आजकल मधेश में जो भी हो रहा वह ठीक नहीं है । योजनाबद्ध तरीके से पहले जहां मधेशी दलों को और उनके नेताओं की साख समाप्त करने का कार्य संस्थापन शक्ति द्वारा किया गया वही अब मधेश विद्रोह को भी तेजहीन बनाने के लिए भारी कसरत हो रही है । मधेश के मुक्तियुद्ध का अतीत इसका पहला शिकार हो रहा है । एक–दूसरे में दोष खोजनेवाले मध्यवर्गीय मधेशियों के सनातन चरित्र से यहां के राजनैतिक नेता भी मुक्त नहीं हो सके हैं । आम मधेशी इस वक्त ऐतिहासिक अन्योल के भ्रमरजाल में है । इसी समय एक ओर संस्थापन वृत्त नेपाल के राजनीतिक व्याकरण को ही परिवर्तन करने के अपने एक सूत्रीय अभियान में जुटे हुए हैं । बहुसांस्कृतिक, बहुधार्मिक, बहुभाषिक तथा अन्य विविधता का बाहुल्य राष्ट्र संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र साधन मात्र न होकर साध्य हो गया है । मधेश विद्रोह का १३ वर्ष पूरा हो गया है । इसके साथ ही इसका प्रभाव भी कम होता जा रहा है । मधेश विद्रोह जिस न्याय, समानता और मुक्ति के मुद्दा को लेकर हुआ था आज वह कचोट रहा है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *