आप सभी को यह बताते हुए हमें अपार हर्ष तथा गर्व की अनुभुति हो रही है कि द पब्लिक १४ वर्ष पूरा कर १५ वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है । वह भी सफलता के साथ !
जेठ ४ गते २०६८ (सन् २०११ के मई ) से ‘द पब्लिक’ की जो यात्रा आरंभ हुई वह अनवरत जारी है । इस बीच अनेक आरोह–अवरोह पार करते हुए आज जिस मुकाम पर द पब्लिक पहुँची है, वहाँ से पीछे मुड़कर देखने पर सहज विश्वास नहीं होता है कि हम इतने कठिन सफर को पार कर निरंतर आगे बढ़ते जा रहे हैं !
‘द पब्लिक’ के लोकार्पण कार्यक्रम में हमारे आदरणीय, अनुभवी वक्ताओं ने शुभकामना देने के साथ–साथ यह भी चिंता जतलाई थी कि ‘द पब्लिक’ के प्रकाशन से पहले भी हिंदी भाषा में कई पत्रिकाएँ निकली थीं लेकिन दो चार अंक प्रकाशित होने के बाद बंद हो गईं या जो निकल रही है वह नेपाली पाठक के अपेक्षा अनुरुप नहीं है । यह सवाल सबके मन में था कि क्या ‘द पब्लिक’ पाठकों की पसंद पर खरा उतरेगी ? क्या प्रकाशकीय कठिनाइयों को यह झेल पाएगी ? उनकी चिंता जायज भी थी । नेपाल में हिंदी की जो अवस्था थी या है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि वैसे वातावरण में हिंदी भाषा में पत्रकारिता करना अत्यंत दुरूह कार्य है ।
लेकिन नेपाल में हिंदी भाषा में पत्रिका प्रकाशित करने का एक कारण यह भी है कि ‘द पब्लिक’ पत्रिका के प्रकाशन से पूर्व एक स्तरीय तथा विश्लेषणात्मक हिंदी पत्रिका का अभाव हिंदी पाठकों को प्रायः खटकती थी उसी अभाव की पूर्ति करने के उद्देश्य से हमने ‘द पब्लिक’ का प्रकाशन करने का निश्चय किया । यही मात्र कारण नहीं था ‘द पब्लिक’ के हकीकत में आने का ।
जिस हिंदी पत्रिका की मैं कर्ताधर्ता थी उसके प्रकाशक के साथ वैचारिक और व्यावसायिक तालमेल न होने और काम करने का सहज वातावरण न मिल पाने के कारण मैंने उसे छोड़ा ।
इसकी चर्चा मैंने अपने शुभचिंतकों तथा वरिष्ठ व्यक्तित्वों से की तो सभी ने मुझे सलाह दी कि वीणा जी आप एक ऊर्जावान तथा निर्भीक पत्रकार हैं । आपमें क्षमता है, आप आगे बढि़ए, हमलोग हर संभव सहयोग करेंगे । उनमें से कुछ महानुभावों की चर्चा मैं यहाँ करना चाहती हूँ । जैसे, प्राज्ञ राम भरोस कापड़ी, वरिष्ठ साहित्यकार श्री राजेन्द्र विमल, वरिष्ठ हिन्दी साहित्यकार डॉ.राम दयाल राकेश, कांतिपुर समाचारपत्र के वरिष्ठ उप–संपादक रहे श्री कृष्णमुरारी भंडारी, पत्रकार श्री दिनेश यादव, वरिष्ठ साहित्यकार श्री राजेन्द्र थापा, साहित्यकार पत्रकार तृष्णा कुँवर, साहित्यकार संध्या पहाड़ी, उनके कलाकार पति श्री विशाल पहाड़ी । इन वरिष्ठ सलाहकारों से मैं नियमित विचार–विर्मश करती रही । उन सभी की जिज्ञासाओं तथा अांशंकाओं को दूर करने का प्रयास करती रही, साथ ही उन्हें विश्वास दिलाती थी कि आपके विश्वास पर मैं खरे उतर कर दिखाऊँगी !
मैं अपनी कार्य योजना के हरेक पहलू पर पति मनोज जी से भी गहन विचार विमर्श की । उनके ये शब्द कि ‘हनुमान जी को पता नहीं था कि वे कितने शक्तिशाली हैं । उसी तरह तुम्हें पता नहीं है कि तुम्हारे पास कितनी शक्ति है । तुम आगे बढ़ो, तुम्हें पत्रिका निकालने में आर्थिक कठिनाई आएगी तो मैं हमेशा तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा ।
अब क्या था मुझे अपनी योजना को साकार करना था । तैयारी जोर–शोर से शुरू हो गई । ‘द पब्लिक’ के प्रथम अंक का लोकार्पण मार्कोपोलो होटल में जेठ ४ गते २०६८ को वर्तमान उपप्रधानमंत्री तथा विदेश मंत्री माननीय उपेन्द्र यादव जी द्वारा किया गया । इस लोकार्पण कार्यक्रम में नेपाल के बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, पत्रकारों तथा आम पाठकों की अच्छी खासी उपस्थिति रही, जिससे बतौर प्रकाशक मुझे काफी प्रोत्साहन मिला और मेरे कदम ‘द पब्लिक’ को साथ लेकर बढ़ चले जिसका सुखद परिणाम आज आप सभी के सम्मुख है और हम सभी ‘द पब्लिक’ का पन्द्रहवाँ वार्षिकोत्सव मना रहे हैं ।
‘द पब्लिक’ के पिछले १४ सालों के सफर पर नजर दौड़ाएं तो इस दौरान अनेक अच्छे व बुरे अनुभव मन–मस्तिष्क में कौंधने लगते हैं । लेकिन बड़े–बुजुर्गों का कहना है कि बुरी यादों से सीख लेते हुए अच्छी यादों को चिरस्थायी बनाने के प्रयास में जुट जाना चाहिए जो भविष्य में प्रेरक बन सके ।
एक प्रकाशक तथा संपादक होने के साथ–साथ मंै एक संवेदनशील इंसान भी हूँ इस नाते मैं यह तो नहीं कहूंगी कि मैं सभी बुरी बातों को भूल गई लेकिन इतना मैं जरूर कह सकती हूं कि पिछले १४ सालों में ‘द पब्लिक’ के सफÞर में बुरे दिन या बुरे अनुभव बहुत हुए । लेकिन अच्छे पल तथा अच्छा समय भी आया, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है ।
पहले मैं ‘द पब्लिक’ के १५ वर्षों की यात्रा में बुरी घटनाओं तथा बुरे समय की चर्चा करती हूँ । ‘द पब्लिक’ के प्रकाशन तथा संपादन के दौरान बतौर संपादक÷प्रकाशक काफी परेशानियों से जूझना पड़ रहा था । नेपाल के राजनीतिक घटनाचक्रों का विश्लेषण कर उसे तटस्थ भाव से पन्नों पर उतारने का गहन काम समाचार पत्रों व पत्रिकाओं के लिए चुनौती का ही काम होता है । पत्रिका प्रथम वर्ष अभी पूरा भी नहीं कर पायी थी कि चैत १८ गते २०६८ को रात्रि १ बजे “द पब्लिक” के ऑफिस तथा संपादक÷प्रकाशक यानी मेरे निवास में लूटपाट तथा आगजनी की घटना घटी जिसमें कंप्यूटर सहित अधिकांश जरूरी कागजात और बाजार व्यवस्थापक का मोटर साइकिल जलकर राख हो गयी । इस अप्रत्याशित तथा अकास्मिक दुर्घटना के बावजूद ‘द पब्लिक’ के प्रकाशन को निरंतरता दी जाती रही ।
२०७२ (२०१५) में संविधान जारी होने के साथ ही मधेश आंदोलन आरंभ हो गया । इसी बीच सीमा पर नाकाबंदी भी हुई, इस दौरान मेरा पूरा परिवार विशेषकर मेरे बेटे को हिंदी पत्रिका निकालने के कारण निशाना बनाया गया ।
उसके बाद विश्वव्यापी कोरोना के कहर से हरेक सेक्टर प्रभावित हुआ तो मीडिया विशेषकर प्रिंट मीडिया को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा । कोरोना के बाद आज भी ‘द पब्लिक पब्लिकेशन’ आर्थिक से लेकर व्यावसायिक अनेक तरह की समस्याओं का सामना कर रही है ।
मैं हिंदी भाषा में पत्रिका प्रकाशित करने के दौरान आनेवाली कुछ अन्य प्रमुख कठिनाइयों की भी चर्चा करना चाहती हूँ । जो शायद नेपाल से निकलने वाली अन्य भाषा की पत्रिकाआें को नहीं झेलनी पड़ती है । हिंदी भाषा में लेख रचनाएँ सहज रूप से उपलब्ध नहीं हो पाती है । हिंदी टाइपिंग और प्रुफ चेकिंग में भी काफी कठिनाइयां हमें झेलनी पड़ती है । इसके बाद आता है विज्ञापन क्षेत्र । पत्रिका के स्तर तथा उत्कृष्टता की वजह से हमें विज्ञापन क्षेत्र में भी कठिन प्रतिस्पर्धा के बावजूद कुछ हद तक सफलता मिल रही है और हमलोग प्रयासरत हैं कि अपने प्रयत्नों से इस क्षेत्र में भी सफलता कायम करें और ‘द पब्लिक’ को सफल बनाए ।
जो भी हो, ‘द पब्लिक’ के पन्द्रह वर्षों की यात्रा में कई सुखद क्षण भी आए । जैसे ‘द पब्लिक’ का प्रथम अंक जनता को समर्पित था और हमारा प्रयास रहा है कि हम हिंदी भाषा में पाठकों को एक समसामयिक विश्लेषात्मक संपूर्ण पत्रिका उपलब्ध करवाएँ । इस प्रयास में हम कितने खरे उतरे, यह पत्रिका की बढ़ती लोकप्रियता से अनुमान लगाया जा सकता है कि हम प्रेस काउंसिल नेपाल के वर्गीकरण में अपने प्रकाशन के प्रथम वर्ष में ही वर्गीकरण की सूची में आ गए थे । उसके बाद तो साल दर साल द पब्लिक ‘क’ वर्ग में लगातार वर्गीकृत होती आ रही है । आप सभी द पब्लिक के शुभचिंतकों को यह भी जानकारी करवाना चाहती हूँ कि यह २०७४–७५( २०१७.–१८) में नेपाल से प्रकाशित होने वाली ९० विभिन्न भाषाओं कीे मासिक पत्रिका में ‘द पब्लिक’ एक नंबर की पत्रिका बनी । इस काल को ‘द पब्लिक’ का स्वर्णकाल कह सकते हैं । हमारे सलाहकारों, लेखकों तथा पाठकों के अथाह प्यार तथा लगाव का ही यह परिणाम है । अपने विशिष्ट सलाहकारों, लेखकों तथा रचनाकारों का हमें भरपूर सहयोग मिला ।
२०११ में ‘द पब्लिक’ के संपादक के रूप में मुझे नई दिल्ली सरकार के शिक्षा मंत्री के हाथों सम्मान प्राप्त हुआ । २०१४ में रिपोर्टस क्लब के द्वारा आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री सुशील कोईराला के हाथों प्रथम उमा सिंह पत्रकारिता पुरस्कार प्राप्त हुआ । उसी तरह प्रेस काउंसिल नेपाल का भाषागत पत्रकारिता पुरस्कार राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी के द्वारा प्रदान किया गया । हिंदी भाषा की प्रतिष्ठित संस्था, विश्व हिंदी सचिवालय मॉरीसस के द्वारा भी ‘द पब्लिक’ संपादक के रूप में मुझे सम्मानित तथा पुरस्कृत होने का अवसर प्राप्त हुआ । इस प्रकार पन्द्रह वर्षों में ‘द पब्लिक’ के संपादक को ४५ से ज्यादा देश–विदेशों से सम्मान तथा पुरस्कार प्राप्त करने का सुअवसर प्राप्त हुआ ।
इसी तरह भोपाल में आयोजित १० वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन में बतौर संपादक मुझे भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ । इसी तरह जी २० सम्मेलन में नेपाल से सिर्फ तीन पत्रकारों को भारत सरकार की ओर से निमंत्रण दिया गया था । उसमें द पब्लिक से हम दो लोग वीणा सिन्हा, मनोज कुमार वर्मा शामिल थे । जो हमारे लिए गौरव की बात थी ।
‘द पब्लिक’ भाग्यशाली रहा है कि उसे उच्च कोटि के अव्वल लेखकों कृष्ण मुरारी भंडारी, राजेन्द्र विमल, चंद्रकिशोर, कुमार सच्चिदानंद, विपिन देव, योगेन्द्र साह, दिनेश यादव, बसंत बस्नेत, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, चुन्नु सिंह, चंद्रेश्वर प्रसाद यादव, अर्थशास्त्री उमाशंकर प्रसाद साह, राजेन्द्र थापा, डॉ गौरी शंकर लाल दास,डॉ अजय देवकुलियार, मीरा, शेफाली, डी.विनय की लेखनी का साथ मिला । जिनके आलेखों के माध्यम से पत्रिका देश की मुख्य घटनाओं तथा मुद्दों से संबंधित अनुसंधानात्मक–विश्लेषणात्मक आलेख प्रस्तुत करने में सक्षम हो सकी ।
इसी तरह द पब्लिक में देश–विदेश के राजनीतिज्ञों, सामाजिक अभियंताओं, साहित्यकारों, कलाकारों, आर्थिक तथा शैक्षिक क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले व्यक्तियों की अंतर्वार्ता भी प्रकाशित की जाती रही है । ‘जनधारणा’ शीर्षक अंतर्गत विभिन्न मुद्दों पर जनता की धारणा भी प्रकाशित की जाती रही है ।
‘स्वास्थ्य ही धन है’ को आत्मसात करते हुए ‘द पब्लिक’ ने अपने पाठकों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए सेहत, योग तथा नानी–दादी के नुस्खे के माध्यम से स्वस्थ रहने के लिए डाक्ँटरों तथा पोषणविदों के ज्ञान तथा सलाह–सुझाव को भी उचित स्थान देती आ रही है ।
युवाओं के कैरियर के संबंध में जानकारी तथा उनके समस्याओं के समाधान के लिए परामर्श देने वाले आलेखों को स्थान देती रही है द पब्लिक । युवतियों तथा महिलाओं के लिए फैशन तथा सौंदर्य स्तंभ और खाने पीने के शौकीन पाठकों को देश–विदेश के स्वादिष्ट व्यंजनों का रसस्वाद भी परोसता है द पब्लिक ।
बच्चों की देखभाल से लेकर उनके हुनर को प्रोत्साहित करने के लिए बालकोना रखा गया है और अंतः में आस्था के अंतगर्त राशिफल, व्रत– त्योहारों की भी जानकारी हमारे धर्मपरायण पाठकों के लिए प्रकाशित की जाती है । अपने सुधी पाठकों के लिए चाणक्य तथा ओशो की नीतिपरक उक्तियों को भी ‘द पब्लिक’ स्थान देती रही है । द पब्लिक में पाठकों के मनोरंजन तथा ठहाके लगाने के लिए चुटकुलों को भी प्रत्येक अंक में स्थान दिया जाता है ।
इस प्रकार मैं कह सकती हूँ कि आज ‘द पब्लिक’ के निरंतर आगे बढ़ने तथा पाठकों में लोकप्रिय होने का सबसे बड़ा कारण है कि इस पत्रिका में समाज तथा परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए खास सामग्री प्रकाशित की जाती है । सभी इस पत्रिका से अपनापन महसूस करते हैं क्योंकि सभी के लिए कुछ न कुछ उपयोगी सामग्री रहती है ।
साथ ही गैर हिंदी भाषी तथा युवा लेखकों तथा साहित्यकारों को भी हिंदी में लिखने के लिए प्रोत्साहित करने का कार्य हमारे संपादक मंडल द्वारा किया जाता है ।
‘द पब्लिक’ केवल पत्रिका ही प्रकाशित नहीं करती, वह समय–समय पर देश भर में कार्यक्रम भी आयोजित करती है ।
‘द पब्लिक’ द्वारा ही नेपाल में पहली बार ‘विश्व हिंदी दिवस’ २०१३ बड़ी ही भव्यता के साथ मनाया गया जिसमें देशभर के हिंदी प्रेमियों की बड़ी संख्या में उपस्थिति रहीं । उसके बाद के वर्षों में भी ‘द पब्लिक’ विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित कर इसे मनाती रही है ।
‘द पब्लिक’ के संपादक मंडल द्वारा समय–समय पर अपने सलाहकारों तथा पाठकों के साथ मिलकर ‘द पब्लिक’ के संबंध में समीक्षा कार्यक्रम भी आयोजित किया जाता रहा है । जैसे वीरगंज, जनकपुर तथा काठमांडू में कार्यक्रम कर, उपस्थित अतिथियों से उपयोगी सलाह–सुझाव संकलन कर पत्रिका को समृद्ध बनाने का कार्य करती है । आप सभी को यह जानकारी कराते हुए हमें अपार हर्ष हो रहा है कि सम्पूर्ण नेपाल के साथ–ही–साथ हमारे पड़ोसी देश भारत, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कतार, सिंगापुर, अमेरिका, बंगलादेश, श्रीलंका, रूस, ब्रिटेन तक का सफर तय कर चुकी है । अर्थात ‘द पब्लिक’ आज एक वैश्विक हिंदी पत्रिका का रूप ले चुकी है । इन देशों के अलावा विश्व के कई अन्य देशों में ऑनलाइन पत्रिका का पठन–मनन हो रहा है ।
‘द पब्लिक’ को पाठकमुखी बनाने के लिए हम हमेशा उनके द्वारा प्राप्त पत्रों के माध्यम से सुझाव, सराहना तथा आलोचनाओं को हृदयंगम करते हुए आगे बढ़े हैं और आशा करते हैं कि ‘द पब्लिक’ की आगामी यात्रा में भी हम सुधी पाठकों के बहुमूल्य सुझाव तथा समालोचना से निर्देशित होते रहेंगे ।
आप सभी को यह जानकारी कराते हुए मुझे अपार हर्ष हो रहा है कि यह पत्रिका आम पाठक के साथ ही खास व्यतिmत्वों, नेपाल के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के हाथों में सहजता से पहुंच रही है । र
इस अवसर पर मैं यह भी जानकारी कराना चाहती हूँ कि “द पब्लिक“ फेसबुक पर भी उपलब्ध है और और बेवसाइट पर भी है ।
एक बार पुनः १४ वर्षों तक ‘द पब्लिक’ की संघर्षमय यात्रा में सहभागी व्यक्तित्वों के प्रति हम आभार व्यक्त करते हैं । ‘द पब्लिक’ पत्रिका को अपने नाम के अनुरूप पब्लिक की पत्रिका बनाने में आप सबों का जैसा पूर्ण सहयोग एवं शुभेच्छा मिली है, आशा है अगामी दिनों में भी मिलती रहेगी ।
मेरी अमेरिका तथा दुबई यात्रा संस्मरण के लोकार्पण के पावन अवसर पर मैं अपनी संस्मरण के पुस्तक के संबंध में दो शब्द बोलना चाहती हूँ ।
आज से १७ वर्ष पूर्व २००८ में मैं अमेरिका की यात्रा की थी । उस यात्रा के अनुभव कांत्रिपुर तथा गोरखापत्र में आलेख संस्मरण के कुछ अंश के रुप में प्रकाशित भी हुए थे लेकिन समयाभाव के कारण में अपनी अमेरिका यात्रा के बारे में पुस्तक नहीं निकाल पा रही थी लेकिन यह संयोग आज बना और मेरी दो संस्मरण अमेरिका तथा दुबई यात्रा संस्मरण यहाँ लोकार्पण हो रहा है ।
अमेरिका एक ऐसा देश है जहाँ परंपरा और प्रगति का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है । यहाँ की तकनीकी ऊँचाइयाँ, सुव्यवस्थित जीवनशैली और बहुसांस्कृतिक समाज ने मेरे मन में कई प्रश्न भी जगाए और कई उत्तर भी दिए । इस यात्रा ने मुझे विश्व को देखने की एक नई दृष्टि दी — एक व्यापक, उदार और सीखने को आतुर दृष्टि ।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इस यात्रा के दौरान मुझे अपने भीतर की जिज्ञासा, साहस और आत्मविश्वास से भी भेंट हुई । यह यात्रा केवल बाहरी सौंदर्य की नहीं थी, यह आत्मा की परिपक्वता की यात्रा भी थी ।
इस यात्रा ने मुझे केवल नए स्थानों से ही नहीं, बल्कि स्वयं से भी परिचय कराया । थकावट भरे रास्तों में भी रोमांच था, और अपरिचित चेहरों में भी अपनत्व की झलक । रास्तों ने सिखाया कि जीवन स्थिर नहीं है—यह तो निरंतर गतिमान है, बदलता है, सिखाता है और परिपक्व बनाता है । अंततः, अमेरिका की यह यात्रा मेरे जीवन के उन अध्यायों में दर्ज हो गई है, जहाँ अनुभव, आनंद और आत्मिक समृद्धि तीनों ने एक साथ स्थान पाया ।
मेरी दूसरी विदेश यात्रा दुबई की हुई । यह यात्रा एक व्यक्तिगत पर्यटन थी, परंतु इसका प्रभाव बहुत व्यापक रहा ।
दुबई की यह यात्रा मेरे जीवन के उन अनमोल अनुभवों में से एक रही, जिसने न केवल एक विकसित और आधुनिक शहर के वैभव से परिचय कराया, बल्कि मुझे अपनी दृष्टि को और विस्तृत करने का अवसर भी दिया ।
ऊँचे–ऊँचे गगनचुंबी टॉवर, सुनहरी रेत के विस्तृत विस्तार, दुबई मरीन की चमचमाती रोशनियाँ ओर रेगिस्तान की शांत लहराती कोलाहल मचाती हवाएँ–इन सब ने मन को गहराई से छुआ ।
इस सफर ने मुझे समझाया कि दुनिया कितनी विविधतापूर्ण है – तकनीकी, संस्कृति और परंपरा कैसे एक साथ एक आधुनिक नगर में संतुलित होकर जी रही है । दुबई में बिताया हर क्षण, चाहे वह बुर्ज खलीफा की ऊँचाई हो या दुबई फ्रेम की विशालता हो–मन में एक अमिट छाप छोड़ गया ।
विदेश यात्रा अपने आप में न केवल एक रोमांचकारी अनुभव होती है, बल्कि यह व्यक्ति के दृष्टिकोण, सोच और समझ को भी व्यापक बनाती है । अमेरिका और दुबई – ये दोनों ही स्थान अपने–अपने विशिष्ट सांस्कृतिक, तकनीकी और सामाजिक पहलुओं के लिए विश्वविख्यात हैं । अमेरिका आधुनिकता, नवाचार और अवसरों की भूमि है, तो वहीं दुबई परंपरा और आधुनिकता का अनुपम संगम है ।
इन दोनों देशों के भ्रमण की यादों को समेटते हुए मैं अपना संस्मरण पुस्तक के रुप में आप सभी के समक्ष प्रस्तुत की हूँ ।
आशा है कि संस्मरण आप सभी को रोचक लगेगा । यह नेपाल में हिन्दी भाषा की प्रथम संस्मरण है । कुछ त्रुटि या कमी रह गई हो तो उससे मुझे अवगत करांगे ताकी में अगामी संस्मरण में सुधार कर सकूँ ।
धन्यवाद ।

