भूखे भजन न होय गोपाला !

पिछले वर्ष (सन्२०१९) में एक खुशीकी खबर आई थी कि नेपाल निम्नआय वर्ग से निम्न मध्यम आयवर्ग की श्रेणी में पहुँच गया है । नेपाल में प्रतिव्यक्ति आय एक हजार ९५ डॉलर हो गयाहै । सरकार ने सन् २०३० तक नेपाल कोमध्यम आय वर्ग समूह में पहुँचाने का लक्ष्यरखा है । वैसे अभी आँकड़ों में गरीबी १८प्रतिशत है । लेकिन विडंबना देखिए कोविड१९ की महामारी ने सारी सफलता की खुशीतथा आगामी सुखद योजनाओं पर तुषारापातकर डाला ।कोरोना की वजह से देश लंबे अर्सेतक लॉकडाउन की स्थिति में है । अभी भीअधिकांश जिलों में निषेधाज्ञा की स्थिति कायमहै । जिसकी वजह से सर्वसाधारण का जीवनकष्टकर बन गया है । कहा जाता है किपेट जो न करवाए ! समाचारपत्रों में प्रतिदिनटुडीखेल तथा अन्य स्थानाें में सैकड़ों भूखेंलोगों को कतार में बिठाकर स्वयंसेवी संस्थाओंद्वारा खिलाने का दृश्य दिल को छू जाता है ।सरकार आँख मूँदी हुई है । मानो यहउसके सरोकार का विषय ही नहीं है ! जबकिप्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने आषाढ़ २०७५में एक कार्यक्रम के दौरान फाइव स्टारहोटल के कीमती तथा भव्य मंच से घोषणाकी थी कि “अब देश में भूखा कोई नहींरहेगा, भूख से कोई नहीं मरेगा ।” संघीयसरकार का यह नारा २०७५/७६ के बजटमें भी उल्लेखित है । प्रधानमंत्री अनेकों बारअपने भाषण में यह वाक्यांश दुहराते रहे हैं ।जबकि हकीकत यह है कि कोरोना के त्राससे जीवन को सुरक्षित रखने के लिए जो १०लाख से ऊपर मजदूर भारत से भाग करअपने घर आ गए थे वही मजदूर भूख कीमार से तिलमिलाते हुए वापस भारत जानेलगे हैं, जबकि आज भारत विश्व का दूसरासबसे ज्यादा कोरोना से संक्रमित देश बनगया है और पत्रिका प्रकाशित होते होते इसमामले में नंबर १ भी बन जाए तो आश्चर्यनहीं होगा । वैसे तो कोविड १९ के कारण नेपाल का ही नहीं विश्व का अर्थतंत्र भी धराशायी हो रहा है । अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पिछले अप्रैल महीने में प्रक्षेपण किया था कि विश्व अर्थतंत्र २०२० में ३ प्रतिशत ऋणात्मक होगा लेकिन आज स्थिति उससे भी ज्यादा खराब है । कोविड १९ के दुष्प्रभाव ने अमेरिका, भारत, ब्रिटेन, ब्राजिल और मेक्सिको जैसे देशों की आर्थिक स्थिति को तहस–नहस कर डाला है । आगे अभी और खराब होने की संभावना है । स्पष्ट है कि विश्व को बेरोजगारी तथा भुखमरी के दलदल में पहुँचा रही है कोरोना ! कोविड की वजह से अर्थतंत्र की खस्ता हालत के कारण लोगों के काम करने की क्षमता ही अपांग बन गई है । व्यापार– व्यवसाय, उद्योग–धंधा बड़े हाें या छोटे सभी को पंगु बना दिया है । परिणामत  बेराजगारी और उसकी वजह से भुखमरी विकराल रूप धारण करती जा रही है । नेपाल के रोजगार बाजार में प्रत्येक वर्ष पाँच लाख नेपाली शामिल होते हैं । केंद्रीय तथ्यांक विभाग के श्रम शक्ति सर्वेक्षण २०१९ के अनुसार २ करोड़ आठ लाख नेपाली काम करते हैं । जबकि ९ लाख (११.४प्रतिशत) बेरोजगार थे । श्रम न करनेवालों की संख्या १ करोड़ २७ लाख ५० हजार थी जिसमें पुरुषों की संख्या ४२ लाख ५० हजार और महिलाओं की संख्या ८५ लाख थी । आँकड़ों के अनुसार करीब ७१ लाख व्यक्ति के पास ही किसी न किसी प्रकार की नौकरी थी । उसमें से ६० प्रतिशत असंगठित क्षेत्र में कार्यरत थे अर्थात् ४२ लाख ६० हजार व्यक्ति असंगठित क्षेत्र में नौकरी कर रहे थे और आज हकीकत यह है कि इस क्षेत्र के अधिकांश व्यक्तियों ने अपनी नौकरी खो दी है । जो विशेष रूप से छोटे उद्योगों, व्यापार, व्यवसाय, होटल, पर्यटन, शिक्षा आदि क्षेत्रों से जुड़े थे । अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार कोरोना काल में नेपाल में १६ लाख से २० लाख व्यक्तियों ने अपनी नौकरी गवाँ दी है । राष्ट्र बैंक ने हाल ही में एक अध्ययन में जानकारी दी कि उद्योगी–व्यवसायियों ने अपने एक चौथाई कर्मचारियों की कटौती कर दी है । केंद्रीय तथ्यांक विभाग के अनुसार देश भर में ९ लाख १८ हजार प्रतिष्ठान हैं जिसमें उत्पादन की ओर चार लाख ६० हजार, होलसेल तथा रिटेल टे«ड में सात लाख ८० हजार, यातायात तथा स्टोरेज में २ लाख ११ हजार कर्मचारियों की नौकरी खत्म हो गई है । उसी तरह आवास और फूड सर्विस में ६२ हजार तथा अन्य क्षेत्रों में ८० हजार कर्मचारियों ने नौकरी खो दी है । ऐसी स्थिति में निम्न तथा निम्न मध्यम वर्गीय परिवार में दो जून के भोजन के लिए भी हहाकार मचना स्वाभाविक ही है । राष्ट्रीय युवा परिषद् ऐन,  २०७२ तथा राष्ट्रीय युवा नीति, २०७२ में १६ से ४० वर्ष को युवा उम्र समूह में निर्धारण किया है । राष्ट्रीय जनगणना २०६८ के अनुसार कुल ३ करोड़ जनसंख्या में से १ करोड़ ७ लाख युवा अर्थात् ४०.३५ प्रतिशत हैं । उनमें से २६ लाख युवा वैदेशिक रोजगार में हैं । प्रतिवर्ष साढ़े चार लाख युवक नौकरी के सिलसिले में विदेश पलायन करते हैं । नेपाल राष्ट्र बैंक ने हाल ही में एक तथ्यांक सार्वजनिक किया है जिसके अनुसार स्वदेश में १६ लाख युवक बेरोजगार हो गए हैं जबकि विदेश मंत्रालय ने जानकारी दी है कि पौने ६ लाख नेपाली विदेश से वापस आना चाहते हैं । वैदेशिक रोजगार बोर्ड के अनुसार खाड़ी तथा मलेशिया में ही ४ लाख ७ हजार युवक अपनी नौकरी से हाथ धो बैठे हैं । इस तरह देश और विदेश दोनों ही ओर नेपाली युवक कोरोना के मार में हैं और अपनी रोजी–रोटी गँवा बैठे हैं । एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि नेपाल में खाद्य असुरक्षा बढ़कर २३ प्रतिशत हो गई है । कोरोना ने १० घरों में से एक में आय अर्जन के साधन को अवरुद्ध कर दिया है तथा तीन का आय अर्जन कम कर दिया है । ऐसी स्थिति में जीवनयापन का कोई साधन न होने पर या तो ‘सदाआें’ की तरह भूख से बेहाल होकर लोग मरेंगे या विवश होकर आत्महत्या जैसे कदम उठाएंगें । वैसे यह सिलसिला भयंकर रूप लेने भी लगी है । हाल ही में आई एक रिपोर्ट अनुसार नेपाल एशियाई देशों में सबसे ज्यादा आत्महत्या करनेवालों में दूसरे नंबर का देश बन गया है । अब सवाल यह है कि इस कोरोना काल में देश में रहने वाले और विदेशों से नौकरी गँवाकर आने वाली जनता को किस प्रकार उचित व्यवस्थापन किया जाए कि वह भूख से नहीं मरे और न घबड़ाकर आत्महत्या जैसा कदम उठाए । अन्य देशों की बात करें तो गरीब वर्ग के लिए ग्रासरुट इकोनॉमी को मजबूत बनाने वाला राहत पैकेजों की घोषणा कर रहे हैं । हमारी सरकार को भी बड़ा न सही, छोटे–छोटे राहत पैकेजों को लाना चाहिए । रोजगार सृजना के लिए निजी क्षेत्रों से सहकार्य करे । अभी २२ राष्ट्रीय गौरव की आयोजना में निर्माण कार्य चल रही है । उसमें नौकरी देकर कार्य आगे बढ़ाने का काम करना चाहिए । कृषि क्षेत्र में श्रम शक्ति के अभाव की वजह से काफी नुकसान उठाना पड़ रहा था । अब इन बेरोजगारों को उसमें शामिल कर कृषि को उन्नत किया जा सकता है । इसके लिए उन्हें आर्थिक सहयोग भी करने होंगे ।

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