विश्व हिंदी दिवस के शुभ अवसर पर फिर हमें भाषा के मूलभूत अवधारणाओं के संदर्भ में विमर्श करना अत्यावश्यक बन जाता है । हिंदी भाषा दुनिया की दूसरे नं.पर बोली जाने वाली भाषा बन चुकी है । १४ सितंबर को विशेष रूप से हिंदी दिवस मनाया जाता हैं । काल समय के अनुसार बार बार लौटता है ।
वर्तमान मनुष्य की सभ्यता फिर से वही आदिम काल को लेकर भाषा पुराने संरचनाओं में विकसित हो रही है । भाषा विकास में भी हम आज उतने ही प्रागैतिहासिक तथा पाषाण काल से जुड़ रहे हैं । भाषा की मुख्य जड़े भी चित्र,चिन्ह, शब्द तथा अक्षरों से अनुबंध करते हंै । जो गुफाओं में आदिम काल का मनुष्य स्वयं को व्यक्त करने में धीरे, धीरे समर्थ हो रहा था । आज भी हम उसी भाषा का प्रयोग कर रहे भले ही तंत्रज्ञान कितना भी विकसित हुआ हो । सोशल मीडिया की भाषा भी आदिम चिन्हों को ही नये रूप में प्रस्तुत कर रही है । सोशल मीडिया पर बातचीत करने का जरिया भी ज्यादातर ये चिन्ह बन रहे हैं । २१ वीं सदी में हमने भाषा की उसी आदिम विधा को चुना है । फेसबुक, व्हाट्सअप,मेल,ट्विटर,यू ट्यूब इन मीडिया के भाषा संचना में चिन्हों का उपयोग होता हैं । हँसने वाले,रोने वाले तथा हर तरह के भाव व्यक्त करने वाले चिन्ह,वस्तु,फल,पौधे,चाँद,सूरज,सितारे और प्रेम को व्यक्त करनेवाले चिन्हों का प्रयोग किया जाता हैं । सोशल मीडिया की भाषा का एक अलग से निर्माण हुआ है ।
भाषा का यथार्थ —
साहित्य,कला,संस्कृित, दर्शन,धर्म,विज्ञान,देश इन सबकी पहचान होती है भाषा । आपकी भाषा जितनी समृद्ध होगी उतनी ही साहित्य,कला,संस्कृित, धर्म भी मानव चेतना के आकाश को छुएँगे । अभिव्यक्ति भाषा से ही होती है । भाषा ही मानववंश के सभी आयामों की पहचान होती है । भाषा से ही हम जगत तथा सत्य को जानने मे समर्थ होते है । भाषा से ही हमारे रिश्ते,नाते अच्छे होते है और बिगडते भी भाषा से ही है । भाषा ही वह आईना है जिसमे हम मनुष्य तथा समाज का भी चित्र देख सकते हैं । भाषा का व्याकरण और साहित्य जितना सृजनशील होगा उतनी ही भाषा समृद्ध हो जाती है । अर्थात भाषा के विकास के साथ सृजनशील साहित्य का निर्माण होना जरूरी है । हिंदी भाषा को भी अगर विश्व भाषा बनना है तो हमें भी इन तथ्यों से अवगत होना होगा । परंतु हम अभी राष्ट्रभाषा के लिए ही जुझ रहे है । हमारी क्षेत्रीय भाषाओं का भी वही हाल है । भाषा का विकास यह कोई राजकीय आंदोलन नही है । सृजनात्मक साहित्यिक आंदोलन है । हमारे भाषाओं के विरोध ही अभी खत्म नहीं हुए हंै तो हन कहाँ अपेक्षा कर सकते है । अनुवाद एक प्रयास है भाषा को समृद्ध करने का । अनुवाद,व्याख्या,विवेचन की समर्थता किसी भी भाषा को जीवित रखती है । भारत और विश्व साहित्य कृतियों का आपस में अनुवाद होना चाहिये । वह अनुवाद शाश्वत,कालजयी तथा उस साहित्य कृति सत्य का अनुबंध करती हो । कालानुक्रम से भाषा भी अपने पूर्वाधार बदलती है । अपने चयन के साथ वह संस्कृति जनमानस को भी बदलती है । अगर हमें २१ वीं सदी की भाषा की विधाओं पर विमर्श करना है तो तंत्रज्ञान और विज्ञान का प्रभाव साफ दिखाई पडता है । आंचलिक भाषा जो भारतीयता की एक पहचान है वह भी आधुनिकता की आंधी में खत्म होने की कगार पर हैं । लोक भाषा,लोक संस्कृति,लोक धर्म की जड़ें भी हिल रही है । साहित्य, धर्म और संस्कृति को जीवित रखना है तो हमारी भाषा को समर्थ होना होगा , सशक्त होना होगा ।
भाषा के विकास पर और एक आक्रमण हो रहा है, वह यह है की गुगल की हुकुमत बढ़ रही है । २१ वीं सदीं में हम गुगल के माध्यम से कैसे बच सकते है? शायद हम भाषा का भाव खो देंगे हमें भी डर है । भाषा विश्लेषक,संश्लेषक तथा सृजनात्मक आयामाें में मनुष्य चेतना के साथ विकसित होनी चाहिए ।
भाषा के संरचनात्मक आयाम को भी समझना अत्यावश्यक है । राजनीति ,धर्म,दर्शन,साहित्य,विज्ञान की भी अपनी भाषा होती है । इनकी मर्यादाओं को अगर नहीं ऑकते है तो हम मानवता के आयामों की गहराई और ऊँचाईयों को भी समझने में कारगर नहीं होंगे । फिर हम कैसे ना समझते हुए भी एक दूसरे पर कीचड उछलते हैं ।
भाषा के उच्चतम् मूल्यों के साथ मनुष्य चेतना तथा मानववंश का रूपांतरण या विकास जरूरी हैं । तो भाषा ही इस रूपांतरण का माध्यम बनेगी । हमे बेहतर विश्व बनाने के लिए एक बेहतर भाषा का भी निर्माण करना चाहिए । भाषा ही मनुष्य,समाज,संस्कृति, मानववंश की पहचान है । हम भाषा के साथ ही विकसित होते हंै अर्थात् हमारी समस्या भी भाषा के अंर्तगत ही पलती है । इस पर हमारा ध्यान जाना चाहिए ।
२१ वीं सदी का साहित्य —
आधुनिकवाद,अस्तित्ववाद और उत्तर आधुनिकवाद के बाद हम उत्तर उत्तर आधुनिकवाद के युग में प्रवेश कर रहे हैं । साहित्य पर अब राजनीति,समाज से ज्यादा तंत्रज्ञान और स्वतंत्रता हावी होगी । असीमित स्वतंत्र सृजनात्मक परिवेश में आकार लेगी । दुनिया अब विश्व साहित्य का आगाज करने जा रही है ।
२१ वीं सदीं में साहित्य दर्शन कैसा होगा ? अभी तक साहित्य की साहित्य विधाए एक तरह से संरचनावाद की उत्पाद है । उनके आकृति बंध शुरुवात,मध्य और अंत इस तरह से होते हैं । यह एक इमारत की भाँति रचना खड़ी होती है, पहले मकान ऐसे ही बनते थे । परंतु आज इमारत बनने की शुरुआत अलग ढंग से होती हैं, रचना कहीं से भी शुरू हो सकती है । साहित्य विधाएँ भी इस तरह नये रचना शास्त्र के साथ जोड़कर देखना चाहिए । उदाहरण के तौर पर कुछ दिनों पहले हिंदी के महान साहित्यिक विष्णु प्रभाकरजी की पुण्यतिथि थी,मैं उनकी कृति “आवारा मसीहा “ सुन रही थी, यह किताब भारत के मशहूर उपन्यासकार शरदचंद्र चटर्जी के ऊपर चरित्र ग्रंथ हैं । हाँ उन्होंने शरदजी का चरित्र संरचना के ढंग से नहीं लिखा हैं । उन्होंने शरदजी के जीवनी को उनके उपन्यास को जोड़कर देखा है और यह साहित्य में एक लिक से हटकर कृति है । हम अकसर जीवनी में जन्मतिथि या ऐसे अनेक अंश पढ़ते हंै परंतु एक लेखक या लेखिका की चेतना का विकास भी उसके अभिव्यक्ति के साथ होता है । इस तरह से हमें सीखने को बहुत मिलता हैं । लोरेन्स स्टर्न का उपन्यास ट्रिश्टम शँडी संरचना की दृष्टि से एक अनोखा उपन्यांस है । बीच बीच में जो रिक्त स्थान प्राप्त होते थे उनको एक तो अर्थ पाठकों को गढ़ने हंै या लेखक के अपने अर्थ शब्दों के पार है ऐसा प्रतीत कराना चाहता है । यह उपन्यास रहस्यवाद की तरफ झुकता है । साहित्य में अद्भुत रम्यतावाद और यथार्थ वाद के अलावा साहित्य कृतियाँ अलग से प्रेरित होकर जन्म नहीं लेती है । कल्पनाशक्ति और अंतः प्रेरणा मनुष्य के सृजन कर्म को बल देती है जो एक नयी संस्कृति का आगाज करती हैं ।
आदिम मानव की साहित्य सभ्यता – वर्तमान काल में गुगल की भाषा लोक भाषा बन रही है और साहित्य की भाषा हमेशा की तरह लोक भाषा से अलग अपना स्थान रखती हैं । यह दूरी हमेशा से रही है । तो नये साल से कुछ नया सोचते हैं । इक्कीसवीं सदी गुगल,यूट्यूब की है या आर्टिफिशियल इंटेलिजन्सि की है । उसकी समस्यएँ आना बाकी है, मगर एक भावनिक संघर्ष आयेगा तभी हमे भावनाओं को संभालने वाले साहित्य की जरूरत होगी ।
आदिम मानव की साहित्य सभ्यता में हम गुगल के माध्यम से पहुँच चुके हैं । आम भाषा के संवाद में सोशल मीडिया पर हम ज्यादातर संवाद और भावनाओं को चिन्हों और प्रतिमाओं से करते हैं । आर्टिफिशियल इंटेलिजंन्सी के साँफ्टवेअर तांत्रिक भाषा मे अनुवाद करा सकते हैं,मगर कलात्मक और सृजनात्मक तथा उस भाषा की बारीकियाँ नहीं अंकित कर सकती । भाषा के चैतन्य को पकड़ने में असमर्थता व्यक्त होगी और इसका प्रभाव हम अभिजात साहित्य की कडि़यों से टूटते चले जायेंगे । हमारा साहित्य भी महज एक मशीनों की उपज बनकर रह जायेगा फिर हम साहित्य के उद्देश्यों को पूर्ण करने अपने आपको सिद्ध मानेंगे ?
मनीषा खटाटे .

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