डॉ बीरेंद्र प्रसाद समकालीन हिन्दी कविता के महत्वपूर्ण युवा हस्ताक्षर है । उनकी कविताओं में मनुष्य के जीवन मूल्य, उसकी अदम्य साहस उत्साह और अनवरत संघर्ष की सूक्ष्म पड़ताल कर ते हुए वर्तमान समय में मनुष्यता को बचाने की उत्कट अभिलाषा है। प्रशासनिक सेवा में रहते हुए पद की गुरूतर जिम्मेदारियों के निर्वहन करते हुए इस युवा हस्ताक्षर की रचनात्मक प्रतिभा और सक्रियता का परिणाम है की उन्होंने शेष कितना तमस के अतिरिक्त दर्जन भर से अधिक पुस्तको की रचना कर हिन्दी कविता को समृद्ध किया है।
आलोच्य काव्य संग्रह शेष कितना तमस में कवि अपने भावों और विचारों को दूसरे तक संप्रेषित करना चाहता है। उसका मानना है कि जीवन कर्म क्षेत्र है। जीवन में उतार चढाव आते रहते हैं, जब व्यक्ति उत्साह और मेहनत के साथ मानवीय मूल्यों की रक्षा करते हुए अपने पथ पर अग्रसर होता है तो अधियारा छट जाता है और जीवन प्रकाशमय हो जाता है। यही कारण है कि कवि के प्रस्तुत काव्य संग्रह के रचनाधर्मिता की सबसे बड़ी विशेषता मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता और आस्थावादी स्वर हैं । कवि के शब्दों में ज्वारों पर चलना है अंगारों पर पलना है, का दो की गहराई में जलजात सा खिलना है.
कवि का यही आस्थवादी स्वर उसे आत्म विश्वास से भर देता है। उसे विश्वास है कि जीवन की चुनौतियों का सामना कर वह सफल हो सकता है। जीवन और जगत के प्रति उसका दृष्टिकोण सकारात्मक सोच और ऊर्जा से भरपूर है। महाकवि रवींद्र की तरह ही वह एकला चलो में विश्वास करते हुए कहता है कि शेष कितना तमस शेष कितनी रात एकाकी ही चला हू,एकाकी किनी बरसात।आज के आपाधापी और भागदौड़ में मनुष्य जीवन अत्यंत कठिन हो गया है। उसे पग पग पर संघर्ष करना पड़ा रहा है। समाज में मानवीय मूल्य और संवेदनाएं समाप्त है। आज कल लोग सच्चाई और ईमानदारी का रास्ता छोड़कर झूठ और फरेब
का सहारा लेकर आगे बढ़ रहे हैं, जिससे कवि का भावुक मन विचलित हो उठता है। आज के भौतिकतावादी युग में लोगो का एक ही उद्देश्य है विलासितापूर्ण जीवन और अपने अहम की तुष्टि। यही पर कवि का मन विद्रोह कर जाता है और वह कह उठता है पंथी तू बढ़ता रहे अगवानी को खड़ा है प्रात।
कवि को मनुष्य की जिजीविषा और अदम्य साहस पर अटूट विश्वास है। मनुष्य झंझावातों और वत्याचक्रो से निकलकर जीवन को सफल बनाने में कामयाब रहा है। कवि का मानना है कि आधियारा कितना भी गहरा हो जीत उजाले की ही होती हैं।कवि प्रस्तुत काव्य में प्रकश और अन्धकार का बिम्ब प्रस्तुत कर यह बताने का प्रयास किया है कि प्रकाश और अन्धकार परस्पर विरोधी हैं। यहां प्रकाश और अन्धकार की विपरीत अवधारणा साहित्य और जीवन में विरोधी शक्तियों जीवन में उतार चढाव, अच्छे और बुरे सकारात्मकता और नकारात्मकता प्रेम और घृणा को पाठको के लिए किया है। यही कारण है कि इस काव्य संग्रह की कविताओं में मानवीय संबंधों में आई गिरावट, कृत्रिमता बेरुखी उससे उत्पन्न तनाव और दबाव का भी चित्रण मिलता हैं।मनुष्य इस सृष्टि की सबसे सुंदर और अनुपम उपहार है। कर्म करना ही उसके जीवन का उद्देश्य है। किंतु उसे यह भी ध्यान रखना है कि उसके कार्यों से किसी को पीड़ा नहीं हो। वह लिखता है
“निज मन पीड़ा कैसे पहुंचा ऊ,
करुण भाव कैसे भर लाऊ ,
क्या छूती नही,
मेरी आहे तुमको इस आग में तैर नहाऊ.”
कवि ने प्रस्तुत संग्रह में अपने प्रकृति प्रेम के बारीक चित्रण किया है। कवि का जन्म गांव में हुआ है, इसलिए वह अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है। उसे गांव की प्राकृतिक छटा , वहा के लोग, जीवन मूल्य से काफी लगाव है। कवि इस संग्रह की भूमिका में स्वीकार करता है, प्रकृति के भाव, विचर, और कर्म की सौंदर्यता समान रूप से सभी मुझे आकर्षित करती है।
प्रकृति प्रेम का यह दृश्य बड़ा ही अनुपम हैं,
“ कण कण में तेरी खुशबू बसने लगी है
रात दिन लतिका ए कसने लगी है ,
प्रणय सेज पर, अहसास की चादर ओढ़ेंगे,
चाद को मालूम था, हम तुम मिलेंगे।”
प्रस्तुत संग्रह में कुल साठ कविताएं संकलित हैं। कबी ने छोटी से छोटी और मामूली सी चीजों को भी अपनी दृष्टि से ओझल होने नही दिया है।तर्क और बुद्धि के बनिस्बत यहां प्रेम को अधिक महत्व दिया गया है। यह सही भी है कि हर की कविता में प्रेम प्रासंगिक रहा है। किसी न किसी रूप में प्रेम का दामन अवश्य थमा है। प्रस्तुत संग्रह भी इसका अपवाद नहीं है। राधा कृष्ण प्रेम के सर्वोत्तम मानदंड है। उन्हें प्रतीक बनाकर कवि लिखता है-
“सोना तुमको ख्वाबों में देखा हैं,
राधे कृष्ण की किताबो मे देखा है”
कवि में साहस है वह उसे छिपता नही है। उसे अभिव्यक्ति प्रदान करता है। उसका प्रेम उसे नैतिक शक्ति प्रदान करता है,। यह प्रेम सार्वभौमिक है, जो स्वार्थ का नाश कर मनुष्यता का पाठ पढ़ाती हैं। हमारे चारो ओर फैले गहरे अंधेरे और धुढ़लेपन को दूर कर उजाले की चमक बिखेरती है। कवि के शब्दों में –
“तुम जिन का साधन ,
आत्मा के साध्य हो,
गहन तिमिर में अपरिमित दीप मधु पथ माध्य हो.”
कवि की भाषा शैली अत्यंत सरल और सहज है। हृदय की गहराइयों से निकली भावो में कोई बनावटीपन नहीं है।निसंदेह प्रस्तुत संग्रह में विजयिनी मानवता का संदेश निहित हैं। शताब्दियों बाद भी मनुष्यता आज तक जीवित है। जीवन से साक्षात्कार करती ये कविताएं समाज में मानवीय मूल्यों की स्थापना और उसे जागरूक करने का प्रयास है।
आलोच्य काव्य संग्रह की कविताएं अपनें समय और समाज का दर्पण है। यह हमारे चारो ओर फैले गहरे अंधेरे और कालेपन को दुरकर उजाले की चमक बिखेरती है। साथ ही जीवन को प्रेम से सराबोर कर देती हैं। कवि का यह प्रेम निज वेदना नही है बल्कि इसे वह सुख शांति का आधार मानता है। कवि कहता है, क्योंकि एक जिंदा स्पर्श, प्रतीक्षा का अंदाज बदल देता है, अहसास तो अहसास है, जिंदगी का अंदाज बदल देता है। कवि के लिए प्रेम महान है। उसका मानना है कि संसार को प्रेम से ही जीता जा सकता है। उसके लिए प्रेम एक जीवित स्पर्श है, जो जीने का अंदाज बदल देता है।
कवि प्रेम को जीवन की रग-रग से जोडते हुए जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है। यही कारण है कि प्रेम को केन्द्र में रखकर लिखी गई इन कविताओं में जीवन के विविध रंग अपनो पूरी भंगिमा के साथ उपस्थित है। कवि का मानना है कि प्रेम सृष्टि में नवजीवन का संचार करती हैं। यहाँ ध्यातव्य है कि यह प्रेम रोमानी नहीं है बल्कि मानवीय है, जिसका उद्देश्य है मानवता का कल्याण और मानवीय मूल्यों की रक्षा करना। कवि के प्रेमपरक कविताओं में कोई उथलापन नहीं है बल्कि इसमें कोमलता और पारदर्शिता है। यहां वर्णित प्रेम अत्यंत सघन हैं जिसमे बहुत कुछ समाया हुआ है। इस प्रेम में न कोई बनावटी पान है न तो कोई दिखावटीपन । यह अत्यंत सरल,निस्कपट और निश्छल है। एक उदाहरण प्रस्तुत है, मेरे लिए तेरा प्यार निश्छल, क्या दू नाम प्रिय, सपने में आती हो तुम, लेकर नव ललाम प्रिय। यहाँ कवि के लिए प्रेम महान है, वह ईश्वर का वरदान है। साथ ही यह एक मीठा अहसास है, जो अलौकिक और दिव्य है। कवि कहता है, एक मृदुल अहसास, सास में मीठी चुभन, है यह आनंद अलौकिक, दिव्यता का एक उपवन।
डॉ प्रसाद की नज़र ग्राम्य जीवन पर है। इसलिए इनकी कविताओं में ग्राम्य जीवन अपनी संपूर्ण परिवेश के साथ उपस्थित हुआ है। गांव के खेत खलिहान, नदी नाले, ताल तलैया, रहन सहन, जीवन स्तर सभी का बड़ा ही सूक्ष्म चित्रण किया गया है। इसका आलंबन बना है प्रकृति। यही कारण है कि इस संग्रह की कविताओं में प्रकृति चित्रण अत्यंत स्वाभाविक है। इसमें प्रकृति के विभिन्न रूप और छवि बड़े ही स्वाभाविक रूप से उभरकर सामने आया है। कवि ने प्रकृति चित्रण के माध्यम से अपनी गहरी संवेदनशीलता, मानवीयता, पर्यावरण प्रेम, उसकी उपादेयता और उसके मोहक रूप का अनुपम बिम्ब प्रस्तुत किया है। इस संग्रह के अंतर्गत प्रकृति से जुड़ी बड़ी संख्या में देखी जा सकती हैं, जो अत्यंत सजीव है। प्रकृति कवि के लिए जीने का वरदान है। एक उदाहरण प्रस्तुत है:
“निराला तेरा
जीने का वरदान
सीत असित
मिलन विरह सब
अनुरंजित भी मिटने का अभिमान
निराला तेरे जिन का वरदान।”
यहां मानवीय प्रेम और प्रकृति प्रेम दोनो एकाकार हो गए हैं। प्रकृति और मनुष्य दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।
प्रस्तुत संग्रह में प्रकृति की अनेक छटाएँ यहाँ दृष्टिगत होती है। कवि का संवेदनशील मन और प्रशासनिक सेवा में रहते हुए अनेक स्थानों का भ्रमण करते हुए प्रकृति चित्रण में खूब रमा है। तमाम व्यस्तताओं और जिम्मेदारियों का निर्वाहन करते हुए जब भी मौका मिला है वह प्रकृति की ओर आकृष्ट हुआ है। प्रकृति चित्रण के माध्यम से कवि पर्यावरण के प्रति भी सचेत है। आज के आपाधापी और भागदौड़ के जीवन में प्रकृति उसके लिए सजीवनी हैं। यहीं कारण है कि प्रकृति अपने सम्पूर्ण सौंदर्य के साथ उपस्थित है।चाँद का बिम्ब द्रष्टव्य हैं-
“कण कण में तेरी खुशबू बसने लगी है
रात दिन लतिका ए कसने लगी है
प्रणय सेज पर एहसास की चादर ओढेंगे
चाँद को मालूम था हम तुम मिलेंगे।”
प्रस्तुत संग्रह में कवि ने अपना जीवन दर्शन भी प्रस्तुत किया है। ये कविताएं मनुष्य भाव की रक्षा करते हुए जीवन से सीधा संवाद स्थापित करती है। कवि ने पूरी ईमानदारी से अपने अनुभव को शब्दों में पिरो दिया है। प्रस्तुत संग्रह में कवि की जिजीविषा में आत्म संघर्ष भी स्पष्ट झलकता है। कवि का आत्म संघर्ष पूरी मानवता के संघर्ष है, जो जीने की राह आसान कर्ता है। कवि ने अपनी रचाओ में मानव जीवन के सूक्ष्म से सूक्ष्म तंतुओं को पकड़ने की पूरी शिद्दत के साथ कोशिश की है। यही कारण की इस संग्रह में मनुष्य और उसका परिवेश ही नहीं अपितु उसकी अंतरंगताएं भी उभरकर सामने आई है।
कवि को पूरी मानवता से प्रेम है।स्वान्तः सुखाए लिखी गई ये कविताएं पूरी मानवता को सुखी और सुंदर बनाने के संकल्प है। कवि स्वीकार भी करता है कि ये कविताएं मेरे लिए आत्म परीक्षण भी है और आत्म मूल्यांकन भी। कवि की यह स्वीकारोक्ति इस संग्रह को और भी महनीय और पठनीय बन देता है। यह जीवन कर्म क्षेत्र है जिसमे जितना बल है वहीं यहां ठहरा है। कवि इसी कर्म पथ पर अग्रसर होते हुए स्व के माध्यम से पूरे विश्व को सुंदर बनाने का सपना पूरा करना चाहता है, मुझको स्व से प्यार है, यह मेरा अधिकार है, मुझमें खामियां हैं लेकिन, कृति हूँ उस कृतिकर की जिसने मुझे धरा पर भेज अपनी श्रेष्ठता स्वीकार की। इन पंक्तियों मे कवि ने अपने जीवन दृष्टि, विचारों, भावनाओ और संवेदनाओं को अत्यंत सशक्त रूप से अभिव्यक्त करते हुएमनुष्य जीवन को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया है। अपने जीवन अनुभव और मंतव्य को बड़ी सरलता और सहजता से पाठको तक संप्रेषित करने में सफल रहा है। इसलिए इस संग्रह की उपादेयता और अधिक बढ़ गई हैं। हाल ही में कई काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं, इन सब में ‘शेष कितना तमस’ एक अलग पहचान रखता है।
डॉ.उपेंद्र प्रसाद
सहायक प्राध्यापक
रामेश्वर महाविद्यालय, बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुज़फ़्फ़रपुर
