नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह फागुन २४ गते को कड़ी सुरक्षा के बीचे, पोखरा से जैसे ही काठमांडू के त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरे, राजशाही समर्थक राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं सहित सैकड़ों समर्थक उनके पक्ष में नारे लगाने लगे । ७७ वर्षीय ज्ञानेंद्र शाह देश के विभिन्न भागों में धार्मिक स्थलों का दौरा करने के बाद पोखरा से काठमांडू लौटे थे । हवाई अड्डे के बाहर सड़क के दोनों ओर ज्ञानेंद्र की तस्वीर और राष्ट्रीय ध्वज लेकर मोटरसाइकिलों पर सवार सैकड़ों समर्थकों ने उनका स्वागत किया ।
भीड़ में शामिल लोगों के हाथों में तख्तियाँ थीं, जिसपर ‘हमें अपना राजा वापस चाहिए’, ‘संघीय गणतंत्र प्रणाली को खत्म करो’, ‘राजशाही को बहाल करो’ और ‘राजा और देश हमारे जीवन से भी प्यारे हैं’ जैसे नारे लिखे हुए थे ।
काले रंग की गाड़ी में सवार पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह सड़कों पर जनता को अभिनन्दन कर रहे हैं, उसके बाद राप्रपा नेता–कार्यकर्ता और राजभक्त समूह निर्मल निवास जहाँ पूर्व राजा रहते हैं, तक नारा लगाते हुए गए । प्रदर्शनकारियों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तस्वीर वाली तख्तियाँ भी ले रखी थी । संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि राजा की सक्रियता में हिंदू संघ–संगठनों की भी सांठगांठ है ।
८ जनवरी को ज्ञानेन्द्र शाह की मुलाकात भारत के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से होने की खबरें आई थी । योगी आदित्यनाथ कट्टर हिंदूवादी नेता हैं और वे कई मौकों पर नेपाल को पुनः हिंदू राष्ट्र बनाने की बात कह चुके हैं । ऐसा शंका किया जा रहा है कि राजा के वापसीे के आड में छोटी–छोटी ताकतें संगठित हो रही हैं और इसके पीछे कोई बड़ी ताकत काम कर रही है । भले ही गणतंत्र संकट की स्थिति में नहीं है, लेकिन देश में किसी प्रकार की अराजकता का यह संकेत हो सकता है ।
इस घटनाक्रम का आरंभ तब हुआ जब लोकतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर, ज्ञानेंद्र ने ‘देशवासियों से देश को बचाने में मदद करने की अपील की’ इस अपील के बाद नेपाली राजनीति में हलचल मच गई ।
जेठ २९ गते २०६५ को, जिस दिन पूर्व राजा ज्ञानेंद्र ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करके नारायणहिटी राजपरिवार की गद्दी छोड़ी, उसी दिन से इस संभावना के बारे में चर्चा और बहस शुरू हो गई कि एक दिन राजशाही का पुनः उदय हो सकता है । तब से लेकर डेढ़ दशक तक ये अफवाह समय–समय पर चलती रही है । वर्तमान में राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी और वर्तमान पार्टी प्रणाली से असंतुष्ट कुछ व्यक्ति÷समूह योजनाबद्ध तरीके से सोशल मीडिया के माध्यम से यह अफवाह फैला रहे हैं ।
राजा की वापसी को लेकर ताजा अफवाहें फागुन ७ गते को ज्ञानेंद्र के सार्वजनिक बयान के बाद तेज हो गईं । बयान के बाद राप्रपा कार्यकर्ताओं ने देश के विभिन्न शहरों में उनके पक्ष में सड़कों पर रैलियाँ निकाले तथा प्रदर्शन किये ।
वहीं लोकतांत्रिक नेता भयभीत होकर उनके अभियान को देखते हुए खुद को आक्रामक रूप से प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है । पूर्वराजा की हालिया सक्रियता पर प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं ने प्रतिक्रिया दी है । प्रधानमंत्री केपी ओली से लेकर मुख्य विपक्षी दल के नेता पुष्पकमल दाहाल प्रचंड तक पूर्व राजा के रवैये पर नाराजगी जता रहे हैं । कम बोलने वाले कांग्रेस अध्यक्ष शेर बहादुर देउवा ने भी जता दिया है कि राजा वापस नहीं लौट सकते । उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा कि ‘गणतंत्र में राजा का कोई स्थान नहीं है । गणतंत्र राजा के कारण आया । जब तक जनता नहीं चाहेगी राजशाही वापस नहीं आएगी ।’
प्रधानमंत्री ओली और विपक्षी नेता प्रचंड ने चेतावनी दी है कि अगर ज्ञानेंद्र ने गलती की तो उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ेगी । कांग्रेस, एमाले और माओवादियों के दूसरे स्तर के नेताओं ने भी पूर्व राजा को पार्टी खोलने और राजनीति में प्रवेश करने की चुनौती दी है । दूसरे शब्दों में, पूर्व राजा की हालिया गतिविधियों के कारण, राजनीतिक क्षेत्र उत्तेजित और रक्षात्मक हो गया है । माओवादियों ने इसके चलते अपने पार्टी के हुलाकी रोड केंद्रित मधेश जागरण कार्यक्रम को भी स्थगित कर दिया है ।
प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली से लेकर गृह मंत्री रमेश लेखक तक पूर्व राजा शाह की गतिविधियों को लेकर तरह–तरह के बयान तथा चेतावनी दे रहे हैं । सदूर–पश्चिम के कार्यक्रम में शामिल हुए प्रधानमंत्री ओली ने पूर्व राजा शाह को चेतावनी दी कि “अगर किसी को यह सपना आए कि कोई किसी की हत्या कर देगा और अराजकता के रास्ते पर चलकर कुछ हासिल कर लेगा, तो बेहतर होगा कि ऐसा सपना न देखें ।”
पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह की सक्रियता को लेकर एक–दूसरे पर आरोप–प्रत्यारोप करने वाले सत्ताधारी और विपक्षी दलों के नेता न सिर्फ एक साथ आ गए हैं, बल्कि एक सुर में विरोध भी कर रहे हैं । सड़क से लेकर सदन तक सरकार और विपक्ष के नेताओं द्वारा दिए जा रहे बयानों से क्या देश फिर से एक और संकट में नहीं फँस रहा है ? या फिर पूर्व राजा ‘शाह’ किसी शक्ति सत्ता की आड़ में प्रेरित हैं, यह सवाल आम नागरिकों के बीच खड़ा हो गया है ।
पूर्व राजा शाह के स्वागत में राजा समर्थकों द्वारा सड़क पर किए गए प्रदर्शन ने नेताओं को सबक दिया है कि उन्हें अपने कार्य तथा चरित्र का मूल्यांकन करना चाहिए । विश्लेषकों का कहना है कि राजनीतिक दल सरकार की स्थिरता, सुशासन और वितरण के मुद्दे पर गंभीर नहीं हैं और राजा समर्थकों का खुश होने का मुख्य कारण यही है ।
यदि राजनीतिक दल के नेता गलतियाँ सुधारना शुरू नहीं करेंगे, गलतियाँ दोहराते रहेंगे, सुशासन और सार्वजनिक सेवा की उपेक्षा करते रहेंगे तो उन्हें बहुत कठिन स्थिति का सामना करना पड़ेगा । स्पष्ट है, राजा समर्थक चाहते हैं कि सरकार का अब मुख्य काम सुशासन और निष्पक्ष सेवा के काम को प्रभावी बनाना होना चाहिए ।
नेताओं का तर्क है कि जिस राजशाही को जन आंदोलन द्वारा स्थापित संसद की वैधता से उखाड़ फेंका गया था, उसे ऐसी एक या दो घटनाओं से वापस नहीं किया जा सकता है और गणतंत्र कमजोर नहीं होगा । अन्य देशों में जहाँ राजतंत्र को उखाड़ फेंका गया है, वहाँ यदि राजा को राजनीति करनी हो तो वह वैधानिक तरीके से एक राजनीतिक दल खोल लेता है ।
संविधान ने यह छूट पूर्व राजा शाह को भी दी है । शाह की जिस तरह की सक्रियता सड़कों पर दिख रही है, वह राजनीति करने की चाहत से प्रेरित है । संविधान सभा द्वारा जारी संविधान के विपरीत किसी अन्य व्यवस्था की आप कितनी भी वकालत करें, उसे पूरा करना संभव नहीं है । इसके बजाय, एक राजनीतिक पार्टी खोलना बेहतर है ।
राजनीतिक विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि राजभक्तों के अभियान में सड़कों पर दिखने वाले नागरिकों का असंतोष देश में व्यापक कुशासन और खÞराब हालत के कारण है । एक ही व्यक्ति लंबे समय तक सरकार में रहता है, देश आर्थिक रूप से मजबूत नहीं हो पाता, सुशासन कायम नहीं रहता, युवा लोग विदेश चले जाते हैं आदि । सामान्य नागरिक नेताओं और पार्टियों का विकल्प तो ढूँढ़ सकते हैं, लेकिन राजतंत्र गणतंत्र का विकल्प नहीं हो सकता ।
प्रमुख राजनीतिक दलों के नेता भी सत्ता हासिल करने के लिए सरकार विरोधी ताकतों पर हमला कर रहे हैं । कभी उसका असंतोष बालेन के रूप में फूटता है तो कभी गोपी हमाल और हार्क संपांग के रूप में फूटता है ।
सत्ता के लिए बार–बार लड़ने की प्रवृत्ति है, राजनीतिक दल का नेतृत्व २०४८ से ही सत्ता के केंद्र में है और सरकार में आने के बाद लोगों की अपेक्षाओं के बजाय व्यक्ति और पार्टी के हित में आगे बढ़ना आम बात है । कई लोगों का तर्क है कि इससे नागरिकों में निराशा बढ़ी है । नेताओं को ऐसी प्रवृत्ति से आगाह करने का काम राजभक्त करते रहे हैं । हालाँकि इस वजह से व्यवस्था और गणतंत्र के लिए लड़ने वाली राजनीतिक ताकतों को कमजोर नहीं समझा जाना चाहिए ।
राजतंत्रवादियों के एक दिन के प्रदर्शन से गणतंत्र कमजोर नहीं होगा ।
नेपाल में राजशाही गणतंत्र का विकल्प नहीं हो सकता है । राजभक्त और उच्छृंखल लोगों द्वारा उकसाए गए सड़क प्रदर्शनों से गणतंत्र को कमजोर नहीं किया जा सकता ।
यह कहना अर्धसत्य है कि समाज में सभी नेता बुरे हैं, सब कुछ सही है, गलत है । सच तो यह है कि नेतृत्व उस भावना से काम करने में असमर्थ था जिस भावना से देश में राजनीतिक परिवर्तन हुए और देश गणतंत्र में शामिल हुआ । यह भी सच है कि लोगों की आशाएँ और अपेक्षाएँ टूट गयी हैं ।
हालाँकि, एक आजमाई हुई और परखी हुई लेकिन तिरस्कृत राजशाही के माध्यम से लोगों की अधूरी अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को संबोधित करना संभव नहीं है । इसके बजाय, कानून और मूल्यों की सीमा के भीतर एक समृद्ध और उन्नत लोकतंत्र के लिए एक मजबूत जनसंघर्ष की आवश्यकता है ।
इस समय धुंधली होती राजनीति को ठीक करने और लोकतंत्र को सही ढंग से व्यवहार में लाने के लिए ऐसे ही जनसंघर्ष की जरूरत है ।

राजतंत्र की विदाई में ज्ञानेन्द्र की अहम भूमिका थी
सबसे पहले, १५ जेठ २०६५ को आयोजित संविधान सभा की पहली बैठक में नेपाल को विधिवत ‘संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य’ घोषित किया गया । उस दिन से नेपाल में राजशाही की विदाई हो गई और गणतंत्र की स्थापना हुई । हालाँकि संविधान सभा की एक घोषणा राजशाही को विदाई देती प्रतीत होती है, लेकिन इसकी एक विशेष ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है । न्यायालय और पार्टियों के बीच सत्ता के लिए चल रहे संघर्ष में गणतंत्र की स्थापना लोकतंत्र की एक ऐतिहासिक जीत थी । राजदरबार जनता के बुनियादी अधिकार छीनकर निरंकुशता थोपता था और पार्टियाँ लोकतंत्र थोपती हैं ।
नेपाली राजनीति पुनस्र्थापना के लिए संघर्ष जारी रखने की दिशा में घूम रही थी । २०६३ के ऐतिहासिक आंदोलन ने देश को गणतंत्र की ओर मोड़ दिया । इससे पहले, १९ जेठ २०५८ को राजदरबार नरसंहार ने राजशाही को कमजोर कर दिया था ।
राजदरबार हत्याकांड के बाद दूसरी बार राजा बने ज्ञानेंद्र ने देश को और अधिक गणतांत्रिक बना दिया । दूसरे शब्दों में कहें तो २४० साल की विरासत के ढहने के पीछे ज्ञानेंद्र ही मुख्य कारण थे । उन्होंने न्यूनतम एवं बुनियादी नागरिक अधिकारों से वंचित कर दिया । संसदीय राजनीतिक दलों और हिंसक राजनीति की धरती पर खड़े माओवादियों दोनों को हाशिये पर धकेल दिया गया । सत्ता पर कब्जÞा करने की उनकी महत्वाकांक्षा अंततः इन पार्टियों को लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने के लिए एक साथ ले आई । जन आंदोलन सफल रहा ।