डा. संजीता वर्मा
सह–प्राध्यापक– केंद्रीय हिंदी विभग, त्रि.वि.वि.कीर्तिपुर, काठमांडू

‘धर्मादर्यो अर्थत्ः कामः कामाधर्म–फलोदयः –पद्मपुराण ।’ अर्थात् धर्म से अर्थ और अर्थ से काम की प्राप्ति होती है, किन्तु काम से फिर हमें धर्म के ही फल प्राप्त होते हैं । कबीर दास का कहना है– ‘पोथी पढि़–पढि़ जग मुआ पंडित भया न कोय’, ढ़ाई आखर प्रेम का पढेÞ सो पंडित होय । यह सच है कि यह जीवन प्रेम और घृणा इसी दो रूप पर आधारित है । प्रेम के ही अनेक रूप हैंं–संयोग, वियोग, नाते–रिश्ते, दोस्ती आदि और घृणा के रूप हैं हत्या, हिंसा, आतंक, दुश्मनी आदि । इस तरह यह कहा जा सकता हैं कि जीवन का सार प्रेम है तो निस्सार घृणा । प्रेम मनुष्य को सौम्य बनाता है, घृणा से वह पांखडी बनता है । मानव मन की मूल प्रवृत्ति की प्रस्फुटित किरणे हंै प्रेम और घृणा । जहाँ प्रेम का अंत होता है, वही घृणा जन्म लेती है । प्रेम शीतल चाँदनी की तरह जीवनदायी है तो घृणा प्रज्ज्वलित भट्टी की तरह दुःखदायी है ।
महाकवि दिनकर ने अपनी कृति उर्वशी में कहा है “परिरम्भ पाश में बँधे हुए प्रेमी, परस्पर एक दूसरे का अतिक्रमण करके ऐसे लोक में पहुँचना चाहते हैंं, जो किरणोज्जवल और वायवीय है । इन्द्रियों के मार्ग से अतीन्द्रिय धरातल का स्पर्श, यही प्रेम की आध्यात्मिक महिमा है । इससे यह स्पष्ट तौर पर पता चलता है कि प्रेम ही वासना है और प्रेम ही अध्यात्म है । उन्होंने आगे कहा कि नारी के भीतर एक और नारी है जो अगोचर और इन्द्रियायीत है । इस नारी का संधान पुरूष तब पाता है, जब शरीर की धारा, उछालते–उछालते मन के समुद्र में फेंक देता है, जब दैहिक चेतना से परे, वह प्रेम की दुर्गम समाधि में पहुँच कर निस्पन्द हो जाता है, और पुरूष के भीतर भी एक और पुरूष है, जो शरीर के धरातल पर नहींं रहता, उससे मिलने की आकुलता में नारी अंग–सजा के पार पहुँचना चाहती है ।’ यहाँ पर दिनकर की इस उक्ति को लिखने का खास उद्देश्य है, क्योंकि इसे पढ़ने के वाद सभी को चाहे पुरूष हो या स्त्री, यह सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा कि क्या सच में ऐसा होता है ?
यह सच है कि ‘काम’ जीवन पुरुष और महिला सभी के लिए समान महŒव रखता है, ‘काम’ जीवन दायिनी उर्जा है । संपूर्ण जगत् इसी से चलायमान है । मानव मात्र ही नहींं पशुपक्षी के साथ पेड़ पौधे भी इससे अलग नहींं है, बस कुछ अंतर हैं जो इन तीनों को एक दूसरे से अलग करता है । पेड़ पौधे और पशुओं में यह प्रेरणा ऋतु धर्म से एकाकार है लेकिन मानव जीवन में यह ऋतु धर्म के बंधन से मुक्त है और यह नई सृष्टि की सीमा पर समाप्त भी नहींं होती । काम शक्ति पशु जगत् में आवश्यक्ता और उपयोग तक सीमित है और मनुष्य में आकर यह आनन्द का कारण बन गई है, एक ऐसा कारण जिसका कोई प्रयोजन नहींं, जो केवल निस्सीम और निरुद्देश्य है । जिससे नित्य नए–नए पुलकों की रचना होती है । नई–नई कल्पनाओं के साथ मनुष्य में नवीन स्फुरण उत्पन्न करती है । लेकिन इन कल्पना भरी पुलक और नवीन स्फुरण के सुक्ष्म सुखों की अनुभूति वही कर सकते हैंं जो पशुता से अधिक दूर हैं ।
अब बात आती है महिला और पुरुष के काम भाव की , तो सबसे पहले यह कहा जा सकता है कि अधिकांश पुरूष भी जब काम के इस सूक्ष्म सुख को नहींं जानते तो महिला की बात ही छोडि़ए । और उस पर भी ग्रामीण महिलाओं की बात तो करनी ही नहीं चाहिए । क्योंकि वे शहरों की पढ़ीं– लिखीं महिलाओं की सी नहीं होतीं । हाँ, यह कहा जा सकता है कि आनन्द और अध्यात्म की इस काम शक्ति को अधिकांश लोग नहींं जानते हैं । इसके कारण अनेक हो सकते हैं “अज्ञानता, अशिक्षा, गरीबी, दहेज, अप्रेम, वातावरण, कुंठा, संकोच, लज्जा, बीमारी आदि । वैसे यह कहना अतिश्योक्ति नहींं होगी कि हमारे यहाँ लड़कियाँ इन सभी दौर से गुजरती हुई वैवाहिक बंधन में बँधती हैं, और ऐसी हालत में विवाह उनके लिए प्रेम के सुखद् मिलन की अपेक्षा एक सामाजिक बंधन या फिर एक मजबूरी बनकर रह जाती है जिसमें संस्कारवश, धर्म, परंपरा, मर्यादा, सृष्टि, भूख आदि का निर्वाह जैसे तैसे किया जाता है ।”
इसका कारण है, विवाह जैसे महŒवपूर्ण संबंध को प्रेम की गहराई से न निकालकर छोटे–छोटे गड़्ढों से जोड़ दिया जाता है । मन मिलता ही नहींं और तन मिलाने की कोशिश की जाती है । व्यक्तिगत महŒवपूर्ण निर्णय लेने की छूट लड़कियों को नहींं है समाज में । विवाह एक ऐसा पवित्र बंधन है जिसकी डोर प्रेम से कसी होनी चाहिए । लेकिन हमारे यहाँ यह दहेज की डोर में बंधी होती है । वैसे तो वैवाहिक बंधन के लिए बहुत सारी बातों पर ध्यान देना जरूरी है, लेकिन सबसे खास बात है प्रेम और ज्ञान । इन दो बातों पर अगर ध्यान दिया जाए तो खुशहाल युगल जोड़ी बना या बनाया जा सकता है ।
हमारी वैदिक संस्कृति में स्त्रियों का जो मान सम्मान था और उन्हें स्वयंवर में जिस तरह अपने भावी पति का चयन करने का हक मिला हुआ था, कालांतर में आकर मनु आदि ऋषियों ने ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाई जिसमें स्त्रियों की स्थिति भ्रामक हो गई । एक ओर जहाँ शास्त्र कहता है–“यत्र नार्यास्तु पूजयन्ते रमंते तत्र देवता” फिर यही शास्त्र दूसरी ओर कहता है– “पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षति यौवने । पुत्रो रक्षति वार्धक्यै न स्त्री स्वतन्त्रता महति” । इस तरह एक ओर जहाँ नारी की पूजा होती है, वहीं देवता रमते हैंं वही दूसरी ओर नारी कभी स्वतन्त्र नहींं है । इससे यह आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्त्री की स्थिति कैसी भ्रामक है ।
आज का वर्तमान युग जिसे स्त्री स्वतन्त्रता का युग कहा जाता है, में भी नारी को अपना मनपसंद जीवनसाथी चुनने का हक नहींं है, अपवाद को छोड़कर । नारी के प्रति यह हेयता पुरूषों में तो है ही स्वयं नारी में भी कुछ कम नहींं है । दहेज प्रथा या भ्रूण परीक्षण में नारी भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती हैंं । अभी भी अच्छे–अच्छे घरों में बेटी के जन्म लेने पर मातम मनाते हुए देखा जा सकता है ।
यह सच है कि हमारे यहाँ विवाह को सिर्फ दो व्यक्तियों का मिलन नहींं माना जाता बल्कि इस मिलन को दो परिवार, दो समाज और दो रीतिरिवाजों का मिलन अधिक माना जाता है । मध्यम वर्गीय परिवार में यह धारणा कुछ अधिक ही मुखर है । इस वर्ग के लोगों का मिलन दो आत्मा का नहींं, दोे शरीर का मिलन होता है और दुःख की पराकाष्ठा तब होती है जब दो शरीर आपस में मिलते तो हैंं लेकिन अधूरे रूप में । महिलाएँ लज्जावश भले ही वह अपने मन की बातों को दबाए रखे बोले नहींं, लेकिन अंदर ही अंदर एक घुटन जरूर महसूस करती हैं । क्योंकि हमारे समाज के असली चेहरे पर एक आवरण होता है, ऊपर से नकली मुस्कुराहट विखेरना वह अच्छी तरह से जानती हैं ।
तो ऐसी हालत में यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनका काम भाव सेक्स जीवन कैसा होगा । एक ओर अधूरा शरीर कहने का मतलब है प्रेम के बिना शरीर का मिलन । इसके अनेक अर्थ हो सकते हैं जैसे–प्यार किसी से और शादी किसी से या फिर लड़का या लड़की में कोई एक दूसरे को पसंद नहींं हो या दहेज के कारण लड़की उस लड़के से उसके परिवार से घृणा करने लगी हो जो उसके पिता से चुस कर दहेज लिया हो आदि अनेक कारण हो सकतै हैं जो अन्दरुनी है तो दूसरी ओर दहेज कम लाने से स्त्री को ससुराल से मिलने वाली दिन रात की प्रताड़णा है । खिन्न मन से औरत पति का साथ क्या देगी ? और उस पर भी पति अज्ञानी और नासमझ हो, जो बस काम भाव को एक शारीरिक भूख समझे । यह कहने की बात नहींं है कि स्त्री और पुरुष की शारीरिक भूख के अर्थ अलग होते हैं । पुरुष के लिए औरत का शरीर कुछ अलग मायने रखता है तो स्त्री के लिए परुरूष का शरीर कुछ अलग ही । पुरुष अपने जोश और उन्माद के क्षण में यह भूल जाता है कि जिस माध्यम के जरिए उसका स्खलन हुआ है अथवा आनन्द मिला है, उसे इसका रत्तिभर भी एहसास हुआ या नहींं । पुरुष जिस तेजी से दहकता है, उसी तेजी से ठंडा भी होता है, लेकिन स्त्री न तेजी से दहकती है और न ही तेजी से ठंडी ही होती है । पुरूष यह जानने की कोशिश भी नहींं करता, उन्हें तो बस अपने आप से मतलब है । तब औरत यह सोचने पर मजबूर हो जाती है, यह क्या है ? या इसे क्या कहते
हैं ? क्या इसे ही ‘संभोग’ कहते हैं ?


जबकि सम्भोग का अर्थ है बराबर का भोग अर्थात् भोग या कामभाव में भाग लेने वालों की हिस्सेदारी समान हो । लेकिन अधिकांश महिलाओं के साथ ऐसा नहींं होता । यह एक ऐसा अहम् मुद्दा है जिसपर गंभीरता से सोचा जाना चाहिए । क्योंकि पहले ही हम बता चुके हैं कि काम एक ऐसी शक्ति है जिसके सही परिचालन से आप शक्तिवान बनते हैं, और जिसका काम कुंठित रह जाता है, उसकी स्थिति बहुत ही दयनीय बन जाती है । कुंंठित काम की विकृति से ही बलात्कार जैसी दुर्घटना होती है । साथ ही अन्य मानसिक विकार उत्पन्न होते
है । अतः इस दयनीय स्थिति से उबरने के लिए या ऐसी स्थिति ही न आए इसके लिए कुछ खास बातों पर ध्यान देना जरूरी है ।
विवाह प्रेम या पसन्द के आधार पर हो ? ताकि वहाँ श्रद्धा और विश्वास पनप सके, क्योंकि काम के मूल मेंं यही प्रेम वा पसंद है और बिना विश्वास के श्रद्धा का जन्म नहींं होता । विश्वास अगर निस्क्रिय इच्छा है तो श्रद्धा सक्रिय इच्छा । इनके एकाकार होकर प्रस्फुटित होने से मन में आस्था का कमल खिल उठता है । तब ऐसे मिलन वाले ही संभोग के माध्यम से समाधि तक पहुँच सकते हैंं या पहुँच पाते हैं । दहेज की लालची प्रवृत्ति के ऊपर विरोध करने वाली समझदारी का विकास होना चाहिए । नये परिवार में आने पर प्यार और अपनापन का व्यवहार किया जाना चाहिए । काम का ज्ञान अश्लील किताबों से नहींं बल्कि उच्च स्तर की पुस्ता से हासिल करना चाहिए । हमारे यहाँ इसके बारे में बातें करना एक अपराध माना गया है जबकि शुरू से ही स्तर के हिसाब से इसकी शिक्षा दी जानी चाहिए । माता–पिता को भी अपने बच्चों को इसके बारे में सही तरीके से समझाना चाहिए । और अन्त में सबसे अहम् बात है पति का अधिक समझदार होना । वैसे समझदार दोनों को होना चाहिए लेकिन पति की समझदारी, इसमें सबसे बड़ी भूमिका निर्वाह करती है ।
यह सच है कि प्रकृति ने ही एक ओर जहाँ औरत को संकोची, लज्जाशील और कोमल बनाया है वहीं दूसरी ओर मर्द को कठोर, वेशर्म और बेवाक बनाया है । इसलिए पति का यह फर्ज बन जाता है कि वह पत्नी के मन और तन दोनाें का गहराई से अध्ययन कर उसके ऊपर पड़े संकोच के पर्दे को धीरे से हटाना शुरू करे । बल का प्रयोग तो भूल कर भी नहींं करना चाहिए । क्योंकि प्रेम अथवा सेक्स से ही व्यक्ति में जीवन के प्रति कला के प्रति समाज के प्रति यहाँ तक की आध्यात्मिकता के प्रति अभूतपूर्व रचनात्मक शक्ति उत्पन्न होती
है । ग्रिफिथ ने ‘आधुनिक विवाह’ नामक पुस्तक में लिखा है “सेक्स मात्र शारीरिक वस्तु नहींं है । यह व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व से सम्बन्धित है ।” इस बात को समझकर ही पति को अपना और अपनी पत्नी का व्यक्तित्व निर्माण करना चाहिए । अभी भी हमारे समाज में स्त्री को भोग की वस्तु और बच्चा पैदा करने का मशीन समझा जाता है । जबकि सच्याई यह है कि स्त्री धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में साथ देने वाली अर्धांगिनी है । शक्ति के बिना तो शिव भी शव के समान हैं । स्त्री के बिना पुरुष अधूरा है । इसी बात को जानकर ही हमारे प्राचीन मनिषियों ने जीवन के दो लौकिक अर्थ और काम तथा दो पारलौकिक धर्म और मोक्ष लक्ष्य निर्धारित किए हैं जो स्त्री के साहचर्र्य के बिना पूरा नहींं किया जा सकता है । सुकरात ने विवाह के लिए जिज्ञासु युवक से कहा था “तुम विवाह अवश्य करो । यदि तुम और तुम्हारी पत्नी परस्पर अनुकूल हो गए तो इस धरती पर स्वर्ग पा जाओगे । यदि तुम्हारी पत्नी तुम्हारे प्रतिकूल मिली तो मेरी तरह निद्र्वद्व दार्शनिक बन जाओगे ।”
मानव जीवन की सारी सिद्धियाँ, उसकी सभ्यता, संस्कृति, साहित्य, दर्शन यहाँ तक कि उसकी अर्चना तथा आस्तिकता भी सेक्स की चेतन एवं अचेतन रचनाएँ हैं । सारी कलापूर्ण या कोमल भावनाओं का आधार सेक्स उर्जा है । मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि जब यह उर्जा उत्साहित की जाती है तो जीवन में उदात्त मानवीयता उत्पन्न होती है । सेक्स के इसी उत्साहित उर्जा से कला, साहित्य, संगीत, देश, माता–पिता भाई–बहन एवं समाज के प्रति प्रेम, त्याग, नैतिकता और सेवा तथा ईश्वर भक्ति का जन्म होता हैं । प्राचीन मनिषियों ने सेक्स के शारीरिक भोग पक्ष का सरल और सही मूल्यांकन कर उसे जीवन–पद्धति में प्रतिष्ठित किया है । अजंता, एलोरा, साँची, कान्हेरी, खजुराहो, कोणार्क आदि इसके उदाहरण हैं । लेकिन आज कुत्सित भावना के कारण सेक्स उर्जा की पवित्रता धूमिल होती जा रही है । लोगों में इसके प्रति पवित्र भावना नहींं बल्कि गलत धारणा बैठ गई है । इसे पाप और घृणा की नजर देखते हैंं । डा.ऐलन फ्रोम ने “सेक्स एण्ड मैरेज” पुस्तक में लिखा है– ‘सेक्स का भय सरलता से दीर्घकालीन बन जाते हैंं इसके बाद जब हमारे यहाँ विवाह होता है तो दो प्राणी प्यार का अभूतपूर्व सुख प्राप्त करने के बदले कुसंस्कारों तथा अन्धविश्वासों से जकड़े एक दूसरे के प्रति शंकालु तथा अनावश्यक हीन भावना से पीडि़त होते हैं ।” यह सेक्स संपूर्ण व्यक्तित्व को झकझोर कर रख देता है । यह अमृत और विष दोनाें है । अमृत इस मायने में कि इसकी पूर्णता व्यक्ति को अच्छे लक्ष्य की ओर ले जाती है तो विष इस मायने में कि इसकी अपूर्णता व्यक्ति को कुंठाग्रस्त बना उसे बुरे लक्ष्य की ओर पहुँचाती है ।
अन्त में यह कहा जा सकता है कि सेक्स जीवनदायिनी शक्ति है । इसके कुंठित या अधूरेपन से व्यक्ति जीवन पर्यन्त घुटन में जीने के लिए बाध्य हो जाता है और सही मायने में जिसका काम कुंठित है वह जीवन जीता ही नहींं बल्कि जीने का नाटक करता है । इसलिए इस उर्जा शक्ति से जीवन को आनन्ददायक बनाने के लिए इसके महŒव को समझना जरूरी है । प्यार भरा स्पर्श, व्यक्ति में उत्तेजना और उमंग का रस भरता है । क्योंकि यौन संतुष्टि अभिन्न चाहत और जीवन के क्षणों की साझेदारी से भरे संबंधों में ही हो पाती है । ठंडापन, दूरी, खिन्नता या बलपूर्वक अथवा स्वार्थ की भावना से इसकी संतुष्टि नहींं होती है । हाथाें का स्पर्श, चुम्बन तथा आलिंगन से न केवल प्रेम की अभिव्यक्ति होती है बल्कि उत्तेजना की लहर भी फैलती है । मृदुता, सराहना अ‍ौर शिष्टता से इसकी योजना बनाने से इसके चरमसुख का आनन्द लिया जा सकता हैं । पति–पत्नी होने पर भी प्रेमियों की तरह रहने से इसे चिरकाल तक जीवंत रखा जा सकता है । सेक्स जीवन का रहस्य महŒवपूर्ण होते हुए भी बहुत बड़ा रहस्य नहींं है, लेकिन उलझन तो इस बात की है कि इस काम भाव को भोगना तो सभी जानते हैंं लेकिन इसके सूक्ष्म बातों से अनभिज्ञ रहने के कारण उस चरम सुख को प्राप्त करने में असफल रहते हैं जिसके वे वास्तविक उत्तराधिकारी हैं ।
कोई भी व्यक्ति यौन क्रिड़Þाओं द्वारा तृप्ति का मधुर सुख प्राप्त कर सकता है, जब यह दो शरीर का मिलन नहींं, दो आत्माओं का मिलन हो । बेहतर योजना के साथ कल्पनाओं और भावनाओं को आपस में बाँट कर क्रीड़ा और स्पर्श के महŒव से वे अपने जीवन को मधुर बना सकते हैं । जो दम्पती प्यार और श्रद्धा से अपने तन और मन में अनूठी ताजगी और उत्तेजना भर सकते हंै, उनका काम जीवन कुंठाओं से मुक्त होकर अनंत माधुर्य और तृप्ति से भरा रहता है । ऐसे ही दम्पती संभोग से समाधि की ओर पहुँचते हैंं । कहते हैं वसंत का मौसम उल्लास और आनन्द का मौसम है । इसके आगमन से आम के वृक्ष मह–मह मीठी बासनावाली मंजरियों से लद जाते हंै । अमराई से पीक की आती मधुर पुकार से प्रेमियों की अधिरता बढ़ जाती है और उसका तन–मन बहकने के लिए आतुर हो उठता है । तरू–लताँए पल्लवित और पुष्पित हो जाती हंै, तो भला ऐसी स्थिति में नारियाँ कामासक्त और चंचल कैसे न होंगी ? दो ताŒिवक भाग नारीमय और पुरूषमय में बटाँ यह चराचर जगत् परस्पर एकाकार हो जाने के लिए आतुर हो जाता है

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