सृष्टि की पहली धड़कन,

धरती की कोमल सी धूल में

छुपी हुई अमर ज्योति है ।

 

वह नारी है…

जो आँचल में आकाश समेटे,

मुट्ठी में सपनों को भींचे,

हर दर्द को चुपचाप सहेजती है ।

 

वह नारी है…

जो जन्म देती है जग को,

और फिर उसी जग के

कठोर सवालों से लड़ती है ।

 

कभी बेटी बनकर खिलती है,

तो कभी बहन बनकर हंसती है,

माँ बनते ही त्याग की मूरत,

पत्नी बनकर सब कुछ सहती है ।

 

उसकी आँखों में सपनों का सागर,

दिल में एक अडिग विश्वास है,

चाहे कितनी भी बाधाएं आएं,

उसके भीतर एक प्रकाश है ।

 

वह नारी है…

जिसे कमजोर कहा गया,

हर मोड़ पर रोका गया,

पर हर बार वह उठी,

और इतिहास नया लिखा ।

 

कभी झांसी की रानी बनकर,

रणभूमि में ललकारती है,

तो कभी कलम की धार बनकर,

समाज की सोच बदलती है ।

 

वह आंसू भी है, वह मुस्कान भी,

वह संघर्ष है, वह उड़ान भी,

वह चुप्पी में भी बोल उठे,

वह तूफÞान है, अरमान भी ।

 

रसोई की चूल्हा–धुआं हो

या दफ्तर की ऊंची कुर्सी,

हर जगह उसने साबित किया—

वह केवल æकमजÞोरÆ नहीं,

बल्कि सृजन की असली धुरी है ।

 

जब–जब उस पर अन्याय हुआ,

वह चिंगारी बन भड़की है,

अपनी अस्मिता की रक्षा में

वह दुर्गा बनकर खड़ी है ।

 

समाज के बंधनों को तोड़कर,

वह अब खुद की पहचान लिखे,

अब वह किसी की छाया नहीं,

अपनी ही नई उड़ान लिखे ।

 

वह नारी है…

जो अब झुकना नहीं जानती,

अपनी राह खुद बनाती है,

और हर बाधा को पार करती है ।

 

उसकी हर सांस में क्रांति है,

हर कदम में एक कहानी है,

अब समय आ गया है समझो—

नारी नहीं, वह शक्ति महान है ।

 

वह नारी है…

जो खुद में ही एक संसार है,

उसके बिना यह जीवन अधूरा,

वह ही सृष्टि का आधार है ।