
भारत ओर नेपाल के अति प्राचीन सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। संबंधों की यह डोर बहुत ही महीन और गहरी है । ये संबंध रोटी-बेटी के हैं,ब्याह-शादी के हैं, ये सम्बंध राखी के धागों से बँधे हैं, तो उत्सव और त्योहारों के रंगों से भी सजे हैं।इन सम्बंधों में दीवाली के दीपक की चमक और खील-बताशों की महक है..तो इनमें होली के रंगों की धूम और गुंझियोंँ की खशबू भी समायी हुई है।यह संबंध केवल दो पड़ौसी राष्ट्रों के नहीं बल्कि साझा संस्कारों के हैं, साझा संस्कृृति के हैं।यह सम्बंध जनकपुर से अयोध्या तक काठमाण्डू से काशी तक, और लुम्बिनी से बोध गया तक फैले हुए हैं। हिमालय गजेटियर्स के अनुसार, स्कंदपुराण सहित हर पुराण में ओम पर्वत और आदि कैलास को भारतीय सभ्यता के विचार का केंद्र माना जाता है। भारत और नेपाल दुनिया के दो ऐसे देश हैं, जिनकी बहुसंख्यक आबादी हिंदू है. दोनों मुल्कों में धार्मिक और सांस्कृतिक समानता है।हिमालय से प्रवाहित गंगा आदि अनेक नदियां अपने आंचल में इन दोनों राष्ट्रों की साझा संस्कृृति को समेटे हुए हैं। हम आर्यों की उसी शाखा से सम्बंधित हैं, जो इंण्डो-आर्यन है, हमारे मूल सांस्कृतिक ग्रंथ वेद हैं।वेद,उपनिषद और पुराण हमारी साझा थाती हैं।नेपाल की खस संस्कृृति की परम्परा भी अफगानिस्तान, और भारत के कश्मीर, कुमाऊं, गढ़वाल होते हुए नेपाल के कर्णाली प्रदेश में स्थायी रूप से बस गयी है।नेपाल के खस ब्राह्मण मूल रूप से कश्मीर, कुमाऊं और गढ़वाल होते हुए नेपाल आए।नेपाली खस आर्यों ने भारतीय आर्यों के मूल ग्रंथ वेद,उपनिषद, स्मृतियों को आत्मसात किया है। नेपाल और भारत दुनिया के दो प्रमुख धर्मों-हिंदू और बौद्ध धर्म के विकास के आसपास एक सांस्कृतिक इतिहास साझा करते हैं।
भारत और नेपाल के अनेकों तीर्थ स्थल और मंदिर भारत और नेपाल को सांस्कृतिक रूप से जोड़ते हैं। जिसमें पशुपतिनाथ मंदिर काठमांडू,भगवान बुद्ध की जन्मस्थली लुम्बिनी और माता सीता की जन्मभूमि जनकपुर अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। और ये तीनों ही स्थल युनेस्को की सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में सम्मिलित हैं। काठमाण्डू से तीन किलोमीटर उत्तर पश्चिम में देवपाटन गांव में वागमती नदी के तट पर स्थित पशुपतिनाथ मंदिर भगवान शिव के पशुपति स्वरूप को समर्पित है।सदियों से इस मंदिर की परम्परा रही है कि यहाँ एक मुख्य और चार अन्य पुजारी दक्षिण भारत के ही रखे जाते हैं।उत्तराखंड के प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर की किवदंती के अनुसार पाण्डवों के स्वर्ग प्रयाण के समय भैंसे के स्वरूप में भगवान भोलेनाथ के दर्शन हुए, जो बाद में धरती में समा गए ,परन्तु भीमसेन ने उनकी पूँछ पकड़ ली।ऐसे में जिस स्थान पर स्थापित हुए ,वह स्वरूप केदारनाथ कहलाया तथा जहाँ धरती से बाहर उनका मुख प्रकट हुआ ,वह पशुपतिनाथ कहलाया। महात्मा बुद्ध की जन्मस्थली लुम्बिनी भी विश्वविख्यात है।बुद्ध के जन्म के समय लुम्बिनी एक जंगल था। बुद्ध की माता, रानी माया देवी अपने पति राजा शुद्धोदन की राजधानी तिलौरा कोटा से प्रसूति को अपने मायके देवदह जा रहीं थीं, पर रास्ते में ही उन्हें प्रसव वेदना शुरू हो गई।माया देवी ने जिस पेड़ के नीचे जिस स्थान पर बुद्ध को जन्म दिया वहीं पर एक मंदिर का निर्माण हुआ, जो मायादेवी नाम से प्रसिद्ध है।भारत और तिब्बत के लाखों बौद्ध अनुयायी वर्ष भर यहाँ आते रहते हैं। बुद्ध का जन्म वर्तमान लुम्बिनी में हुआ था। बाद में बुद्ध ज्ञान की खोज में वर्तमान भारतीय क्षेत्र बोध गया आए, जहाँ उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त हुआ। बोधगया से महात्मा बुद्ध और उनके अनुयायियों ने विश्व के कोने-कोने तक बौद्ध धर्म का प्रसार किया। माता जानकी की जन्मभूमि जनकपुर धाम के नाम से प्रसिद्ध है।इस स्थान पर जब देवी सीता के स्वयंवर में भगवान श्री राम ने शिवजी के जिस महिमाशाली धनुष को तोड़ा था, उसका एक टुकड़ा यहाँ से कुछ कोस दूर धनुषा नामक स्थल पर गिरा। जो अब धनुषा जिला के नाम से जाना जाता। राम-सीता विवाह के विवाह की तिथि विवाह पंचमी के दिन यहाँ विशेष अनुष्ठान और मेले का आयोजन होता है। प्रतीकात्मक रूप में आज भी प्रत्येक वर्ष भारत की अयोध्या नगरी से राजा रामचन्द्र की बारात जनकपुर धाम तक आती है। इनके अलावा स्वयंभू नाथ का स्तूप, मुक्तिनाथ मंदिर, दंतकाली मंदिर,बूढ़ा सुब्बा मंदिर ,पिण्डेश्वर एवं विष्णु पादुका मंदिर आदि भी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से अति महत्वपूर्ण स्थल हैं। हिन्दी और नेपाली भाषा को भी देखें, तो न केवल लिपि देवनागरी है बल्कि शब्दावलियाँ भी एक जैसी हैं. दोनों ही भाषाओं का विकास प्राकृत भाषा से हुआ है।जो हिन्दी जानता या पढ़ता है, वो थोड़ी बहुत नेपाली भी पढ़ और समझ सकता है।साहित्य की बात करें तो लोकप्रिय विधा ग़ज़ल सहित कई विदेशी साहित्यिक विधाएं भारत के रास्ते ही नेपाल तक पहुँची हैं।नेपाल के अधिकांश साहित्यकारों की शिक्षा-दीक्षा भारत के बनारस,पटना,लखनऊ और कलकत्ता में ही हुई है।इसलिए इन सभी ने लेखन प्रेरणा हिन्दी साहित्यकारों से ही पाई है।हिन्दी नेपाली साहित्यकारों के अध्ययन का विषय रहा है।इसलिए नेपाली और हिन्दी साहित्य अत्यंत निकट है।मोती राम भट्ट के समय से ही बनारस नेपाली भाषा साहित्य का प्रमुख केन्द्र रहा है।नेपाल के आधुनिक काल के पहले कथाकार गुरु प्रसाद मैनाली, मुंशी प्रेमचंद से बहुत गहराई तक प्रभावित थे उनकी प्रसिद्ध कथा ‘नासो’ प्रेमचंद की कहानी ‘सौत’ से प्रभावित थी। नेपाली कवियों के सिरमौर लेखनाथ पौडेल, मैथिली शरण और अयोध्या सिंह हरिऔंध से प्रभावित थे।नेपाल के महाकवि देवकोटा के बारे में राहुल सांकृत्यायन का का कहना था कि देवकोटा में प्रसाद, पंत और निराला तीनों समाये हुए हैं।हिंदी के फणीश्वरनाथ रेणु ने नेपाल को अपनी मौसी कहा है।अज्ञेय नेपाल से जय जनक जानकी साहित्यिक यात्रा निकालते थे।वर्तमान में भी कुछ हिन्दी व नेपाली साहित्यकार साहित्यिक प्रकाशनों, साहित्यिक आयोजनों, परस्पर संवाद एवं अनुवाद आदि के द्वारा दोनों राष्ट्रों के सम्बंधों को मजबूत कर रहे हैं।
जिसमें नेपाल से प्रो. देवी पन्थी,डॉ घनश्याम परिश्रमी, लक्ष्मण नेबटिया, बीना सिन्हा, भारत से डॉ विजय पंडित, रामकिशोर उपाध्याय, डा सतीश चंद्र सुधांशु, ओमनीरव, मनोज मानव आदि प्रमुख हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि नेपाल और भारत के बीच साहित्यिक सम्बंधों की भी मजबूत कड़ी है। नेपाल के लोग भारत में अपना कारोबार करते हैं। ।भारत में तकरीबन 30 लाख से ज्यादा नेपाली रहते हैं और उन्हें यहां रहने, यहां की सेना में शामिल होने और सीमाओं में बिना किसी पहचान-पत्र और दस्तावेज के प्रवेश कर भारत में घर बनाने तक के अधिकार हैं।यहां के शहरों में नेपालियों के नाम जमीन-जायदाद और संपत्ति है। घर हैं रिश्तेदार हैं। संपत्ति और सुरक्षा के अधिकार बिल्कुल उसी तरह हैं जैसे भारत में एक भारतीय नागरिक की तरह रहते है।दूसरी ओर नेपाल म़े भी बहुत से भारतीय नागरिक निवास कर रहे हैं,अध्ययन और नौकरी कर रहे हैं।नेपाल के विशवविद्यालयों में के पाठ्यक्रम में हिन्दी भाषा और साहित्य पढ़ाये जा रहे हैं।नेपाली साहित्यकारों द्वारा हिन्दी में रचनाकर्म किया जा रहा है, हिन्दी की पुस्तकें और पत्रिकाओं का प्रकाशन भी हो रहा है।। भारत-नेपाल की खुली सीमा दोनों देशों के संबंधों की विशिष्टता है, जिससे दोनों देशों के लोगों को आवागमन में सुगमता रहती है।दोनों देशों के बीच 1850 किलोमीटर से अधिक लंबी साझा सीमा है, जिससे भारत के पाँच राज्य–सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड जुड़े हैं।दोनों देशों के नागरिकों के बीच आजीविका के साथ-साथ विवाह और पारिवारिक संबंधों की मज़बूत नींव है। इस नींव को ही ‘रोटी-बेटी का रिश्ता’ नाम दिया गया है। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी जी की दूरदर्शी सोच के अनुसार रामायण सर्किट बनाने की महत्वाकांक्षी परियोजना बनी है।भारत-नेपाल ने अपने नागरिकों के मध्य धार्मिक एवं सास्कृतिक संपर्क बढ़ाने और आर्थिक वृद्धि एवं विकास को बढ़ावा देने के लिये विभिन्न कनेक्टिविटी कार्यक्रम शुरू किये हैं।भारत के रक्सौल को काठमांडू से जोड़ने के लिये इलेक्ट्रिक रेल ट्रैक बिछाने हेतु दोनों सरकारों के बीच सहमति हो गई है।हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री मोदी जी की ‘पहले पड़ोस की नीति’ के मद्देनजर नेपाल उनकी प्राथमिकता सूची में सर्वोपरि है। हमारे सारे तीर्थ साझा हैं।चाहे केदारनाथ हों या नेपाल के डोलेश्वर महादेव, मुक्ति नाथ हों,काशी विश्वनाथ हों या पशुपति नाथ सभी हमारे साझा आराध्य देव हैं।नदी,पर्वत,तीर्थ सभी तो एक हैं।राजनैतिक रूप से भले ही हम दो राष्ट्र हैं।परन्तु सांस्कृतिक रूप से हमारे अन्तर्सम्बन्ध इतने दृढ़ हैं ..कि कोई हमें अलग नहीं कर सकता ।
