आसमान में धुएँ की चादर है,
सूरज भी धुंधला–धुंधला दिखता है,
पेड़ों की कतार अब तस्वीरों में है,
नदी का पानी बोतलों में बिकता है।
हमने विकास के नाम पर जंगल काटे,
पर्वत खोदे, नदी रोकी,
और फिर मंच पर भाषण दिया—
æहम धरती को बचाएँगे
लेकिन धरती अब भी अपने घाव चुपचाप सह रही है।
गाँव में बच्चे बिन छाँव के खेलते हैं,
पक्षी रास्ता भूल गए हैं,
मिट्टी की गोद अब बंजर हो चुकी है,
और बारिश—कभी बहुत जदा, कभी बिलकुल नहीं आती।
समाज भी मौसम की तरह बदल गया है—
दिलों में धूल, बातों में जÞहर,
हम जाति–धर्म में बँटकर खड़े हैं,
जैसे एक–दूसरे को हराकर
हम अपनी भूख मिटा लेंगे।
शहर की सड़कों पर भीड़ भाग रही है,
पर किसी के पास रुकने का समय नहीं,
क्योंकि रुकना मतलब
किसी और की तकलीफ देख लेना,
और हम तकलीफ देखने से डरते हैं।
माँ के हाथों का खाना अब फास्ट–फड के पोस्टर में है,
दादी की कहानियाँ अब गूगल के पन्नों में हैं,
और रिश्ते—बस स्टेटस अपडेट में जिंदा हैं।
धरती पुकार रही है—
मेरे दरख लौटा दो, मेरी नदियाँ साफ कर दो,
मेरे आसमान से ये जहर हटा दो,
और अपने दिलों से ये नफरत मिटा दो।
लेकिन हम सुन नहीं रहे—
हम मा‘ल में सेल देख रहे हैं,
सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग वीडियो देख रहे हैं,
और सोचते हैं कि सब ठीक है।
पर याद रखो—
जब आखीरी पेड़ कट जाएगा,
जब आखीरी नदी सूख जाएगी,
जब आखीरी पक्षी मर जाएगा,
तब हमें एहसास होगा
कि पैसा पीकर प्यास नहीं बुझती।
फिर भी उम्मीद बाकी है—
अगर आज एक पेड़ लगाओ,
अगर आज एक दिल जोड़ो,
अगर आज एक झूठ के बजाय सच बोलो,
तो धरती साँस लेगी…
और शायद हम भी इंसान कहलाएँगे।
