प्रिय बापू,
राम–राम Û
बचपन में आपको सम्बोधित यह गीत सुना था– æसुन ले बापू ये पैग़ाम,मेरी चिट्ठी तेरे नाम÷चिट्ठी में सबसे पहले ,लिखता तुझको राम–राम ======। Æऔर आज मैं आपको पत्र लिख रही हूँ,यह बताने के लिए कि आपका व्यक्तित्व और आपकी विचारधारा मेरे लिए कितने प्रेरणादायी हैं Û बापू, बचपन में आपके तीन बन्दरों से मुझे अच्छी सीख मिली। आज आपके इन संकल्पों से मेरी दिनचर्या आरम्भ होती है
! पृथ्वी पर किसी से नहीं डरूँगा -डरूँगी_।
2-मैं केवल ईश्वर से ही भय रखूँगा (रखूँगी ) ।
3- मैं किसी के प्रति मन में बुरे भाव नहीं रखूँगा ( रखूँगी )।
4- मैं अन्याय के समक्ष सिर नहीं झुकाऊँगा ( झुकाऊँगी )।
5- मैं असत्य को सत्य से जीत लूँगा।
ये संकल्प मुझे जीवन-संग्राम में संघर्ष हेतु अद्भुत सम्बल और प्रेरणा देते हैं।
बापू,” हम जैसा सोचते हैं,वैसा ही बन जाते हैं”; आपने कहा था। इसलिए मैं सकारात्मक सोचती हूँ और एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में समाज व देश-हित में कार्य करने की चेष्टा करती हूँ। मैंने “सत्य के प्रयोग”, “हिन्द-स्वराज”और”आरोग्य की कुंजी” सहित आपकी अन्य कृतियाँ भी पढ़ी हैं। शिक्षा, ब्रह्मचर्य, विवाह, मातृभाषा, हिन्दी, नशा, शाकाहार, मूर्ति-पूजा, प्राकृतिक चिकित्सा और स्त्री-सम्बन्धी आपके विचार आज भी अनुकरणीय हैं।

पहले मैं समझती थी कि बह्मचर्य विद्याथिर्यों के लिए ही आवश्यक है । ब्रह्मचर्य की आपकी परिभाषा से जाना कि ब्रह्मचर्य का अर्थ अपनी सभी इन्द्रियों पर सदैव और सर्वत्र मनसा, वाचा, कर्मणा नियंत्रण । ब्रह्मचर्य पालन करने का अर्थ है निर्विकार होना विकारमुक्त मनुष्य ईश्वर के सान्निध्य में रहते हैं; वे ईश तुल्य होते हैं । बापू , अपने विवाह का जो उद्देश्य बताया,यदि उसे समूचा देश आत्म्सात कर ले तो महिला उत्पीड़न, दाम्पत्य कलह, विवाह विनोद, यौन हिंसा, दुष्कर्म जैसी त्रासदियों का अंत सुनिश्चित हो सकता है । आपके शब्दों में विवाह का मुख्य उद्देश्य पुरुष तथा स्त्री के बचि घनिष्ठ मित्रताऔर सहनारिता स्थापित करजना है । वह विवाह विवाह नहीं जो कामेच्छा की तुष्टि हेतु किया गया हो ।
विवाहित जीवन का उद्देश्य मानवता की सेवा भी है । अपने युवावस्था में ही काम सम्बंधों का परित्याग कर कस्तूरबा बा के साथ देश और मानवताकी सेवा का अनूठा उदाहरण प्रतुत किया ।
आपकी यह बात मभुझे बहुत ही प्रिय है कि ‘विवाह में आध्यात्मिक विकास को प्रथम, मानवता को द्वितीय, पारिवारिक हितों तथा सामाजिक व्यवस्था को तृतीय और पारम्परिक आकर्षण तथा प्रेम को अंतिम स्थान दिया जाना चाहिए । केवल प्रेम को विवाह का आधार नहीं माना जाना चाहिए । और अन्य तीन उद्देश्यों की पूर्ति होने के बावजूद यदि प्रेम का अभाव है,तो भी विवाह नहीं होनी चाहिए ।’
बापू, महिलाओं के संबंध में आपके विचार मुझे सर्वाधिक प्रगतिशील और प्रेरणास्पद लगते हैं । आपने कहा –‘स्त्रियों को पुरुषों पर से अपनी परनिर्भरता समाप्त समाप्त करनी चाहिए और अपने भीतर आत्मविश्वास पैदा करना चाहिए ।…स्त्री–पुरुष की समानता के युग में पुत्र–पुत्री में भेदभाव न्याय संगत नहीं है । माता पिताओं का अपनी बेटियों का जबरन विवाह करवाना और उन्हें जीविकोपार्जन के योग्य न बनाना भी गलत है ।’
बापू, आपके इन विचारों की मैं प्रशंसिका हूँ–“हिंदू संस्कृति में पत्नी को पति के अत्यधिक अधीन मानकर और उसके व्यक्तित्व को पति के व्यक्तित्व में पूर्णतः विलीन करने पर जोर देकर भूल की गर्ई है । स्त्रियों
के विरुद्ध अत्याचार को रोकने का उपाय कानून बनाना नहीं अपितु स्त्रियों को शिक्षित करना तथा पतियों के अनुचित व्यवहार के विरुद्ध जनमत तैयार
करना ही है ।” और ….स्त्रियाँ पुरुषों के बराबर की साझीदार बनाना चाहती हें जो उन्हें पुरुषोंं के लिए ,पति के लिए भी अपने को सजाने से इनकार कर देना चाहिए । स्त्री का सौन्र्द उसके चरित्र बल और शील में है ।…यदि मैं स्त्री रूप में जन्मा होता तो पुरुष के इस दंभ के विरुद्ध कि स्त्री पुरुष के मनोरंजन की वस्तु है, विद्रोह कर देता ।
आपने युवतियों को दहेज का अच्छा निदान सुझाया है –“अगर तुम इन कुरातियों का विरोध करना चाहती हो तो शुरू में तुममें से कुछ को जन्म भर के लिए या कम से कम साल तक कुँवारी रहना होगा । फिर जब तुम्हारी शादी का वक्त आए और तुम्हें लगे कि जीवन साथी ढूँढ़ना ही है, तब तुम्हें ऐसे आदमी की चाह न होगी जिसके पास रुपया है, नाम है या सुन्दर शरीर है । बल्कि तुम ऐसा आदमी ढूँढ़ोगी , जिसमें सच्चरित्रता के सारे अद्वितीय गुण होंगे ।” अपने माता पिताओं को भी बेटियों ले सुखमय जीवन हेतु योग्य वर ढूँढ़ने के लिए अपनी जाति अथवा प्रांत सम्बंधी बन्धन तोड़ने की जो सलाह दी है, वह बहुत उपयोगी है ।
बापू, स्त्री की रक्षा और पवित्रता संबंधी आपके प्रेरणास्पद विचार यहाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं ।– “जो निर्भय स्त्री यह जानती है कि पवित्रता ही मेरी सच्ची है, उसकी लाज लूटा नहीं सकती । स्त्री की उज्जवल पवित्रता की आग के मायने हैवान को सिर नीचा करना ही पड़ेगा ।” और कोई पुरुष जोर करके स्त्रियों की रक्षा नहीं कर सकता । जो स्वयं अपनी रक्षा करती है, वही अपने को सुरक्षित रख सकती है ।”

बापू आपने मूत्र्ति पूजा का विरोध किया क्योंकि इसमें मिथ्याडम्बर और अन्धविश्वास जुड़कर सामाजिनक बुराइयों को जन्म देते हैं । काश ! देश के उत्मनधर्मी आपकी भावनाओं की गहराई तक पहुँच पाते तो हमारे नदी तालाब मूत्र्तियों के विसर्जन से कदापित प्रदूषित न हो पाते ।
क्या क्या कहूँ… मेरे लिए तो आपका सम्पूर्ण जविन ही प्रेरणा पुंज है । आज आधुनिक सभ्यता के अन्तर्विरोध और दुष्परिणाम अनवर उजागर हो रहे हैं । ऐसे में आपकी ये महत्वपूर्ण उक्तियाँ अक्सर स्मरण आती हैं –“आपको अपने भीतर वही बदलाव लाना होगा, जो आप दुनिया में लाना चाहते हैं ।”
और…. जीना ऐसे चाहिए जैसे आपकी कल ही मृत्ृु हो जाएगी । सीखिए ऐसे, जैसे आप हमेशा रहने वाले हैं ।”
बपू, आपने अपने व्यक्तित्व, कृतित्व और विचारधारा से जो उदाहरण प्रस्तुत किया हे,वह आज भी प्रेरक और प्रासंगिक है । आपकी तरह ही प्रार्थना मुझे भी प्रिय है, वह आज भी प्रेरक और प्रासंगिक है । और मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ, इस देश में सदैव सुख समृद्धि, शांति और उन्नति का वास हो तथा आप जैसी महान् विभूति पुनः भारत–भूमि पर अवतरित हो ।
विनम्र प्रणाम सहित,
गीता