

महाकवि कालीदास ने अपने महाकाव्य मेघदूत में मेघ को दूत बनाकर अपनी प्रियतम के पास प्रेम संदेश भेजने की परंपरा का प्रारंभ किया था । महाकवि कालीदास का मेघदूत तो पावस में इसकी व्याकुलता को लक्ष्य करके ही लिखा गया है । ऐसी परंपरा हिन्दी साहित्य में शायद ही प्रारंभ हुई लेकिन हिन्दी के महाकवि अपने महाकाव्य में वर्षा ऋृतु के वर्णन में अपनी लेखनी निरंतर सक्रिय करते रहे हैं । इस की लम्बी परंपरा हिन्दी काव्य साहित्य में अनवरत रूप से चलनी आ रही है । वर्षा ऋृतु प्रेमी प्रेमिका के सहवास और साहचर्य में सराहनीय भूमिका के संर्दभों को रेखांकित और रूपांतरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका खेलती आयी है । वर्षा ऋृतु और वसंत ऋृतु दोनों को कामोत्तेजक ऋृतुओं में गणना होती रही है । वसंत ऋृतु तो रति राग की विशेष ऋृतु ही मानी जाती है और यह ऋृतु प्रेमी प्रेमिका के संयोग के सगों में आनन्द की अतिशय अभिवृद्धि कर देती है ।
मानो यह ऋृतुृ काम कला और कामात्तेजेना की ही ऋृतु हो । कवियों ने अपने काव्यों में इस ऋृतु के वर्णन में और इसके नैसर्गिक सौंदर्य के वर्णन में खासकर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है । यहाँ मेरा विषय है वर्षा ऋृतृ में विरह की लंबी परंपरा को संक्षेप में प्रस्तुत करने का है । वर्षा ऋृतु किस तरह विरहिणी नायिका के अंग प्रत्यंग में सिहरन पैदा कर देती है ।
यह ऋृतु विरह के सर्गों में विरह विदग्ध नायिकाओं को किस तरह तड़पाती है, छटपटाती है और विचलन में डाल देती है । कोशिश है इसकी एक छोटी–सी तस्वीर पेश करने की । इस भाव की बहुत बड़ी लंबी परंपरा है । कवियों और लोक कवियों ने इसका सविस्तार वर्णन किया है ।
महाकवि सूरदास ने विरह विदगधा नायिका के विरहजन्य दुःख को मर्मस्पर्शी एवं मार्मिक वर्णन किया है । सूरदास की नायिका की आँखों में आठ आठ आँसू निरंतर प्रवाहित हो रहे हैं जो थमने का नाम नहीं लेता । है । इसका मुख्य कारण है नायिका राधा को छोड़कर कृष्ण प्रवास में जाकर बैठ गए हैं । उसकी सुध तक नहीं लेते हैं । राधा रात रात भर विरह में रोती रहती है । प्रीतम के विरह में प्रियतमा की स्थिति दयनीय और सोचनीय हो जाती है । महाकवि सूरदास की बन्द आँखों ने इसका अनोखा वर्णन किया है । जो अतुलनीय है , अनुपम है । उन्होंने अपनी काव्य प्रतिभा कौशल का अद्भुत प्रदर्शन इन अमर पंक्तियों में किया है । प्रस्तुत है एक छोटी–सी बानगी–
“सदा रहत पावस ऋृतु हम पै
जब ते श्याम सिधारे ।
वरिष्ठ कवि नागार्जुन ने महाकवि कालीदास से काव्यात्मक भाषा में संवाद करते हुए ः
“कालीदास सच सच बतलाना !
वर्षा ऋृतु की स्निग्ध भूमिका
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का
देख गगन में श्याम घन घटा
विधुर यज्ञ का मन जब उल्टा
खड़े खड़े तब हाथ जोड़कर
चित्रकूट के सुगम शिखर पर
उस बेचारे ने भेजा था
जिनके ही द्वारा संदेश
उन पुष्करावत्र्त मेघों का
साथी बनकर उड़ने वाले ”
डॉ. किरण कुमारी गुप्त ने अपने गं्रथ ‘हिन्दी काव्य में प्रकृति चित्रण’ पृ.१५९ में लिखा है ः–
प्रकृति उन्हें कामोत्तेजित करती है । वे कृष्ण मिलन के लिए व्यग्र हो जाती हंै । उन्हें यह विचार कर बड़ा आश्चर्य होता है कि उनके कृष्ण अतृप्त होकर उनसे मिलने का प्रयास क्यों नहीं करते हैं । संभवतः पावस ऋृतु में उनकी बुद्धि कुंठित हो जाती है । वे यही विचारती है ः–
“परम वियोगिनी गोविन्द बिन कैसे बितवे दिन सावन के
हरित भूमि भरे सलिल सरोवर
मिटे मग्न मोहन आवन के
दादुर मोर सारंग मिल सो है
निसा सूरमा बन के ।”
महाकवि विद्यापति ने वियोग में बारह मासे का सुन्दर वर्णन किया है । वियोगिनी को प्रत्येक मास विकल बनाता है । कभी वह भयभीत होती है ,कभी प्रकृति को सुखी देखकर ईष्या करती है, कभी कामवश होती है ; कभी सुख के दिनों की स्मृति में आँसू बहाने लगती है और कभी उन्मादिनी सी होकर प्रलाप करती है । श्रावण मास में देखिए–
“सावन मास बारिश धन वारि,
पंथ न सूझ निसि अंधियारी
चौदिस देखिए निजुरी रेह,
से सखि कामिनी
श्रावण मास में अंधेरी जीवन सदेह ।”
रात और बिजुली की चमक उनकी नायिका राधा में भय का संचार करती है । वर्षा की काली घटाएँ उसे भयभीत करती है ।
महाकवि विद्यापति की राधा तो यह अभिव्यक्ति के लिए अभिशप्त हो जाती है –
“सखि मोर पिया
अब हु न आआले कुलिस हिया ।”
महाकवयित्री मीरा तो स्वयं कृष्ण के विरह में अहोरात विरहग्नि में जलती सी प्रतीत होती है ।
देखिए निम्नलिखित पंक्तियों में उनकी पीड़ाः–
“ मत वारो बादल आयो रे
दादुर मोर पपीहा बोले कोमल शब्द सुनायो रे
कारी अंधियार बिजली चमकै,
विरहिन जाति डर पायो रे ।”
कविवर जानकी वल्लभ शास्त्री ने तो यहाँ तक कह डाला कि आज तक किसी नायिका का पूरा नाम राधा नहीं हो सकता ।
क्योंकि राधा जीवन भर विरह में ही तड़पती रही । देखिए उनकी पंक्तियाँ कैसे सावन की सरस बूँदों से भरी पड़ी है ः–
”गया ढार फुहार नभ उर खोल
इन्द्रधनु किसका टंगा जय बोल
कहीं कोई छाँह जाती कांप
राधिका की गूँजती पदचाप
एक भी कलिका खिली वन बाग
गंध जाती राधिका का राग
मिलन आधा, विरह आधा नाम
क्या किसी का पूर्ण राधा नाम !”
जानकी वल्लभ शास्त्री ःराधा पृं ९५
प्रसिद्ध कवि राम नरेश त्रिपाठी की सुमना के वियोग से दुखित होकर वसंत के प्रकृति भी अश्रु गिराती हुई प्रतीत होती है –
“पता नहीं किसके वियोग में
वन में नदी तटों पर तरुवर
मेरी तरह रुदन करते हैं । ”
ः डॉ .राम दयाल राकेश
”गया ढार फुहार नभ उर खोल
इन्द्रधनु किसका टंगा जय बोल
कहीं कोई छाँह जाती कांप
राधिका की गूँजती पदचाप
एक भी कलिका खिली वन बाग
गंध जाती राधिका का राग
मिलन आधा, विरह आधा नाम
क्या किसी का पूर्ण राधा नाम !”
जानकी वल्लभ शास्त्री ःराधा पृं ९५
प्रसिद्ध कवि राम नरेश त्रिपाठी की सुमना के वियोग से दुखित होकर वसंत के प्रकृति भी अश्रु गिराती हुई प्रतीत होती है –
“पता नहीं किसके वियोग में
वन में नदी तटों पर तरुवर
मेरी तरह रुदन करते हैं । ”
ः डॉ .राम दयाल राकेश
