लॉक डाउन के चौथे चरण को लागू हुए सात दिन हो गए हैं। मकान मालिक तँवर, मोहन को मकान किराया न देने पर घर खाली करने की आखिरी चेतावनी देकर भला–बुरा कहते हुए अभी–अभी लौटा है। तँवर के वापस चले जाने के बाद अपने बीमार पिता को परेशान देखकर ज्योति का किशोर मन व्यथित हो जाता है। लेकिन वो कर ही क्या सकती है? इस विपत्ति को सहने के सिवाय उसके पास कोई और उपाय भी तो नहीं है। पिछले द्धण् दिनों से मन को झूठी तस्सली देते और पिता का हौसला बढ़ाते–बढ़ाते उसके खुद के हौसले पस्त होने लगे हैं। पिछले तीन दिनों से तँवर ताऊ की उलाहना और धमकी ने उसके धैर्य पर मानो बुलडोजर चला दिया है। अब तो खाने को भी कुछ नहीं बचा है। इसी तरह आगे भी बंद रहा तब तो गुरुग्राम में ही मरना होगा। नहीं–नहीं वह यहाँ तो बिल्कुल नहीं मरेगी। कैसे लोग हैं जब बाबू कुछ काम ही नहीं कर रहे हैं तो भला मकान किराया कहाँ से देंगे? एक तो खाने को लाले पड़े हैं, कई दिनों से भरपेट भोजन नसीब नहीं हुआ है। ऊपर से तँवर ताऊ की धमकी रोज–रोज सुनकर अब तो दिल फट गया है। चाहे जो हो जाए अब यहाँ नहीं रहूँगी, बाबू को दोबारा यहाँ आने भी नहीं दूँगी। कुछ भी हो गाँव में ही मेहनत–मजूरी करके गुजर–बसर कर लूँगी। बाबू से ही बोलती हूँ कुछ करें ।
ये सब सोचते हुए ज्योति मोहन से कहती है– “बाबू! आपकी हालत अब मुझसे देखी नहीं जाती, क्यों नहीं हमलोग अपने घर चलें? आखिर हजारों लोग तो रोज किसी तरह जा ही रहे हैं। न जाने कबतक देश बंद रहेगा, अब खाएँगे क्या? कुछ भी तो नहीं है कमरे में!“ इतना कहते–कहते ज्योति की आँखें डबडबा जाती है। गला रूंध जाता है। वह मोहन के पास रखे बोरे पर दोनों हाथ से माथा पकड़कर बैठ जाती है। मोहन बेटी को इतना उदास और हताश होते कभी नहीं देखा था, तब भी नहीं जब कई–कई दिनों तक घर में कुछ भी खाने को नहीं होता था। लेकिन आज उसे इस तरह देखकर मोहन का दिल बैठा जा रहा है। वह सोचता है कि किसके पास जाए? किससे कहे? कौन सुनेगा उसकी? गाँव के भी सभी लोग चले गए हैं। आह! किस विपत्ति में डाल दिया भगवान? इतने में उसको ट्रक चलाने वाले रघुनी की याद आती है।
रघुनी ने कहा था कि वह ट्रक लोड करके जल्दी ही बिहार जाने वाला है। कुछ रुपईया–पइसा देकर उसके ट्रक पर ही घर चला जाऊंगा। “ज्योति! मैं रघुनी से मिलकर आता हूँ, घबराना नहीं मेरी बच्ची, भगवान चाहे तो कोई–न–कोई राह निकल ही आएगा। रघुनी अपने बाजू वाले गाँव सिहुलिया का ही है, भला आदमी है। इहाँ भी पड़ोस में ही रहता है।“ इतना कहकर मोहन लंगड़ाते हुए घर से बाहर चला गया। इधर मोहन की बातों ने ज्योति के मन को ठीक उसी प्रकार शीतलता प्रदान की जैसे जेठ की दुपहरी में लू के थपेड़े खाए पथिक को पीपल का छाँव प्रदान करता है। वह मन ही मन खुश होने लगी और आँखे बंद कर गाँव पहुँचने के सपने देखते हुए कब सो गई पता ही नहीं चला।
“बेटी, अरे रोटी–ओटी नहीं बनाई क्या? ई देखो घोड़ा बेचकर सो रही है।“ मोहन के इतना कहते ही ज्योति चहक कर उठ गई और झट से पूछ बैठी – बाबू क्या हुआ? रघुनी चाचा कब जा रहे हैं? घर कब जाना है? बेटी की व्याकुलता को देखकर मोहन बिना कुछ बोले ही सिर झुका लिया। लेकिन ज्योति जो है, मानने को तैयार ही नहीं है।
लगातार एक ही बात पूछे जा रही है– घर कब जाना है…घर कब जाना है बाबू? अब मोहन क्या जबाब दे अपनी बेटी को, उसे कुछ सूझ नहीं रहा है। क्या वह सब कह दे कि रघुनी ट्रक पर ले जाने के लिए जितने पैसे की माँग कर रहा है, उतना वह कहाँ से लाएगा। नहीं…नहीं उसे भला ये सब क्यों बताऊँ? इस उलझन में मोहन निरन्तर उलझते जा रहा है, इससे निकलने की कोई राह भी नहीं दिखाई दे रही है।
इतने में ज्योति बोलती है – बाबू आपको माई की कसम कुछ तो बोलो ? जबाब क्यों नहीं देते हो? अब मोहन से रहा नहीं गया, उसने एक ही सांस में ज्योति से सबकुछ कह दिया। ज्योति, मोहन के पास बैठकर उसके घायल पैर में मरहम लगाते हुए बोली– बाबू जो कुछ रूपइया आपके पास है उससे एक पुरानी साइकिल क्यों नहीं खरीद लेते? उसी से हमलोग अपने घर चले जायेंगे। मैं आपको बैठाकर साइकल चला लूँगी।
स्कूल में आठवें क्लास में जो साइकल मिली थी उससे कई बार गांव से दरभंगा गई हूँ। रास्ते में खाने–पीने को कुछ न कुछ तो मिल ही जाएगा, बाकी सबका मालिक ऊपर वाला है। “अरे नहीं.. नहीं बेटी तुमको क्या मालूम इहाँ से दरभंगा जाना को हँसी–ठीठोली है, हजार किलोमीटर से भी अधिक दूर है । उसपर से इतनी गर्मी, लगता है देह जर जाएगा । लेकिन ज्योति के जिद के आगे मोहन की एक न चली, तब वह पड़ोस से एक पुरानी साइकल पंद्रह सौ रूपए में खरीदकर घर जाने को तैयार हो गया। जो कुछ रुपए बचे थे तँवर को मकान किराया दे दिया और फटी–पुरानी बैग के साथ ज्योति के पाँव घर से ऐसे निकले मानो वह हजार किलोमीटर की दूरी कुछ ही मिनटों में नाप देगी ।

इधर पनवा पंडित जी के खेत में सोहनी करते हुए ज्योति से फोन पर बात कर रही है। “अरे जोतिया ! घर से निकल के घरमुरिया करे खातिर चल देले बारू त ठीक से बाप के ले अइह। अइसे ही अपाहिज करके भगवान बैठा देले बारन। हमरा बाबू लोग के मुँह पर जाबी लाग गेल बा।“ पनवा कुछ ही दिन पहले गुरुग्राम से लौटकर गाँव अपने बड़का दामाद के साथ आई थी। ऑटो रिक्सा चलाते हुए मोहन के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने पर ज्योति, उसकी माँ पनवा और जीजा सुरेश देखभाल करने के लिए गुरुग्राम गए थे। अस्पताल से वापस आने पर मोहन ने पनवा को अपने दामाद के साथ घर वापस भेज दिया था।
पनवा मोहन को छोड़कर आने के लिए तैयार नहीं थी, लेकिन मोहन ने ही यह कहते हुए आने से इनकार कर दिया था कि अबकी कुछ दिन तक काम ठीक से चल गया त ज्योति का हाथ भी पिला कर देगा। आखिर बेटी का बाढ़ पानी की तरह जो होता है, पता ही नहीं चलता है कि कब बड़ी हो गई। पनवा बेमन ही वहाँ से घर आने के लिए तैयार हुई थी। आज उसी बात को सबको सुनाते हुए रोए जा रही है।
“मति हेरा गेल रहे उनकर अऊर न जानी कवना निच्छतर में हम उहाँ से आवेला राजी हो गेली? उ फूल लेखन हमर बेटी कइसे उनका के बईठा के एतेक दूर ले आई? हे सगरो देवी–देवता रउरे सबन के आसरा बा अब!“ पनवा का मन अब सोहनी में बिल्कुल नहीं लग रहा है लेकिन सोहनी नहीं करेगी तो आज खाएगी कहाँ से? कुछ भी तो घर में नहीं है। मन में ये विचार आते हीं झट से आँचरा से आँसू पोंछ लेती है और तेजी से खुरपी चलाने लगती है। उसके साथ सोहनी करने आई सभी महिलाएँ पनवा को ढाँढस बढ़ा रही है। लेकिन पनवा के मन की आशंका बिल्कुल मोथा घास की तरह है, बार–बार सोहनी करने पर भी फिर से उग ही जाता है। उधर ज्योति साइकल के पीछे अपने बाबू को बैठाकर खूब तेजी से आगे बढ़ रही है।
गुरुग्राम से दूर सड़क किनारे कुछ लड़के उसे देखकर बाते कर रहे हैं– “के जम्माना आ ग्या चाचा छोरी साइकल खींच री सै अर ताऊ मजै मैं बैठा सै।“ सभी उसकी तरफ देखते हुए ठहाका मारकर हँसने लगे। ज्योति के पाँव पैडिल पर और तेज चलने लगता है। तीन ÷ दिनों तक ज्योति घर की रोटी, आलू की भुजिया और भूँजा खाते हुए साइकिल चलाती रही।
चौथे दिन उसके पास खाने के लिए कुछ नहीं था, हां था तो केवल हौसला जिसके सहारे दरभंगा क्या कन्याकुमारी तक वो चली जाए। केवल पानी पीकर जेठ की गर्मी में पानी–पानी हुई ज्योति हार मानने को तैयार नहीं है। अपने पिता को कोई दिक्कत नहीं हो, इसका वो पूरा ध्यान भी रखती है। पाँचवे दिन उत्तर प्रदेश–बिहार सीमा पर एक राहत शिविर में आकर ज्योति एवं मोहन ने खाना खाए, कुछ देर तक आराम किया और फिर शिविर संचालक युवा समाजसेवी सतीश बाबू को ढेरों आशीर्वाद देते हुए अपने रास्ते पर निकल गए।
जबसे लॉकडाउन लगा है तभी से सतीश बाबू इस रास्ते से गुजरने वाले प्रवासियों के खाने–पीने की व्यवस्था में लगे हुए हैं। रास्ते में टीवी के लिए रिपोर्टिंग करते हुए अंकुश की नजर साइकल चलाती हुई कम उम्र की ज्योति पर पड़ती है। तुरन्त कैमरा मैन राहुल को इशारे करते हुए सूटिंग शुरू कर देता है।
ज्योति से भी लाइव बातचीत करता है। यह खÞबर आग की तरह सोशल मीडिया सहित अभी जगह वायरल हो जाती है। जबतक ज्योति अपने गाँव पहुँचती उससे पहले प्रशासनिक अमला उसके घर पर पहुँच गई होती है। उसे वहीं से सरकारी क्वारेंटाइन सेंटर भेज दिया गया। पूरे गाँव में उसकी साहस के चर्चे हो रहे हैं। सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि, पत्रकार, सामाजसेवी और अनेक संगठनों ने ज्योति की तारीफ करते हुए उसे सम्मानित भी कर रहे हैं। कोई उसे आजीवन पढ़ाने–लिखाने तो कोई उसके घर बनवाने और अन्य तरह से मदद करने की घोषणाएं कर रहा है। उसके घर पर दिनभर लोगों का तांता लगा रह रहा है। उसकी यह खÞबर अमेरिका तक पहुँच जाती है।
अचानक सारे गाँव का प्यार उसके प्रति बढ़ जाता है। लेकिन गांव के कुछ लोग अंदर–ही–अंदर खुश नहीं है। उन्हें ज्योति के नशीब से ईष्या हो रही है। डुमरी चाची कहती है– “भगवान वोकरा लेखन भाग सबके देथिन। पिछला जन्म में जरूर कउनो पुन के काम मोहना कइले होई। बाप रे! ओकर नाम सात समंदर पार अमेरिका तक चल गेलइ। बाप–मतारी राजा हो गेलइ से अलग।
“ गाँव के बच्चे, बूढ़े, महिलाएँ सभी ज्योति के भाग्य की बात ही कर रहे हैं, आज गाँव वालों के लिए दुनिया में ज्योति से ज्यादा भाग्यशाली कोई और नजर नहीं आ रहा है। लेकिन ज्योति, मोहन और पनवा को इन घोषणाओं पर विश्वास नहीं हो रहा है। हां, अपने को टीवी पर देखकर सभी खुश जरूर है। ज्योति के रातो–रात सेलिब्रेटी बन जाने के बाद मीडिया एवं सोशल मीडिया पर यह मुख्य बहस का मुद्दा बना हुआ है। सभी ज्योति की तारीपÞm में कशीदे काढ़े जा रहे हैं। कोई उसे साइकल गर्ल की उपाधि देता है तो कोई आधुनिक श्रवण कुमार की। जो भी हो लेकिन ज्योति ने कुछ ही दिनों के लिए सही परन्तु टीवी पर के डिबेट के मुद्दे बदल दिए हैं।

जब सारे गाँव–सामाज में केवल और केवल ज्योति की ही बात हो रही थी तब रणवीर काका टीवी पर बहस सुनते हुए एकाएक झल्लाकर टीवी का रिमोट फेंक देते हैं। “हमे गर्व है ज्योति पर‘.साला किस बात का गर्व है? भूखे–प्यासे सात दिन तक एक मासूम लड़की अपने अपाहिज बाप को साइकिल से हजार किलोमीटर से अधिक दूरी इतनी गर्मी में तय करती है। इस हजार किलोमीटर में किसी की नजर नहीं पड़ती है उस पर, सरकार की भी नहीं।
अरे! इसबात पर तो हमें शर्म से डूब मरना चाहिए। लेकिन नहीं गर्व करने की घूँटी पिलाई जा रही है। करो गर्व..एक ज्योति पर गर्व करने की चक्कर में न जाने कितने ज्योति सड़क पर पैदल चलते हुए मर जाएगी।“ घर के लोग रणवीर काका को समझाते हैं– “जाने दीजिए आपको इससे क्या लेना–देना है? सबका टेंशन मत लीजिए, बीपी बढ़ जाएगा तो दिक्कत हो जाएगी। आपके रिमोट पटकने या टीवी फोड़ने से क्या सब बदल जाएगा? नहीं न! त काहे का टेंशन, चैनल बदलिए और कपिल शर्मा शो देखिए।
लेकिन रणवीर काका बहुत चिंतित हैं। न जाने उन्हें बार–बार ऐसा क्यों लगता है कि ज्योति की तो किस्मत बदल गई लेकिन उसके जैसे लाखों लोगों की किस्मत कब बदलेगी? वो घर वाले को पलटकर जवाब देते हैं – भाई मुझे इससे क्यों नहीं कुछ लेना–देना है? आखिर मेरे घर के नहीं तो किसी न किसी के घर के लोग ही तो सड़क पर, स्टेशन पर, ट्रेन की पटरी पर न जाने कहाँ–कहाँ मर रहे हैं। सभी को सोचना ही पड़ेगा, एक–दूसरे के लिए आवाज बुलंद करनी ही होगी।
इसी बीच गणेश मोबाइल पर वीडियो दिखाते हुए कहता है काका देखिए न अब ज्योति नौवीं क्लास में बिहार के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ने के लिए पटना जाएगी, स्कूल वाले खÞुद उसे बुलाए हैं, फ्री में पढ़ाने के लिए। रणवीर काका गहरी सांस लेकर कहते हैं– चलो अच्छा हुआ अब ज्योति के घर भी ज्ञान की ज्योत जलेगी। इधर पनवा ज्योति को जोतिया नहीं ’साइकिल बिटिया’ कहकर बुलाने लगी है।

लेखकः
डा‘. सुशांत कुमार
असिस्टेंट प्रोफेसर, विश्वविद्यालय हिंदी विभाग
बाबा साहब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय,

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