प्रधानमंत्री ओली नेपाली राजनीति के करिश्माई व्यक्तित्व माने जा सकते हैं । वर्तमान समय में नेकपा को जीवित पूर्वप्रधानमंत्रियों की पार्टी मानी जा सकती है । गौरतलबहै कि प्रधानमंत्री ओली को छोड़ भी दें तो तीन–तीन पूर्वप्रधानमंत्री सर्वश्री माधव नेपाल, झलनाथ खनाल और प्रचंड नेकपा के अंदर सक्रिय राजनीति में
हैं । लेकिन उनकी महत्त्वाकांक्षाओं को राजनीति की विसात पर पीछे छोड़ ओली न केवल पार्टी अध्यक्ष बने बल्कि प्रधानमंत्री भी बने और नेपाल के लोकतांत्रिक इतिहास का शायद सबसे सशक्त  प्रधानमंत्री के रूप में स्वयं को स्थापित किया । दो तिहाई के जादुई आंकड़े के समर्थन के साथ वे अपने विरोधियों को धूल चटाने की कला में भी माहिर हैं । बाघ को बकरे की तरह मिमियाने की अवस्था में लाकर छोड़ने में भी उन्हें महारथ हासिल है । यह एक अलग बात है कि स्वास्थ्य की दृष्टि से उन्हें एक कमजोर व्यक्ति माना जाता है । पिछले महा अधिवेशन में भी उन्हें पराजित करने के लिए उनके विरोधियों ने उनकी स्वास्थ्य की अवस्था मुद्दा बनाया था लेकिन मजबूत इच्छाशक्ति के कारण अपनी स्वास्थ्य समस्या पर अब तक उन्होंने विजय प्राप्त की है और अपने राजनैतिक चातुर्य के कारण अपने विरोधियों पर विजय पताका लहराते हुए पार्टी और सरकार पर उनकी सशक्त उपस्थिति तथा पकड़ कायम है । ’ओली की बोली’ के कारण भी उनका व्यक्तित्व आलोचित और प्रशंसित रहा है । नेपाली राजनीति में वे लोकोक्तियों और मुहावरों के सटीक प्रयोग के नायक माने जाते हैं । इस कारण विरोधी भी यदा–कदा उनकी प्रशंसा में सिर हिलाते नजर आते हैं । यह अलग बात है कि कभी–कभी उनका भाषा प्रयोग काफी विवादों में रहा है और इसकी धमक देश की सीमा को पार कर विदेशों तक भी पहुँची है । लेकिन दोनों ही परिस्थितियों का राजनैतिक लाभ उन्हें मिलता है । जब वे सकारात्मक बातें करते हैं तो पूरा देश ताली बजाता है और जब नकारात्मक बातें करते हैं तो भी एक समूह जो उनके पीछे खड़ा है, वह और अधिक उत्साह से उनके पीछे नजर आता है । स्पष्ट है कि वैचारिक रूप से अभी भी देश दो भागों में विभाजित है । एक वर्ग उन्हें राजनैतिक रूप से अतिवादी मानता है और अपने अधिकारों को संकुचित करने वाली शक्ति के रूप में उन्हें देखता है । लेकिन ऐसे–ऐसे मुद्दे उनके पास हैं जिन्हें उठाकर वे अपने धुर विरोधियों को भी पक्ष में खड़ा होने के लिए विवश कर देते हैं । इसका ताजा उदाहरण भारत के साथ उपजे सीमा विवाद के संबंध में देखा जा सकता है । इस संबंध में सरकार के अब तक के रवैए से क्या हासिल होगा यह तो नहीं कहा जा सकता मगर प्रकट रूप से राष्ट्र की संपूर्ण राजनैतिक चेतना को समेटने में वे सफल हुए और प्रधानमंत्री के रूप में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई । प्रधानमंत्री ओली की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे सपने बाँटते और दलगत राजनीति में पड़े इस देश में उनके पीछे हुजूम चल पड़ता है । संविधान निर्माण के बाद जब वे पहली बार प्रधानमंत्री बने तो भारत की कथित नाकाबंदी चल रही थी । लेकिन वे भारत के समक्ष झुके नहीं और प्रतिक्रिया स्वरूप अपनी विदेश नीति में चीन को तरजीह दी । उन्होंने न केवल उनसे अनेक समझौते किए बल्कि नेपाल में अपनी कूटनैतिक सक्रियता बढ़ाने का अवसर भी उन्हें दिया । परिणाम यह हुआ कि न केवल नाकाबंदी खुली बल्कि चीन आज भारतीय कूटनीति के लिए नेपाल में सिरदर्द बनकर खड़ा है । नाकाबंदी के समय प्रधानमंत्री बने ओली ने देश में न केवल रेल और पानी जहाज चलाने की बात बात कही बल्कि लोडसेडिंग से मुक्ति, घर घर में गैस पाइपलाइन जोड़ने और हवा से बिजली निकालने की बात तक कही । इन बातों को लेकर उनका काफी मजाक भी उड़ाया गया । लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि उनकी सरकार की तीखी आलोचना करने वाली नेपाली कांग्रेस ने भी अपने चुनावी घोषणा पत्र में इन सपनों में से कुछ को शामिल किया । तत्कालीन परिस्थितियों में उनकी कुछ बातें हास्यास्पद थीं लेकिन इनमें से कुछ में रचनात्मकता भी थी ।प्रधानमंत्री ओली इस बात को बखूबी जानते हैं कि उन्हें कब क्या करना है और किन मुद्दों को हवा देनी है । अंतरिम संविधान में जब देश के उपेक्षित वर्गों के अधिकारों को सुनिश्चित किया गया तो नेपाल में भी अभिजात्यवादी चिंतन का समर्थन करने वाले लोगों के लिए यह सुपाच्य नहीं था । ओली ने विपक्ष के नेता के रूप में न केवल इस नब्ज को थामा बल्कि नव संविधान में इसे परिमार्जित करने तथा विपरीत परिस्थितियों में नया संविधान जारी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । साथ ही नेपाल में नेपालीपन के आदर्श के रूप में उन्होंने स्वयं को स्थापित किया । जब ये प्रधानमंत्री बने तो विपरीत परि स्थितियां थीं ।

गैस और पेट्रोल का चरम अभाव था । लेकिन इसके लिए भारत के समक्ष घुटने टेकने के बजाय उन्होंने लकड़ी से ही सही लोगों का चूल्हा न बुझने देने की आवाज उठाई और पेट्रोलियम की सीमित सही लेकिन चीन से आपूर्ति के समझौते किए । एक तरह से उनका यह कदम आगामी चुनाव का मुद्दा बना और राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में उभर कर वे सामने आए । परिणाम यह हुआ कि दलगत राजनीति के प्रति तटस्थ रहने वाली जनता भी उनके पक्ष में उतरी और उनकी महान विजय की दिशा निश्चित हुई । कहने के लिए यह भी कहा जा सकता है कि संविधान जारी होने के बाद मुद्दा विहीन राष्ट्र को उन्होंने राष्ट्रवाद का मुद्दा दिया और इसके पुरोधा के रूप में स्वयं को स्थापित किया । अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में उनके पास शासन की समस्त संगठित शक्तियां तो थीं ही, उनके समक्ष देश के प्रजातांत्रिक इतिहास की अस्थिरता और उत्थान पतन का इतिहास भी था । इसलिए एक सशक्त प्रधानमंत्री और स्थाई सरकार का बनाने नारा उन्होंने दिया । विकास के लिए स्थिरता को आवश्यक बतलाया और इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने अनेक सशक्त चालें चलीं । अब तब की स्थिति में देश की केंद्रीय राजनीति में तीन राजनैतिक शक्तियां सक्रिय थीं जिनमें से एक नेकपा माओवादी के नेता के रूप में पूर्व प्रधानमंत्री श्री प्रचंड पर उन्होंने डोरा डाला और न केवल गठबंधन बल्कि नेकपा एमाले में उसके विलय करने लिए भी उन्हें राजी कर लिया । ओली इस बात को भली–भांति जानते थे कि देश की अधिकांश जनता कम्यूनिज्म और भारत विरोधी राष्ट्रवाद के समर्थक हैं । लेकिन चुनावों में मत विभाजन के कारण ये शक्तियां बिखर जाती हैं और अपेक्षित लक्ष्य को नहीं प्राप्त कर पातीं । भले ही इसके लिए प्रचंड से परदे के पीछे उन्हें जो भी समझौते करने पड़े हों लेकिन नेकपा माओवादी के साथ एकीकरण के द्वारा न केवल उन्होंने प्रचंड की राजनैतिक महत्वाकांक्षा पर लगाम लगाया बल्कि अपने लिए एक महान विजय की राह भी निश्चित कर ली । रही सही कसर उन्होंने स्वयं को मधेश विरोधी और भारत विरोधी के रूप में प्रस्तुत कर दो तिहाई बहुमत की सशक्त सरकार की मंजिल को प्राप्त कर सके । नेपाल में सत्ता संघर्ष का इतिहास पुराना रहा है । संवैधानिक राजतंत्र और बहुदलीय प्रजातंत्र की अवधारणा के बीच देश ने लंबी यात्रा तय की है और दोनों ही संस्थाओं टकराव की स्थिति भी बारंबार देखी गई है । यद्यपि गणतांत्रिक इतिहास में इस तरह की नौबत नहीं आई । लेकिन संविधान जारी करने के मुद्दे पर देश के प्रथम राष्ट्रपति के साथ अंतर्विरोध को भी इस देश ने झेला है ।

ओली इस बात को बखूबी जानते हैं कि पार्टी में गुट–उपगुटों की भरमार है । यदि वे चाहते तो दूसरे कार्यकाल के लिए वर्तमान राष्ट्रपति को किनारा कर अपने दल के किसी एक नेता को इस पद पर काबिज करवाकर अपने एक विरोधी या प्रतिद्वंद्वी को सदा–सर्वदा के लिए शमित कर सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया । संदेश साफ था कि वे अपने लिए जानबूझकर किसी सत्ता संघर्ष को निमंत्रित नहीं करना चाहते थे । यही कारण था कि उन्होंने ही अपने प्रबल समर्थक के रूप में स्थापित पूर्व राष्ट्रपति को ही दूसरे कार्यकाल के लिए निरंतरता देने में अपना योगदान दिया अपनी सरकार के मार्ग को पूरी तरह  नष्कंटक बना दिया । उनके इसी दूरदर्शी कदम का परिणाम आज देखा जा सकता है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कार्यालय आज बेहतर समन्वय में काम कर रहे हैं जिसको लेकर कभी कभार अनापेक्षित टिप्पणियां भी सामने आती हैं । एक ओर जब देश में कोरोना का पदचाप सुनाई दे रहा था और इससे लड़ने में सरकार तथा पूरा तंत्र और असफल दिखाई दे रहा था ऐसे में प्रधानमंत्री के रूप में उनकी लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से नीचे आ रहा था । इसे नियंत्रित करने के लिए उन्होंने न केवल कालापानी और लिपुलेक बल्कि लिम्पियाधुरा को नेपाल के नक्शे में शामिल कर तथा प्रतिनिधि सभा से इसका अनुमोदन करवा कर अपनी लोकप्रियता को चरम ऊँचाई पर पहँचा दिया । ओली का यह अस्त्र इतना मजबूत था कि पूरे देश का ध्यान चीन के द्वारा एवरेस्ट के शिखर के अतिक्रमण से खींच कर भारत विरोध के केंद्र पर उन्होंने केंद्रित कर दिया और एक तरह से पूरे विपक्ष के मुंह पर नकेवल ताला लगा दिया वरन उन्हें अपने पक्ष में सिर हिलाने के लिए विवश कर दिया ।

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