कोरोना छोटे–बड़े में फर्क नहीं करता । कोरोना संक्रमण से बच्चे भी बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं । अभी कोविड के कारण विश्व के एक सौ ८६ देशों के २ अरब ३४ करोड़ बच्चे प्रभावित हैं । यूनिसेफ के अनुसार अभी तक लॉकडाउन करने वाले ८२ देशों के १४ करोड़ बच्चे खतरनाक स्थिति में हैं । वर्तमान में संपूर्ण विश्व में बच्चों की कुल जनसंख्या करीब २ अरब है , जो पूरे विश्व की कुल जनसंख्या की करीब २४ प्रतिशत है । अर्थात् कुल जनसंख्या की करीब एक तिहाई जनसंख्या १५ वर्ष से कम उम्र की है । इसमें से १५ करोड़ बच्चे सड़क पर रहते हैं । भारत में सड़काें पर रहने वाले बच्चों की संख्या एक करोड़ से ज्यादा है । जबकि १० से १५ लाख चीन के बच्चे सड़कों पर रहते हैं । इसी तरह बंगलादेश में ६ लाख बच्चे सड़कों पर हैं । नेपाल में यह जनसंख्या ५ लाख के आसपास है ,जिसमें से अधिकांश काठमांडू की सड़कों पर रहती है । तीन वर्ष पूर्व सरकार ने ‘बालबालिका सड़क पर नहीं रहना चाहिए’ नारा देकर सड़कों पर रहने वाले बच्चों की उद्धार योजना आरंभ की थी । लेकिन कोरोना के बढ़ते प्रभाव के साथ ही सड़कों पर बच्चेने पुनः रहना आरंभ कर दिया । दैनिक मजदूरी करने वाले बच्चे भोजन के अभाव में चोरीछिपे भागकर सड़कों पर रहना शुरू कर दिए हैं । इसकी जानकारी देते हुए राष्ट्रीय बाल अधिकार परिषद् के सूचना अधिकारी रामबहादुर चन्द कहते हैं कि कोविड संक्रमण होने के बाद के पाँच महीनों में परिषद् ने ७९ सड़क पर रहने वाले बच्चों का उद्धार किया है । कोविड की अवधि में ६ बालगृहों से ५५ बच्चों को उद्धार कर उन्हें उनके परिवार से पुनर्मिलन करवाया गया । लॉकडाउन के दौरान भारत में यत्रतत्र रह रहे नेपाली २६ बच्चों को वहाँ की बाल संरक्षण संस्था के साथ समन्वय कर उद्धार किया गया है । नेपाल में ३५९ बालगृह हैं । लेकिन उन बालगृहों की हालत खास्ता है । कितनों के पास तो सुरक्षित भौतिक पूर्वाधार भी नहीं है । अब तो उसको चलाने के लिए अनुदान का भी अभाव हो रहा है । कोरोना महामारी से बच पाना मुश्किलहै । क्योंकि अब कोरोना समुदाय में अपना पाँव बड़ी तेजी फैलाता जा रहा है । कांति बाल अस्पताल के निर्देशक तथा बाल रोग विशेषज्ञ डॉ कृष्णा पौडेल के अनुसार अन्य देशों की तुलना में नेपाल के बच्चों में कोरोना संक्रमण का दर उच्च है । जितने संक्रमित हैं उनमें से ७ प्रतिशत १५ वर्ष उम्र से कम के हैं । इस उम्र समूह के बच्चे घर से ज्यादा बाहर निकलते हैं जिसकी वजह से वे ज्यादा खतरे में हैं । यह कल्पना नहीं हकीकत है कि विश्व के १५ करोड़ बच्चों के पास घर ही नहीं है । सड़क ही उनका घर है और आज कोरोना काल में वे न घर विहीन ही हैं बल्कि भोजन विहीन भी बन गए हैं । ऊपर से मौसम के कहर ने भी उनको कहीं का नहीं छोड़ा है । अपने देश नेपाल की बात करें तो प्रतिदिन हो रहे भूस्खलन की वजह से भी दर्जनों बच्चे अभिभावक विहीन ही नहीं घर विहीन भी बन रहे हैं और सड़काें पर जीवन बिताने के लिए बाध्य हो रहे हैं । भय तथा त्रास के बीच जीवन जीने का संघर्ष भले ही उन्हें जीवट बनाता है लेकिन एक संपूर्ण मनुष्य नहीं बना पाता । क्योंकि अधिकांश ऐसे बच्चे कुसंस्कार तथा समाज की अवांछनीय गतिविधियों का हिस्सा बन जाते हैं । यही कारण है कि वे मानव समाज से बहिष्कृत और और तिरस्कृत हो कर जीने के लिए बाध्य होते हैं । आकाश, छत और धरती बिछावन जिन बच्चों का होता है उनके जीवन की कल्पना करें जब आकाश मृत्युरूपी वर्षा का बौछार करने लगता है तो धरती पर टिकना कितना मुश्किल हो जाता है ! ऊपर से यह कोरोना का कहर ! सड़क पर जीवन यापन करने वाले ये बच्चे एक शाम का भरपेट खाना के लिए मुँहताज हंै ,वैसे बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढि़या होने की बात करना , कोरोना से बचने के लिए सैनेटाइजर से बार–बार हाथ धोना, पौष्टिक भोजन करना , मास्क लगाना और सामाजिक दूरी बनाकर रहने की बात करना मजाक ही कहलाएगा । ऊपर से लॉकडाउन या कफ्यु की स्थिति ने तो उनके जीवन को और भी नारकीय बना रखी है । ऐसी स्थिति में क्या सरकार का दायित्व नहीं है कि वैसे बच्चों के जीवन और स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए हर संभव व्यवस्था करे । वरना कोरोना महामारी उन बेसहारा घरबार विहीन बच्चों को अपने आगोश में ले लेगी । बच्चे, बड़े हों या छोटे वे किसी भी देश के भविष्य होते हैं । उन्हें हर हाल में सुरक्षित रखना राज्य और समाज दोनों का कर्तव्य है ।
