़ने के बाद जसपा अध्यक्ष उपेंद्र यादव ने अपनी राजनीतिक रणनीति के तहत ओली को सत्ताच्यूत का अभियान छेड़ दिया था । जब एमाले अध्यक्ष ओली ने प्रधान मंत्री के रूप में संसद को भंग कर दिया, तो उपेंद्र यादव ने न केवल इसके खिलाफ आंदोलन शुरू किया, बल्कि ओली के खिलाफ कांग्रेस और माओवादी केंद्र को भी खड़ा किया । और अंततः ओली की सरकार को गिराकर बदला लिया ।
ओली सरकार के जाने के बाद पांच दलों का गठबंधन बनाने में भूमिका निभाने वाले उपेंद्र यादव ने कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद अपनी पार्टी से अन्य नेताओं को भेजा । लेकिन इस मान्यता के तहत की राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुष्मन नहीं होता, उस समय जिस ओली नेतृत्व की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए उन्होंने विरोध आंदोलन किया था, उसी ओली से परिस्थितिवश २०७९ के आम चुनाव में हाथ मिला लिया । जिसके कारण उपेंद्र यादव की काफी आलोचना हुई थी । क्योंकि मधेश का एमाले के प्रति सकारात्मक रवैया नहीं था ।
विडंबना यह हुआ कि इस चुनाव में जसपा को पहले की तुलना में कम सीटें मिलीं । यहां तक कि खुद उपेंद्र यादव भी चुनाव हार गए । इस तरह यह विश्लेषण किया गया कि पार्टी के अध्यक्ष की हार और चुनाव में पार्टी के कमजोर होने का कारण एमाले के साथ समन्वय था । लेकिन उपेंद्र यादव उस आरोप को स्वीकार नहीं करते हैं । उनके करीबियों का कहना है कि अगर उपेंद्र यादव कांग्रेस–माओवादी के नेतृत्व वाले पांच दलों के गठबंधन में रहते तो माधव कुमार नेपाल की तरह एक–दो सीटें और जीत लेते, लेकिन कोई राष्ट्रीय पार्टी नहीं होती । उनलोगों का मानना है कि कम सीटें होने के बावजूद जसपा आखिरकार राष्ट्रीय पार्टी बनने में सफल रही है ।
एमाले–जसपा के हस्ताक्षरित समझौते में, यह उल्लेख किया गया है कि चुनाव के बाद भी एमाले–जसपा गठबंधन जारी रहेगा । हालांकि, चुनाव के बाद, उपेंद्र यादव विराटनगर पहुंचे और घोषणा की कि एमाले के साथ गठबंधन समाप्त हो गया है । यद्यपि पार्टी के कुछ नेता उनकी इस घोषणा से असंतुष्ट भी थे । उस घोषणा के साथ ही वे फिर से कांग्रेस के नेतृत्व वाले पांच दलों के पुराने गठबंधन के करीब आने लगे ।
चुनाव के बाद सरकार बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई ।
राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच सहमति नहीं बनने के बाद माओवादी अध्यक्ष प्रचंड ने कांग्रेस छोड़ दी और आश्चर्यजनक रूप से एमाले अध्यक्ष ओली से हाथ मिला लिया । उपेंद्र यादव ने भी प्रचंड का समर्थन किया । नया गठबंधन बनाने के बाद उन्होंने अपनी पार्टी के नेतृत्व में मधेश प्रदेश में सरकार बनाने में सफलता प्राप्त की । इस बात पर सहमति बनी कि जसपा और जनमत आधे–आधे कार्यकाल के लिए सरकार का नेतृत्व करेंगे ।
सरकार गठन के लिए सत्ता बंटवारे में एमाले अध्यक्ष ओली ने उपेंद्र यादव की उपेक्षा कर माओवादी केंद्र के अध्यक्ष प्रचंड, आरपीपी अध्यक्ष राजेंद्र लिंगडेन, नेशनल इंडिपेंडेंट पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने के साथ राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, स्पीकर, डिप्टी स्पीकर सहित मंत्रालय भी बांट लिया ।
उसके बाद उपेंद्र यादव प्रचंड और ओली के इसे ओछापन को देखकर कांग्रेस अध्यक्ष देउवा से एक नए गठबंधन के लिए चर्चा शुरू की । उसके लिए उन्होंने माओवादी केंद्र के अध्यक्ष प्रचंड को देउवा से जोड़ने का काम शुरू किया ।
इसके बाद प्रचंड ने प्रधानमंत्री विश्वास मत हासिल करने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष देउवा से बातचीत शुरू की । उस बातचीत के बाद प्रधानमंत्री प्रचंड का सूर बदल गया और वे कहने लगे, ‘राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के लिए एमाले से कोई समझौता नहीं हुआ है ।’
इसके साथ ही राजनीतिक परिदृश्य तथा घटनाक्रम तेजी से बदलने लगा, चार दल, कांग्रेस, माओवादी केंद्र, एकीकृत समाजवादी और जसपा ने एक गठबंधन बनाया । राष्ट्रपति पद, उपराष्ट्रपति और अन्य सत्ता पद साझा करने के लिए चार–पार्टी गठबंधन में सहमति बनी कि कांग्रेस राष्ट्रपति, जसपा उपराष्ट्रपति और बारी–बारी से माओवादी, कांग्रेस तथा एकीकृत समाजवादी से प्रधानमंत्री होंगे । चार दलों के गठबंधन में सब कुछ फाइनल होने के बाद, जनमत, नागरिक मुक्ति, राष्ट्रीय जनमोर्चा, नेपाल समाजवादी पार्टी और आम जनता पार्टी को शामिल करने के लिए किया गया था । यह सब जसपा अध्यक्ष की राजनीतिक कौशलता के कारण ही संभव हो पाया ।
इतिहास के पननों को पलटे तो २०६४ के पहले संविधान सभा के चुनाव के बाद भी उपेन्द्र यादव अपनी चतुराई से अपनी पार्टी में उप–राष्ट्रपति दिलवाने में कामयाब रहे थे । उपेंद्र यादव की वजह से उस वक्त राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों ही मधेशी समुदाय से बन पाए थे । उपेंद्र उसी तुरुप के पत्ते का इस्तेमाल कर इस बार भी उप–राष्ट्रपति हासिल करने में कामयाब हो गए हंै ।
इतना ही नहीं उपेंद्र अपने राजनीतिक कौशलता तथा उत्कृष्ट नेतृत्व क्षमता के बलबूते से देश के बड़े तथा नामी–गिरामी नेताओं को अपने नेतृत्व वाली पार्टी में लाने में कामयाब भी रहे । विजय कुमार गच्छदार, शरत सिंह भंडारी, जेपी गुप्ता, महंत ठाकुर, डॉ. बाबूराम भट्टराई, अशोक राई, राजेंद्र महतो, अनिल कुमार झा, राजकिशोर यादव, रामेश्वर राय यादव जैसे नेता उनके नेतृत्व वाली पार्टी में शामिल हुए ।
यह अगल बात है कि उन नेताओं के स्वार्थपरता की वजह से उपेंद्र यादव की पार्टी कई बार टूटती–फूटती रही है । उसके बावजूद वे पार्टी की प्रतिष्ठा की रक्षा करने में सफल रहे हैं । उपेंद्र यादव को खत्म करने के कई प्रयास हुए, लेकिन उन्होंने अपनी काबिलियत और मेहनत से पार्टी बनाने और उसके अस्तित्व को कायम रखने में कामयाबी हासिल की है ।
मधेश के वे आज भी सर्वाधिक लोकप्रिय तथा आशा और अपेक्षा के प्रतीक नेता हैं । इस बार भी अनेक तरह के जाल झमेल अनके दलों द्वारा किया जा रहा है ताकि वे संसद में न पहुँच पाए । इसके लिए मधेश के नेता और दलों का इस्तेमाल किया जा रहा है । उनके खिलाफ सबसे ज्यादा बोलने तथा आरोप लगाने का कार्य मधेशी दलों के द्वारा ही हो रहा है । उनकी उम्मेदवारी का विरोध मधेश प्रदेश सरकार में उन्हीं के नेतृत्व वाली पार्टी अर्थात जसपा नेतृत्व में मंत्री पद ले चुके दल के अध्यक्ष और नेता कर रहे हैं । मधेश में अभी भी एक तपका है, जो सीके को शक की निगाह से देखता है । कुछ ऐसे नेताओं–कार्यकर्ताओं के भी उदाहरण हैं जो उन पर भाई–भतीजावाद और भाई–भतीजावाद का आरोप लगाकर उन्हें छोड़कर उपेन्द्र के अभियान में शामिल हो गए । उपेंद्र यादव के समर्थक उन्हें विदेशी शक्तियों की उपज तक मानते हैं । जोकि मधेश के मुद्दे को कमजोर करने के लिए उसपर प्रहार करने के लिए उपेन्द्र यादव पर हमला बोल रहे हैं ।
उपेंद्र यादव बारा–२ से चुनाव लड़ने के लिए नेपाली कांगे्रस, माआवादी लोसपा तथा एकीकृत समाजवादी दलों के गठबंधन के साझा उम्मीदवार बनने में सफल रहे हंै । दूसरे शब्दों में, यह टिप्पणी की जाने लगी कि वे हार कर भी जीत जाते हंै ।
स्पष्ट है, संसद में उनकी अनुपस्थिति में मधेश का मुद्दा कमजोर होगा और मधेश तथा मधेशी विरोधी ताकते यही चाहती हंै कि मधेशी कभी भी एकजुट न हो । आपस में भिड़ा दिया जाए । अभी तक तो वे शक्तियाँ कामयाब भी हो रही हंै । इतिहास गवाह है सबसे ज्यादा समस्या मधेश में है और यही कारण है कि मधेशी कभी आपस में तो कभी सरकार से अपनी समस्याओं के समाधान के लिए लड़ते रहते हैं, आंदोलित होते रहते हैं । लेकिन स्मरण रहे, उपेन्द्र यादव भी एक मंजे हुए राजनीतिक के खिलाड़ी हैं । हारी हुई बाजी जितना उन्हें आता है । क्योंकि बाजी पलटना तथा पलटवार करने में भी निपूर्ण हैं । उनके समर्थक उन्हें ‘मधेश का मसीहा’ कहते हैं । मधेश की आम जनता में यह भावना व्याप्त है कि उपेंद्र यादखव वह शख्स है जो मधेश के मसीहा हैं, और मधेशियों का हक दिलाने आएं हैं । यह निर्वाचन मधेश के दो बुद्धिजीवी पार्टी अध्यक्ष के बीच मूँछों की भी लड़ाई बन गयी है ।
उपनिर्वाचन की तैयारी जोर शोर से आरंभ हो गई है । इंतजार है पूरे देश को, क्योंकि इस उपनिर्वाचन में सबसे ज्यादा चर्चा बारा–२ अर्थात उपेन्द्र यादव के चुनाव लड़ने और उनकी हार जीत के विश्लेषण पर टिकी है।

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