माँ, माँ, माँ…
तू सुन सुनकर कभी थकती नहीं,
माँ, माँ, माँ…
मैं कह कहकर कभी रुकती नहीं ।

तेरी ममता की छाँव में
न जाने कब मैं बड़ी हुई
घुटनों के बल चल चलकर
न जाने कब मैं खड़ी हुई ।

तूने प्यार का ऐसा प्यारा जादू चलाया,
तेरे सिवा किसी को न कभी सपनों में पाया ।
तूने नौ महीने मुझे अपनी कोख में पाला,
न जाने कितने कष्टों में अपना जीवन डाला ।

तेरा प्यार न जाने क्यों है सबसे निराला,
चोट लगी जब तूने प्यार से मुझे संभाला ।
वादा कर मुझे छोड़ कर कभी न जाएगी तू
अपने आँचल की छाया में सदा बसाएगी तू,
अपने आँचल की छाया में सदा बसाएगी तू ।

बसाएगी न माँ ???

––– नीति सिंघानिया,
कक्षा– दस (एफ)
डीएवी, काठमांडू

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