डा. गौरीशंकरलाल दास  


तक्लाकोट एक छोटा कस्बा था,जहाँ हमलोग पुरुंग गेस्ट हाउस में ठहरे हुए थे । वहाँ कोई होटल नहीं था । कर्णाली नदी के पुल के पार“नेपाली बस्ती”थी जहाँ नेपाली लोग रहते थे । खाना गेस्ट हाउस में ही मिलता था । चीनियाँ प्रशासन से मानसरोवर और कैलाश का अनुमति पत्र(परमिट) लेना पड़ता था । कमल नारायण जी ने यह कार्य संपन्न किया ,भाषा समस्या के बावजूद ! ठंढ़ तो बहुत थी ,तापक्रम माइनस ५–७ रहा होगा,पर धूप खिली हुई थी ; तीखी लगती थी ! हमलोगों ने नेपालियों से संपर्क कर मानसरोवर–कैलाश के लिए ट्रक का बन्दोबस्त किया और २१ ज्ूान ,१९९१ के मानसरोवर के लिए प्रस्थान किया । ज्ञातव्य है कि परिवहन के लिए कोई सड़क नहीं थी ,बल्कि सपाट मैदान से जाना पड़ता था ,जिसमें चूहे दिखते थे । हमलोग धूल–धूसरित मानसरोवर पहुँच थे । बाद वर्षों की यात्रा में लोगों के नकल कर हमलोगों ने भी मास्क का प्रयोग किया था । इससे दो फायदे थे–धूल और ठंढ़ से बचाव !
मानसरोवर स्नान के बाद करीब चार घंटे ट्रक में उत्तर की ओर चलकर हमलोग तारचेन पहुँचे ,२९ जून १९९१ ई.को । तारचेन बहुत ही छोटा कस्बा था जहाँ एक छोटा गेस्ट हाउस था । हमलोग वहीं ठहरे । वहाँ एक सोता भी था–बेहद प्रदूषित । यही से कैलाश की परिक्रमा प्रारंभ होती है । यहीं से कैलाश के दक्षिण मोहड़े के दर्शन हुए जिसकी राजेश ने फोटो ली थी जो अच्छी रही और उसी को बड़ा बनाकर मैंने ड्राइंग रूम में लगाया है । यहाँ से बायें होते पश्चिम की ओर जाते हैं । कुछ घंटों के बाद तारवोचो जगह पर पहुँचे (१६,२०० फीट) । यहाँ एक लंबा पोल गड़ा था जिसमें बौद्ध लोगों ने लंबी रस्सियों में झंडे लटकाएँ थे । कुछ देर विश्रामकर चलने के बाद पश्चिम मोहड़ा के दर्शन हुए । पश्चिम मोहड़ा कैलाश परिक्रमा के दौरान परिक्रमा पथ से सबसे कम दूरी पर है । पश्चिम मोहड़ा के दर्शन से पहले पत्थर के ४–५ मानव आकृति जैसे दीखते हैं । हुम्ला जिले के प्रमुख जिलाधिकारीने “सूर्य” नामक कर्मचारी को पथ प्रदर्शक के रूप में हमलोगों के साथ भेजा था । वही पथ प्रदर्शक ने हमलोगों को बतलाया कि वे पंच पांडव हैं । जो कैलाश में आकर स्वर्ग सिधार गए थे ! पश्चिम मोहडे से थोड़ा और आगे जाने पर चित्रकारी जैसी दिखती है ,कोई गणेश की छवि देखते हैं और किसी को घर की आकृति दिखाई देती है ।“जाकी रही भावना जैसी ,प्रभु मूरति देखी तिन्ह वैसी ”–रामचरित मानस में कहा गया है । इससे आगे बढ़ने पर ऐसा महसूस होता है जैसे मखमल पर चल रहे हैं ! चलते चलते शाम होने को होती है और दिखाई देता है उत्तर मोहड़ा ,जो सर्वाधिक सुन्दर है ।


तीसरी यात्रा में वहाँ फुहार जैसा पानी पड़ा और बादल छँट गया । फिर सूर्य की सुनहली रश्मि हिम मंडित उत्तर मोहड़े पर पड़ी और अत्यंत चित्ताकर्षक शमा दिखलाई पड़ा जिसे मैंने कैमरे में कैद कर लिया । वह चित्र भी ड्राइंग रुम की शोभा बढ़ा रहा है । हमलोग “उमा खोला” के किनारे–किनारे चल रहे थे । उसे लांघ कर उत्तर की ओर जाते तो न्यायरी गुम्बा पहुँचते, जहाँ जाने में करीब एक घंटा और लग जाता ,अतः हमलोग खोला के दक्षिण किनारे ही रहें और एक छोटा सोता पारकर ठीक उत्तर मोहड़ा के समाने ही टेंट गाड़ कर रात्रि बसर की । वहाँ भात पकाने की कोशिश की जो नाकामयाब रही–ऊँचाई की वजह से । अतः तत्काल आहार–सत्तू का सदुपयोग किया । दूसरे दिन बहुत सबेरे उठकर चले क्योंकि वहाँ से विकट चढ़ाई शुरू होती है । चढ़ाई में एक–एक पग पर साँस लेने के लिए रुकना पड़ता है । इसी तरह मंद गति से हमलोग पहुँचे “डोलमा–ला” जो १८,६००फीट की ऊँचाई पर अवस्थित है । ज्ञातव्य है कि इसकी ऊँचाई सगरमाथा के आधार शिविर से भी अधिक है ! यह बौद्ध मार्गी के लिए पूजा का स्थान है जहाँ वे लोग पूजा करते हैं । पताका ओर पैसे भी चढ़ाते हैं । यहाँ पहुँचने से कुछ पहले एक स्थान ऐसा है जहाँ लोग अपने केश का लट , अंडरवियर या और काई वस्त्र छोड़ जाते हैं ।
‘डोल्मा–ला’पहुँचने पर राजेश को सर दर्द शुरू हो गया । उसे उच्च रक्तचाप की शिकायत थी । अतः हमलोगों ने उसे तुरंत नीचे जाने को कहा,क्योंकि डोल्मा के बाद रास्ता नीचे की ओर जाता है । करीब आधा घंटा नीचे जाने के बाद दाहिनी ओर ‘उमा कुंड’ दिखलायी पड़ता है । इसको लोग पवित्र मानते हैं और नीचे उतरकर जल से अपने को सिक्त करते हैं । नीचे जाते–जाते फिर हमलोग उमा खोला के तीर पर पहुँच गए और शाम को उमा खोला को पारकर दक्षिण में स्थित ‘जुथुलफुक’ गोम्बा में रहे ।
उत्तरी मोहड़ा के बाद मार्ग कैलाश से दूर–दूर जाता है और कैलाश बहुत दूर स्थित दिखलाई पड़ता है । जुथुलफुक गोम्बा से चलकर करीब ११–१२ बजे ही फिर १६ आषाढ़ को तारचेन गेस्ट हाउस पहुँच गए और इस तरह पूरी हुई पवित्र कैलाश की प्रदक्षिणा !!
२०४८ साल १७ आषाढ़ (१ जुलाई १९९१)को सबेरे हमलोग भी भारतीय लोगों द्वारा संचालित हवन में शरीक हुए और उन्हीं के लिए आए बस में ३५सुकुर(यान) प्रति व्यक्ति भाड़ा देकर तक्लाकोट पहुँच गए । वहाँ पर पुरुंग लगेस्ट हाउस में ही ठहरे ।
दूसरे दिन २ जुलाई (१८ आषाढ़)को हमलोगों ने ३५० सुकुर(यान)देकर एक ट्रक रिजर्व किया और सेरा पहुँचे । जहाँ रात हमलोगों ने सूर्य की बहनों के घर में बितायी । सेरा से आगे हमलोगों के भार वाहकों ने जाना अस्वीकार किया । तब हमलोगों लाचारी में एक चवँरी ८०० रुपये देकर बंदोबस्त किया और यारी पहुँचे । यारी में तीन भार वाहकों की मदद से हमलोग दूसरे दिन मुचु होते हम लोगों ने यावलाङ के स्कूल में पहुँच कर रात काटी । दूसरे दिन ५ जुलाई (२१आषाढ़)को पोर्टरों ने आगे जाना अस्वीकार किया तो फिर एक चवँरी की सहायता से डाड़ा केरमी पहुँचे और वहाँ से डाडा फाया की भयंकर चढ़ाई पार कर ६ जुलाई (२२ आषाढ़) को सिमीकोट पहुँच गए । इस तरह सिमीकोट तक १६ दिनों में पहली मानसरोवर कैलाश यात्रा खत्म हुई । काठमांडू से तो १७ जून,१९९१ (२०४८ आषाढ़ ३ गते सोमवार) बस से चले थे नेपालगंज के लिए । नेपालगंज में नेशनल टेड्रिङ्ग के गेस्ट हाउस में ठहरे थे । १८ जून को डॉ.हिरण्यदेव प्रधान, डॉ.किदवई, डॉ.कनोडिया और रेडक्रास की सुश्री नर्वदा से भी मिले थे । वहीं प्रहरी के डीआईजी सोमनाथ उपाध्याय से भी मिले थे ।
इस तरह काठमांडू से १७ जून को चलकर ९ जून को रात १० बजे वापस आए – बढ़ी दाढ़ी और मूँछ के साथ । १० जुलाई को बाबा पशुपतिनाथ को मानसरोवर का जल चढ़ाया । शिवजी की अनुकंपा से ही यह यात्रा पूरी हुई !!

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