कोरोना संक्रमण बढ़ने के साथ ही नया–नया ‘हॉट–स्पॉट ’ देखा जाने लगा है । अस्पताल में भर्ती न हो पाने की वजह से रोगियों के मरने का क्रम बढ़ता जा रहा है । बीमारों को अस्पताल रखने को तैयार नहीं है । शय्या , वेंटिलेटर और ऑक्सीजन का अभाव होने लगा है । शुरू में संक्रमितों की संख्या कम थी उनमें लक्षण भी कम ही दिख रहे थे । जिसकी वजह से मरने वालों की संख्या भी बहुत ही कम थी । वैसी स्थिति में प्रधानमंत्री खड्गप्रसाद ओली ‘हल्दीवाद’ का भाष्य रचते हुए अपनी सरकार द्वारा बहुत बढि़या व्यवस्थापन करने का दावा करते नहीं अघा रहे थे । ऐसा दावा करने के बाद महीना दिन भी नहीं बीता कि सरकारी तंत्र की लापरवाही और लाचारी स्पष्ट दिखने लगी । आम आदमी की पीड़ा और भोगाई को देखें तोÞ सरकार के प्रति भरोसा और विश्वास टूटता जा रहा है । नेपाली मनोविज्ञान में निरूपित होता जा रहा असुरक्षा का भाव सरकारी व्यवस्थापन की धज्जी उड़ा रहा है । ऐसे में उपचार के बिना मरने वाले रोगियों में सरकार का चेहरा देखने वाले भी कम नहीं हैं । सरकार अगर कोरोना की घंटी समय पर सुन लेती तो ऐसी भयावह स्थिति देखनी नहीं पड़ती । सरकार यदिे कोरोना व्यवस्थापन के लिए एक परिपाटी बनाती तो आज ऐसी नियति भोगनी नहीं पड़ती । सरकार को समय मिलने के बावजूद कोई तैयारी नहीं करने से ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है । तीनों स्तरों की सरकार में कोई आपसी तालमेल नहीं है । संघीय सरकार के प्रतिनिधि के रूप में रहे प्रजिअ और नगर प्रमुखों के बीच अधिनायकवाद का लक्षण चन्द्रकिशोर द पब्लिक, भाद्र २०७७ क्ष् ज्ञज्ञ दृष्टिकोण तालमेल कई स्थानों पर बिलकुल नहीं दिखता । इसी तरह स्थानीय सरकार और प्रदेश सरकार में एक–दूसरे की ओर अँगुली उठाने का खेल शुरू हो गया है । सर्व अधिकार अपने हाथों में लेकर बैठी संघीय सरकार नीचले स्तर से उठनी वाली आवाजों को अनसुनी करती आ रही है । इस प्रकार हॉट स्पॉट बनते जा रहे शहरों के साथ संघ द्वारा विभेद करने का मनोविज्ञान गहरा होता जा रहा है । आम आदमी संकट के समय ही सरकार को खोजती है लेकिन दुर्भाग्य अभी सरकार खो गई है । राज्य ने नागरिकों को मुसीबत में डाला ही नहीं है ,अकेले भी छोड़ दिया है । सुख–दुःख में राज्य उनके पीछे खड़ी है, संकट में नागरिक अकेले नहीं हैं । पूरा राज्य उसके साथ है ,जैसा भाव जनता के मन से भाप बनकर उड़ गया है । अस्पताल में रहने के बावजूद जिन्होंने अपनाें को गुमाया ,जो इस शोक के साक्षी बने,उनके लिए तो लाशों के बीच सरकार दुर्गंधित बन गयी है । सरकार कृत्रिम राष्ट्रवाद की ओखली में जनविश्वास को पीस रही है । राष्ट्रीय एकता के लिए ईमानदार प्रयत्न करने के बजाय विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के साथ विवाद में समय और ऊर्जा व्यय करने वाले रोग से ग्रस्त हो रहे हैं । कुछ समय के लिए ऐसी गतिविधियाँ पाच्य हो सकती हैं लेकिन अन्ततोगत्वा इसका परिणाम त्रादसीपूर्ण ही होता है । यहाँ लेखक थॉमस फ्रीडमैन का कथन सान्दर्भिक होगा कि नये विभाजन रेखा में उभरा दुनियाँ का इतिहास अब इससे पहले या पीछे के आधार पर नहीं ,कोरोना से पहले और पीछे के कालखंड में विभाजित होगा ।’ गणतांत्रिक नेपाल की कालखंड में भी ख्डगप्रसाद पूर्व और बाद में चित्रित होगा । पंचायत काल में भी इस हद तक लापरवाही देखी नहीं गयी थी । खड्गप्रसाद का मानना है कि ‘आम नेपाली हल्का–फुल्का, सस्ता और उपेक्षा योग्य प्राणी है और जो अपने दुख में ही जीने के लिए जन्म लेते हैं ।’ लेकिन यहाँ किसी को यह नहीं समझना चाहिए कि वही ‘राज्य’ है । यदि सरकार प्रमुख अपने भीतर यह मनोभाव रखता है तो इसका मतलब निर्वाचित अधिनायक बनकर अकड़ रहा है । सत्ता के दलीकरण से भी ज्यादा ओलीकरण होता जा रहा है । राज्य के प्रत्येक स्थान पर प्रधानमंत्री की आँखाें के इशारे समझने वाले तैनात किए गए हैं जिसकी वजह से शक्ति का अतिशय केंद्रीकरण हो रहा है । वीरगंज में उपचार के अभाव में छोटे समय में ही कितने रोगियों की मृत्यु हो गई । उनकी वेदना के बारे में खड्गप्रसाद की कोई अभिव्यक्ति सुनने को नहीं मिली लेकिन उसी के नजदीक ‘राम’ मंदिर बनाकर कीर्तिमान कायम करने की उनकी इच्छा किसी से छिपी नहीं है । राष्ट्रवाद का कीर्तन गाकर खड्गप्रसाद सत्ता कब्जा करने में लगे हैं और राम को अपने संकथन के प्रतीक के रूप उभारना चाहते हैं । जीवित व्यक्ति की छटपटी में दुःखी होने के बजाय अतीत और मिथकों के सकीर्तन में आनंद खोजना लुईस चौथे की प्रवृत्ति है । एक वामपंथी मित्र से पूछने पर कि क्या खड्गप्रसाद की लोकप्रियता बढ़ रही है ? उन्होंने इसे सही बताया । तब मैंने प्रतिप्रश्न किया कि आज चुनाव हुआ तो वे सहज ही जीत जाएंगे तो उनका कहना था ,निश्चत !! अर्थात् कोरोना व्यवस्थापन में हो रही चूक के बावजूद उनकी लोकप्रियता बढ़ने की बात वामपंथी मित्र की स्वीकोरोक्ति थी । लेकिन यह लोकप्रियता नक्सा, राष्ट्रवाद और वाम के राम से संभव न होकर विपक्ष की अकर्मण्यता के कारण सृिजत हुई है । स्वयं सत्तारूढ नेकपा के भीतर विपक्षी स्वर की संभावना ठंढी होती जा रही है । ऐसा आकस्मिक रूप से नहीं हो रहा है । जहाँ विकल्प नहीं होता, वहाँ संभावनाओं के द्वार खुले रहते हंै । हम नेकपा की छोटी कल्पना, खोखली इच्छा और बुरे व्यवहार सहने के लिए अभिशप्त हैं । खड्गप्रसाद को राष्ट्र नायक मानने और उनका जयजयकार करने वाले कम नहीं हैं ! राष्ट्रवाद की नशा में लिप्त भक्त कोरोना को कृत्रिम शत्रु मानते हुए सौ–पचास व्यक्तियों की मृत्यु स्वाभाविक मानते हैं । राष्ट्रवाद अभी आगे तक जाएगा । हमें अभी और भयानक नियति भोगनी है । राष्ट्रवाद का नाम पर नेता विशेष उन्मुक्ति पाते हैं तो संविधान में कुछ भी लिखा हो, यह अधिनायकवाद का स्पष्ट लक्षण है ।
